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Explained: कैसे पता चलता है कितनी प्रभावकारी है वैक्सीन? समझिए पूरा हिसाब

अधिकारियों ने कहा कि ऐप बहुत धीरे-धीरे काम कर रहा था, जिसके कारण परेशानियां हुईं.
अधिकारियों ने कहा कि ऐप बहुत धीरे-धीरे काम कर रहा था, जिसके कारण परेशानियां हुईं.

Corona Vaccine Info: लोगों का मानना है कि 100 फीसदी ऐफिकेसी यानि प्रभावकारिता दर वाली वैक्सनी ही अच्छी होती है और इससे कम में हालात बिगड़ने का जोखिम होता है. इससे जुड़े कई और सवाल भी लोगों को ज़हन में बने हुए हैं, जबकि मामला इससे उलट है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 16, 2021, 8:13 PM IST
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नई दिल्ली. कोरोना वायरस (Coronavirus) महामारी फैलने के बाद वैक्सीन एक बड़ा मुद्दा बना. हालांकि, इसे लेकर चर्चा कभी रुकी नहीं. वैक्सीन बनने के बाद सवाल उठे कि ये कितनी असरदार होंगी. दूसरी भाषा में कहें, तो इसकी प्रभावकारिता दर (Efficacy Rate) क्या होगी. लोगों का मानना है कि 100 फीसदी ऐफिकेसी यानि प्रभावकारिता दर वाली वैक्सनी ही अच्छी होती है और इससे कम में हालात बिगड़ने का जोखिम होता है. इससे जुड़े कई और सवाल भी लोगों को ज़हन में बने हुए हैं, जबकि मामला इससे उलट है.

वैज्ञानिकों और एक्सपर्ट्स ने एक पैमाना तय कर रखा है, जो बताता है कि कितनी ऐफिकेसी रेट वाली वैक्सीन असरदार होगी. खास बात है कि यह नियम आज के नहीं हैं. इन्हें करीब एक शताब्दी पहले तय कर दिया गया था. फिलहाल अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट (FDA) ने तो कम से कम 50 प्रतिशत प्रभावकारिता दर वाली वैक्सीन को अनुमति देने की बात कही थी. आइए जानते हैं क्या होता है एफिकेसी रेट और इसे कैसे तय किया जाता है.





वैक्सीन को तैयार करना एक प्रक्रिया है, लेकिन इसके असर को जांचने के लिए उम्मीदवार को क्लीनिकल ट्रायल्स से गुजारना होता है. आमतौर पर इसके तीन चरण होते हैं. ट्रायल फेज के दौरान वॉलिंटियर्स को दो तरह की वैक्सीन दी जाती है. जिसमें एक असली होती है और दूसरी प्लेस्बो यानि आर्टिफीशियल होती है. दोनों तरह की वैक्सीन लगाए जाने के बाद जानकारी इनके असर को देखते हैं. वे देखते हैं कि वैक्सीन ने कितने लोगों को बीमार किया.
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अब उदाहरण से समझिए
अमेरिकी फार्मा कंपनी फाइजर (Pfizer) भी भारत में अप्रूवल पाने के लिए कोशिशों में लगी हुई है. कंपनी ने ट्रायल्स में 48 हजार से ज्याद लोगों को शामिल किया. इनमें से 170 लोग कोविड-19 से जूझ रहे थे. अब कंपनी ने केवल 8 मरीजों को असल वैक्सीन दी और 162 लोगों को प्लेस्बो लगाया. हालांकि, इस दौरान वॉलिंटियर्स को इस बात की जानकारी नहीं होती कि उन्हें कौन सा टीका दिया जा रहा है.

इस प्रक्रिया के बाद कंपनी ने पाया कि प्लेस्बो वाले वॉलिंटियर्स ज्यादा बीमार पड़े. इसके बाद दोनों समूहों के अंतर को देखा गया. इस अंतर के जरिए ही एक्सपर्ट्स प्रभावकारिता दर तय करते हैं. ऐसे में अगर असली और नकली वैक्सीन पाने वाले समूहों पर कोई अंतर नहीं होता, तो वैक्सीन को बेअसर मान लिया जाता. आसान भाषा में समझें, तो वैक्सीन का एफिकेसी रेट वैक्सीन पाने वाले और बगैर वैक्सीन वाले लोगों के बीच मिले जोखिम के अंतर की तुलना कर पता किया जाता है.
फिलहाल भारत ने आपातकाली इस्तेमाल के लिए दो वैक्सीन उम्मीदवार- कोविशील्ड और कोवैक्सीन को अनुमति दी है. पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट में तैयार हो रही कोविशील्ड के दो डोज की प्रभावकारिता दर 62 प्रतिशत है. जबकि, भारत बायोटेक की कोवैक्सीन का डेटा नहीं होने के चलते कई विवाद खड़े हो चुके हैं। विदेशी उम्मीदवारों को देखें, तो फाइजर का दावा है कि उनकी वैक्सीन का प्रभावकारिता दर 95 फीसदी है. वहीं, मॉडर्ना के मामले में यह आंकड़ा 90-94.5 प्रतिशत का है.
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