बिहार: चमकी बुखार ने यूं बदल दी 100 से ज्यादा परिवारों की जिंदगी

मुजफ्फरपुर में 129 बच्चों की दर्दनाक मौत अकेले आंकड़ों या मेडिकल इमरजेंसी की कहानी नहीं है. यह पीड़ितों परिवारों की टूटी हुई उम्मीदों और जीवन की कहानी है.

News18Hindi
Updated: June 23, 2019, 2:26 PM IST
बिहार: चमकी बुखार ने यूं बदल दी 100 से ज्यादा परिवारों की जिंदगी
News18 से बातचीत में शीला ने कहा- अपने बेटे प्रिंस की ओर देखते ही मैं सारे दुख भूल जाती थी.
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Updated: June 23, 2019, 2:26 PM IST
पंकज कुमार

चमकी बुखार ने बिहार के 100 से ज्यादा परिवारों की जिन्दगी हमेशा के लिए बदल दी. पांच साल पहले राज्य के मुजफ्फपुर की निवासी शीला ने पांच लड़कियों के बाद एक लड़के को जन्म दिया था. पितृसत्तामक समाज में शीला के लिए एक लड़के की मां होना ही खुश रहने क लिए काफी था. शीला और उसके पति दोनों, मजदूरी करके घर की जरूरतों को पूरा करते थे. चमकी बुखार ने शीला के बेटे की जिन्दगी लील ली. News18 से शीला ने कहा- 'हम गरीब हैं और हमें कई चीजों के लिए संघर्ष करना पड़ता है लेकिन अपने बेटे प्रिंस की ओर देखते ही मैं सारे दुख भूल जाती थी. मैं खुश थी लेकिन लगता है कि भगवान से मेरी खुशी देखी नहीं गई.'

सारी उम्मीद खत्म हो गई
शीला पूरा दिन अपने घर में कहती है कि 'उसकी जिन्दगी की सारी उम्मीद खत्म हो गई.' 12 जून को शीला, पास के ही एक गांव में पांच बेटियों और बेटे प्रिंस के साथ शादी में गई थीं. जब वह दरियापुर गांव से लौट रही थीं, इसी दौरान उन्होंने सभी के लिए समोसे खरीदे. सभी ने इसे खाया. शीला को याद है कि बच्चों ने साथ ही 7.30 बजे रात का खाना खाया. उसने बेटे को गोदी में लेकर सुला दिया. अगले दिन सुबह 6.30 बजे, उसने प्रिंस के शरीर में ऐंठन देखा. वह और उसके पति ने लड़के को मुजफ्फरपुर के केजरीवाल अस्पताल ले गए, लेकिन उसे बचा नहीं सके.

1 घंटे में टूट गई जिन्दगी की डोर
प्रिंस को लगभग 6.30 बजे पहली बार ऐंठन हुई. उसे एक घंटे के भीतर अस्पताल ले जाया गया और तुरंत डॉक्टरों ने उसका इलाज शुरू किया. प्रिंस को डेक्सट्रोज दिया गया. उसे हर संभव दवा और इलाज दिया गया.

मुजफ्फरपुर में 129 बच्चों की दर्दनाक मौत अकेले आंकड़ों या मेडिकल इमरजेंसी की कहानी नहीं है. यह पीड़ितों परिवारों की टूटी हुई उम्मीदों और जीवन की कहानी है.
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चार लाख रुपए का चेक तो मिला लेकिन....
शीला कहती हैं, 'मेरा बेटा स्वस्थ था और उसमें पहले कभी भी बीमारी के लक्षण नहीं दिखे.' इस क्षेत्र में चल रही मौतों के बारे में जान रही शीला को एएनएम ने बताया था कि वह अपने बच्चों को लीची के पास नहीं जाने दे.' शीला ने कहा कि उन्होंने अपने बच्चों को किसी भी तरह की बीमारी से बचाने के लिए ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ओआरएस) देने जैसे सभी एहतियाती कदम उठाया था.

शीला का दुख तब और बढ़ गया जब उसे पता चला कि अपने बच्चे की मौत के लिए 'मुआवजे' के रूप में मिला 4 लाख रुपये का चेक उसके पति के नाम पर नहीं था. शीला ने कहा, 'मेरे पति का नाम नुन्नो महतो है और ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर (बीडीओ) ने मुझे जो चेक दिया, वह तुलो महतो के नाम पर था, इसलिए मैंने इसे लौटा दिया.'

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रेखा की किस्मत भी शीला जैसी...
रेखा देवी भी बिहार में AES की शिकार हैं. दरियापुर गाँव की रहने वाली रेखा की किस्मत भी शीला जैसी है. उनकी सात वर्षीय बेटी निधि ने एईएस के चलते दम तोड़ दिया. निधि अपने पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी थीं और श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज अस्पताल (SKMCH) में उसकी मौत हो गई.

रेखा का घर लीची और आम के बाग से घिरा हुआ है. चूंकि उसे इस क्षेत्र में बच्चों की मौत की जानकारी थी, इसलिए उसने अपने बच्चों को बाग में जाने से रोकने सावधानी बरती.

रेखा के पति सुबोध पासवान ने कहा, 'हमने पूरी कोशिश की लेकिन मैं अपनी बेटी को नहीं बचा सका.'

चार घंटे जिन्दा रही निधी
13 जून को निधी ने सुबह 9 बजे जागने के बाद खाना खाय. उसे सिरदर्द था इसलिए वह और सोना चाहती थी. रेखा ने कहा, 'उसे पहले कभी कोई समस्या नहीं हुई लेकिन उस दिन अचानक सुबह 9 बजे के आस-पास अपना खाना खाते समय उसके शरीर में ऐंठन होने लगी.'

निधि के पिता सुबोध के अनुसार, निधि को पहले कांटी ब्लॉक के एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में ले जाया गया. वह सुबह 10.30 बजे वहां पहुंची और उसे दो बोतल स्लाइन वॉटर दिया गया. इसके बाद उसे श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज (एसकेएमसीएच) रेफर कर दिया गया.

सुबोध ने कहा, 'मैं निधि को 11.30 बजे तक SKMCH ले गया, जहां उसे तुरंत कुछ दवा दी गई. वह लगभग चार घंटे तक जीवित रही और लगभग 3.15 बजे मृत घोषित कर दिया गया.'

30 से नीचे था निधि का शुगर लेवल
एसकेएमसीएच के चिकित्सा अधीक्षक सुनील कुमार शाही ने बताया 'उसका शुगर लेवल 30 से नीचे था. 50 से कम शुगर लेवल घातक है. ऐसे में वह बच नहीं पाई. उन्होंने कहा कि 'ऐसे मामलों में हमेशा सलाह दी जाती है कि मरीजों को तुरंत अस्पताल ले जाया जाए, लेकिन कभी-कभी माता-पिता स्थिति की गंभीरता को नहीं समझते हैं और अपने बच्चों को समय पर अस्पतालों में लाने में देरी करते हैं और यह घातक साबित होता है,

बाल रोग विशेषज्ञ अरुण कुमार शाह ने कहा, 'बच्चे को हाइपोग्लाइसीमिया है या कुछ अन्य समस्याएं हैं तो चार घंटे के भीतर बच्चे को अस्पताल ले जाया जाना चाहिए.'

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First published: June 23, 2019, 1:41 PM IST
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