फूलन देवी की कहानी देखकर उन्‍होंने पूछा था, “का मर्दवा, मजा आवा?”

बैंडिट क्‍वीन का कास्‍ट कनेक्‍शन बाद में समझ आया. ये भी कि अपनी सारी पिछड़ी पहचान के बावजूद मर्द आखिर मर्द है. जाति के जिस तार से वो मर्द दूसरे मर्दों के साथ जुड़ाव महसूस करते थे, फूलन के लिए नहीं किया. फूलन की कहानी देखकर भी अपने दूसरे मर्द दोस्‍त से यही कहा, “का मर्दवा, मजा आवा.”

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 25, 2019, 1:36 PM IST
फूलन देवी की कहानी देखकर उन्‍होंने पूछा था, “का मर्दवा, मजा आवा?”
फूलन देवी की पुण्‍यतिथि पर विशेष
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 25, 2019, 1:36 PM IST
आज फूलन देवी की पुण्‍यतिथि है और आज एक बार फिर मैं ये कहानी सुनाना चाहती हूं.

कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जिसे लिखकर भी हम उससे मुक्‍त नहीं हो पाते. वो बार-बार लौट-लौटकर आती हैं. जितनी बार जिस भी संदर्भ में फूलन देवी का नाम आए, मुझे याद आता है कि बड़े होते हुए मेरे आसपास की दुनिया ने कैसे उस औरत से मेरा परिचय करवाया था और बड़े होकर मैंने कैसे उस औरत को जाना. दोनों में इतना फांक है कि जितना अंधेरे और उजाले में होगा, जितना सांस लेने और सांस रुक जाने में है.

1994, इलाहाबाद
एक दिन अखबार में एक स्‍त्री डाकू की तस्‍वीर छपी थी. वो 11 साल बाद जेल से रिहा हुई थी. प्रदेश में सपा की सरकार थी और मुलायम सिंह यादव मुख्‍यमंत्री थे. उन्‍होंने उस महिला डाकू पर लगे सारे आरोप खारिज कर दिए थे और उसे आजाद कर दिया था. इस खबर के साथ बॉक्‍स में उस औरत की पूरी कहानी लिखी थी. उसने बहमई के 22 ठाकुरों को गोली मार दी थी. कहानी में लिखा था कि उन ठाकुरों ने उसके साथ रेप किया था और गांव में नंगा घुमाया था. उत्‍तर प्रदेश के हिंदी अखबार में वो कहानी कुछ ऐसे नहीं छपी थी कि याद रह जाए. लेकिन तथ्‍यों को पढ़कर मन में जो एक चित्र बना, वो ये था कि एक औरत थी. गांव की गरीब, कमजोर, छोटी जात वाली औरत. ऊंची जात वाले मर्दों ने उसके साथ रेप किया. फिर एक दिन वो बंदूक लेकर गई और उन सबको गोली से उड़ा दिया. अगर आप एक लड़की हैं, भले ही सिर्फ 13 साल की हैं, लेकिन लड़की हैं और एक ऐसी दुनिया में बड़ी हो रही हैं, जहां 13 साल की उम्र तक ये कई बार हो चुका है कि भीड़ में, मेले में, घर में, गांव में, भीड़ भरे टैंपो में मर्दों ने इधर-उधर छूने की कोशिश की, छाती पर हाथ मारा तो भले आपको रेप का ठीक-ठीक मतलब न पता हो, लेकिन उस डाकू औरत की ये कहानी पढ़कर “अच्‍छा सा” महसूस होगा. मुझे भी हुआ था. वरना तो आए दिन अखबार में ऐसी खबरें छपती ही थीं कि “महिला के साथ रेप, गांव में नंगा करके घुमाया.” लेकिन इसके पहले कब ऐसी खबर छपी थी कि “महिला ने नंगा करके घुमाने वालों को गोली से उड़ाया.”

गोली से उड़ाने वाली उस डाकू का नाम फूलन देवी था, जिसे 2011 में टाइम मैगजीन ने इतिहास की 16 सबसे विद्रोहिणी स्त्रियों की सूची में रखा था. टाइम ने जिसे इतनी इज्‍जत बख्‍शी, उसका अपना मुल्‍क उसे किस तरह देख रहा था?

अपने गैंग के साथ फूलन देवी
अपने गैंग के साथ फूलन देवी


एक साल बाद, 1995, इलाहाबाद
Loading...

गंगा घाट पर बसा वो रसूलाबाद मोहल्‍ला यादवों का गढ़ था, जहां गली के आखिरी छोर पर एक यादव जी के बड़े से मकान में हम किराएदार थे. उस गली में जौनपुर और आासपास के इलाकों से आए कॉम्‍पटीशन की तैयारी कर रहे ढेर सारे यादव लड़के रहते थे. नजदीक के सिनेमा हॉल अवतार में वो फिल्‍म लगी थी, ‘बैंडिट क्‍वीन’, जिसके बारे में मुझे सिर्फ इतना पता था कि वो फूलन देवी पर बनी है. एक दिन मैंने छत पर चार यादव लड़कों को बात करते सुना कि “का मर्दवा, ऊ फिल्‍म देख आए. मजा आवा.” फिर उनके जोर के ठहाकों की आवाज. दबे-छिपे कई बार आसपास के मर्दों को उस फिल्‍म की बात करते सुना, लेकिन हर बार उस बात में एक विचित्र बेशर्म हंसी होती. यहां मैंने बार-बार उन लड़कों के यादव होने का जिक्र इसलिए किया है कि कास्‍ट आइडेंटिटी और पॉलिटिक्‍स से भी ये मेरा शुरुआती साबका था. उस गली का हर व्‍यक्ति अपनी जाति का तमगा अपने माथे पर सजाए घूमता था. “मिले मुलायम-काशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम” के नारों से पूरी गली गूंजी थी. बैंडिट क्‍वीन का कास्‍ट कनेक्‍शन तो मुझे कई साल बाद जाकर समझ में आया. और ये भी कि अपनी सारी पिछड़ी पहचान के बावजूद मर्द आखिर मर्द है. जाति के जिस तार से वो मर्द दूसरे मर्दों के साथ जुड़ाव महसूस करते थे, फूलन के लिए नहीं किया. फूलन की कहानी देखकर भी अपने दूसरे मर्द दोस्‍त से यही कहा, “का मर्दवा, मजा आवा.” और दूसरी ओर आज भी अनेकों बार अपने प्रिवेलेज्‍ड कास्‍ट की गाली खाने वाली मैं थी, जो 14 साल की उम्र में फूलन की कहानी के साथ “का मर्दवा, मजा आवा” सुनकर डर गई थी. ये ऐसा ही था कि घर में किसी के मरने पर शहनाई बजाई जा रही हो.

हालांकि तब तक भी मुझे पता नहीं था कि वो फिल्‍म आखिर है क्‍या.

जून, 1999, इलाहाबाद
मैं यूनिवर्सिटी में पढ़ती थी. उस दिन क्लास करने का मन नहीं था. मैं और मेरी एक दोस्त क्लास बंक करके सिविल लाइंस के राजकरन पैलेस सिनेमा हॉल पहुंचे एक फिल्म देखने- 'बैंडिट क्वीन'. तब मैं सिर्फ साढ़े अठारह साल की थी.

गेटकीपर ने हमें रोका. बोला, “आपके देखने लायक नहीं है.” हम दोनों थोड़ा घबराए हुए भी थे. एक बार को लगा कि लौट चलें. लेकिन हम लौटे नहीं. हिम्मत जुटाई और कहा,
“नहीं हमें देखनी है फिल्म.”
“एक सीन बहुत खराब है मैडम.”
“कोई बात नहीं.”

फिल्‍म ‘बैंडिट क्‍वीन’ का पोस्‍टर
फिल्‍म ‘बैंडिट क्‍वीन’ का पोस्‍टर


वो रहस्यपूर्ण बेशर्मी से मुस्कुराया. हालांकि उस उम्र तक वह रहस्यपूर्ण बेशर्मी हमारे लिए कोई नई चीज नहीं थी. हम इलाहाबाद में बड़े हो रहे थे और इस तरह के अश्लील इशारों से खूब वाकिफ थे.
फिलहाल हमें भीतर जाने को मिल गया. भीतर का नजारा तो और भी वहशतजदा था. शहर के सारे लफंगे जमा हो गए लगते थे. पान चबाते, गुटका थूकते, जांघें खुजाते, पैंट की जिप पर हाथ मलते, एक आंख दबाते, हम दोनों को देखकर अपने साथ के लोगों को कोहनी मारते, इशारे करते हिंदुस्तान के इंकलाबी नौजवान किसी बेहद मसालेदार मनोरंजन के लालच में वहां इकट्ठा हुए थे. भीतर जाकर हमें थोड़ा डर लगा था, पर तभी हमारी नजर एक प्रौढ़ कपल पर पड़ी. हमने थोड़ी राहत की सांस ली. भला हो उस फटीचर सिनेमा हॉल का कि जहां नंबर से बैठने का कोई नियम नहीं था. सो हमने कोने की एक सीट पकड़ी. हमारे बगल वाली सीट पर वो आंटी बैठीं और हम फिल्म देखने लगे.

मैंने जिंदगी में बहुत सी तकलीफदेह फिल्में देखी हैं, पर वो मेरी याद में पहली ऐसी फिल्म थी, जिसका हर दृश्य हथौड़े की तरह दिलोदिमाग पर नक्श होता जा रहा था. वो दुख का कभी न खत्म होने वाला सिलसिला जान पड़ती थी. जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती जाती, लगता मैं सुलगते हुए अंगार निगल रही हूं. पूरी फिल्म में रोती रही. रोते-रोते आंखें सूज आईं. आवाज गले में ही अटकी रही. मैं कांपती, बदहवास और संज्ञाशून्य सी उस फिल्म को देखती रही. फूलन देवी का दर्द अपनी ही धमनियों में दौड़ता सा लगा था.

हमसे आगे वाली रो में बैठे दो लड़के बीच-बीच में मुड़-मुड़कर हम दो लड़कियों को देख रहे थे और बेहयाई से मुस्कुरा रहे थे. बलात्कार और पानी भरने के लिए कुएं पर जाने वाले दृश्य में वो बार-बार पलट-पलटकर हमें देखते रहे. उन्होंने दसियों बार हमें गंदे इशारे किए. हम दोनों ने कसकर एक-दूसरे का हाथ पकड़ रखा था. एक-दूसरे की हथेली के पसीने से हमारे हाथ भीगे थे और हमारे गाल आंसुओं से गीले थे. हम सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई उस स्त्री के हर दुख पर रोए. हम तब भी रोए, जब उसने विरोध किया. तब भी जब उसने उन आतताइयों पर दनादन गोलियां बरसाईं. तब भी जब बचपन में उसके साथ रेप करने वाले पति को उसने बंदूक की बट से मार-मारकर लहूलुहान कर दिया. हम उसकी जीत पर भी रोए, उसके सुख में भी, उसके दुख में भी.

लेकिन सवाल ये नहीं था कि हम किस बात पर रो रहे थे. सवाल ये था कि ठीक उन क्षणों में जब हम मर जाने जैसी तकलीफ महसूस कर रहे थे, हमारे आसपास के लोग, सिनेमा हॉल में मौजूद सैकड़ों दर्शक क्या कर रहे थे? वो क्या महसूस कर रहे थे?

उस दिन हुआ ये था कि फिल्म के सबसे तकलीफदेह हिस्सों पर हॉल में दनादन सीटियां बजीं और मर्दों की बेशर्म सिसकारियों की आवाजें आती रहीं. मर्दों ने फिल्म के सबसे दर्दनाक दृश्यों पर ठहाके लगाए थे. हमारे ठीक सामने बैठे वो दोनों लड़के रो नहीं रहे थे. वो पलट-पलटकर हमें देख रहे थे और इशारे कर रहे थे. वो मेरी तब तक की जिंदगी का सबसे दुखद क्षण था. मैं इतना दर्द महसूस कर रही थी कि उसी क्षण मर जाना चाहती थी. मुझे लगा कि मैं खड़ी होकर जोर से चीखूं. सबकी हत्या कर दूं. फूलन देवी पर्दे से बाहर निकल आए और उन ठाकुरों के साथ-साथ हॉल में बैठे सब मर्दों को गोली से उड़ा दे. जून, 99 की वो दोपहर मेरे जेहन पर ऐसे टंक गई कि वक्त का कोई तूफान उसे मिटा नहीं सका. आज भी आंख बंद करती हूं तो वो दृश्य फिल्म की रील की तरह घूमने लगता है.
--------------
तो ये थी कहानी. ये कहानी दरअसल फूलन की नहीं, मेरी है. उस औरत को जानने, उसे समझने की कहानी, उसके साथ अपनापा महसूस करते मेरे मन, उसके लिए इज्‍जत और मुहब्‍बत से झुकते मेरे सिर की कहानी. और कहानी उस समाज की, जिसकी कहानी देखकर वो पूछते थे, “का मर्दवा, मजा आवा?”

ये भी पढ़ें - 

इसीलिए मारते हैं बेटियों को पेट में ताकि कल को भागकर नाक न कटाएं
मर्द खुश हैं, देश सर्वे कर रहा है और औरतें बच्‍चा गिराने की गोलियां खा रही हैं
फेमिनिस्‍ट होना एक बात है और मूर्ख होना दूसरी
कपड़े उतारे मर्द, शर्मिंदा हों औरतें
मर्दाना कमज़ोरी की निशानी है औरत को 'स्लट' कहना
अरे भई, आप इंसान हैं या फेसबुक पोस्ट ?
फेसबुक के मुहल्ले में खुलती इश्क़ की अंधी गली
आंटी! उसकी टांगें तो खूबसूरत हैं, आपके पास क्‍या है दिखाने को ?
इसे धोखाधड़ी होना चाहिए या बलात्कार?
'पांव छुओ इनके रोहित, पिता हैं ये तुम्हारे!'
देह के बंधन से मुक्ति की चाह कहीं देह के जाल में ही तो नहीं फंस गई ?
स्‍मार्टफोन वाली मुहब्‍बत और इंटरनेट की अंधेरी दुनिया
कितनी मजबूरी में बोलनी पड़ती हैं बेचारे मर्दों को इस तरह की बातें
मर्द की 4 शादियां और 40 इश्‍क माफ हैं, औरत का एक तलाक और एक प्रेमी भी नहीं
'वर्जिन लड़की सीलबंद कोल्ड ड्रिंक की बोतल जैसी'- प्रोफेसर के बयान पर पढ़ें महिला का जवाब
इसलिए नहीं करना चाहिए हिंदुस्‍तानी लड़कियों को मास्‍टरबेट
क्‍या होता है, जब कोई अपनी सेक्सुएलिटी को खुलकर अभिव्यक्त नहीं कर पाता?
ड्राइविंग सीट पर औरत और जिंदगी के सबक
दिल्ली आने वाली लड़कियों! तुम्हारे नाम एक खुली चिट्ठी...

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए इलाहाबाद से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: July 25, 2019, 1:36 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...