चीन के खिलाफ उठाए गए भारत के कदमों से हमेशा के लिए बदल जाएगी भू-राजनीति?

चीन के खिलाफ उठाए गए भारत के कदमों से हमेशा के लिए बदल जाएगी भू-राजनीति?
भारत ने चीन 59 ऐप्स को प्रतिबंधित कर बड़ा कदम उठाया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

चीन (China) की आक्रामकता (Aggression) का जवाब भारत (India) उसी की भाषा में दे रहा है. सैन्य अधिकारियों (Military Officials) की वार्ता के सकारात्मक नतीजे न निकलते देख भारत ने चीन के 59 ऐप्स को प्रतिबंधित कर दिया. माना जा रहा है कि भारत के इस कदम से एशिया की भू-राजनीति (Geopolitics) दीर्घकाल के लिए बदलने वाली है.

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नई दिल्ली. भारत और चीन (India and China) के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के बीच मीटिंग के ठीक एक दिन पहले केंद्र सरकार ने 59 चीनी ऐप्स को प्रतिबंधित करने का फैसला लिया. इनमें से कई ऐप ऐसे हैं जो भारत के घर-घर में पहचाने जाने लगे हैं. कहा जा रहा है कि अब अगर चीन फिर से सीमा विवाद में अपनी पोजीशन पर लौटने के लिए तैयार हो जाए, तब भी भारत के साथ उसके संबंध सामान्य नहीं होंगे. दोनों देशों के बीच संबंधों में आई ये खटास अब लंबे समय तक बनी रह सकती है. दरअसल भारत का विश्वास तोड़ा गया है. वर्तमान हालात और भारत के हालिया कठोर कदम की वजह से भविष्य की भू-राजनीति में बड़े बदलाव आ सकते हैं. और इसका प्रभाव भारत की विदेश नीति पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है.

सैन्य अधिकारियों की बातचीत
मंगलवार को भारत और चीन के सैन्य अधिकारियों के बीच तीसरे राउंड की बातचीत हुई. पहली बातचीत 6 जून को हुई थी जिसमें अपनी पुरानी पोजीशन पर लौट जाने को लेकर सहमति बनी थी. लेकिन इसके बाद 15 जून को गलवान घाटी में बड़ी घटना घटित हुई. 22 जून को एक बार फिर अधिकारियों के बीच बातचीत हुई लेकिन इसके बाद भी चीनी सैनिक अपनी पोजीशन छोड़ने को तैयार नहीं हैं. तो फिर आखिर इस तीसरी बातचीत का क्या मतलब है? जब आपसी सहमति के बाद भी चीन के सैनिक पीछे हटने को राजी नहीं हैं.

दोनों ही पक्ष ही जानते हैं कि सैन्य अधिकारी स्तर की बातचीत सिर्फ बातचीत के लिए हो रही है. उदाहरण के लिए एक बार पीएम मोदी के बयान को सुनिए-उन्होंने चीन को आक्रामक बताया और फोर्स ऑफ इविल कहा. पीएम के शब्दों से लगा जैसे भारत को ठगा गया है. और शायद यही वजह थी की चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध का फैसला लिया गया. शायद सैन्य अधिकारी स्तर की बातचीत पर्याप्त नहीं थी.



अगर चीन मान जाए तो?


अब मान लीजिए कि अगर भविष्य में चीन लद्दाख पर अपनी गलती मानते हुए वापस लौट जाता है. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारतीय पीएम से बात करते हैं. और भी कई ऐसे कदम उठाए जाएं तो भी क्या भारत का भरोसा जीता जा सकता है? शायद नहीं. क्योंकि चीन का ट्रैक रिकॉर्ड जानते हुए पीएम मोदी के लिए भी देशवासियों को भरोसा दिलाना बेहद मुश्किल होगा. अब जो स्थितियां बन चुकी हैं इसके बाद अब भारत लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल से अपनी नजर एक क्षण के लिए नहीं हटा सकता है. कम से कम तब तक जब तक चीन में तानाशाही कम्युनिस्ट शासन है.

सीमाओं पर बढ़ानी होगी निगरानी
अब भारत कम से कम अगले कुछ समय तक के लिए सीमाओं पर सेनाओं की निगरानी बढ़ा सकता है. एक शांतिपूर्ण देश की पहचान रखने वाला भारत कभी भी किसी विवाद की शुरुआत नहीं करेगा. भारतीय सैनिक चीनी सेना को जवाब दे सकने में पूरी तरह सक्षम हैं. गलवान घाटी की घटना से अंदाजा लगाया जा सकता है कि चीन ये बताने तक को तैयार नहीं कि उसके सैनिकों का क्या हुआ?

वैश्विक दबाव
इस दौरान रणनीतिक समझौते भी तेज हो सकते हैं. जब चीन और भारत में विवाद बढ़ा हुआ है ठीक उसकी वक्त अमेरिका की तरफ से सीरीज में स्टेटमेंट जारी कर चीन की आलोचना की गई है. बीते सप्ताह एफबीआई के हेड क्रिस्टोफर फ्रे ने चीन को सबसे बड़ा खतरा बताया था. इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया की तरफ से भी आक्रामक स्टेटमेंट दिए गए हैं. दरअसल अभी जो स्थितियां बन रही हैं उसके मुताबिक ये पूरा विवाद सिर्फ भारत और चीन के बीच सिमटा हुआ नहीं है. चीन की विस्तारवादी नीतियों की वजह से दुनिया के कई देश इस नए 'कोल्ड वॉर' में प्रतिक्रिया दे सकते हैं. अब देखने वाली बात होगी कि इसमें यूरोपियन यूनियन और रूस का क्या रोल हो सकता है. ये सच है कि यूरोपीय यूनियन का चीन से सीमाओं को लेकर कोई विवाद नहीं है लेकिन दोनों के बीच सैद्धांतिक दिक्कतें हैं.

बदल रही भू-राजनीति
दरअसल भू-राजनीतिक परिस्थितियां बदल रही हैं. भारत ने अभी एक आक्रामक फैसला लिया है जो चीन के लगातार दिखाए जा रहे हठ के विरोध में है. भारत की तरफ से ये भी स्पष्ट कर दिया गया है कि चीन का धमकाने वाला आक्रामक रवैया बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. अब भारत द्वारा उठाए गए इन कदमों के दीर्घकालिक परिणाम हो सकते हैं. (Karthik Subbaraman की स्टोरी से इनपुट्स के साथ. पूरी स्टोरी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
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