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अजित पवार आखिर कब तक ‘घड़ी’ देखकर अपने ‘अच्छे दिन’ का इंतज़ार करते?

Kinshuk Praval | News18Hindi
Updated: November 25, 2019, 5:20 PM IST
अजित पवार आखिर कब तक ‘घड़ी’ देखकर अपने ‘अच्छे दिन’ का इंतज़ार करते?
एनसीपी प्रमुख शरद पवार का सरकार बनाने के लिए खींचा गया लंबा वक्‍त और अजित पवार के बीजेपी के साथ जाने से महाराष्‍ट्र की सियासत में कई सवाल उलझ गए हैं.

अजित पवार (Ajit Pawar) को लगा कि ये वक्त फैसला लेकर एनसीपी को संदेश देने के लिए भी ज़रूरी है ताकि मराठा क्षत्रप शरद पवार (Sharad Pawar) के वो निर्विवाद वारिस घोषित हो सकें.

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  • Last Updated: November 25, 2019, 5:20 PM IST
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जिसका हाथ थामकर राजनीति के गलियारे में दाखिल हुए और जिससे राजनीति का ककहरा सीखा आज उसी चाचा के खिलाफ लिए गए फैसले ने भतीजे को बागी बना दिया. अजित पवार पर एनसीपी और चाचा शरद पवार के साथ दगाबाज़ी के आरोप लग रहे हैं. पूरा मामला कुछ वैसा ही लगता है जैसे कि शादी में ऐन फेरे से पहले दुल्हा मंडप से फरार हो गया. महाराष्ट्र में शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी की बेमेल सियासी शादी में यही उलटफेर देखने को मिला. अजित पवार सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ कर बनाए गए मंडप से भाग गए लेकिन सिर्फ भागे ही नहीं बल्कि बारातियों के पासपोर्ट और रिटर्न टिकट भी साथ ले गए.

सवाल ये उठता है कि क्या अजित पवार आखिर कब तक ‘घड़ी’ देखकर अपने ‘अच्छे दिन’ का इंतज़ार करेंगे? क्या अजित पवार राजनीति की शतरंज में अपनी चाल चलने के लिए लंबे राजनीतिक अनुभव के बावजूद अभी भी परिपक्व नहीं हैं?


दरअसल, अजित पवार के इस ऐतिहासिक राजनीतिक फैसले को उस राजनीतिक विरासत की पुरज़ोर कमान संभालने के संदर्भ में देखा जा सकता है जो कि हमेशा से परिवारवाद की राजनीति में देखा गया है. अजित पवार को लगा कि ये वक्त फैसला लेकर एनसीपी को संदेश देने के लिए भी ज़रूरी है ताकि मराठा क्षत्रप शरद पवार के वो निर्विवाद वारिस घोषित हो सकें. दरअसल, अजित पवार के सामने किसी बाहरी की नहीं बल्कि बहन सुप्रिया सुले की चुनौती है. ये चुनौती ठीक उसी तरह है जैसे कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता रहे गोपीनाथ मुंडे के भतीजे धनंजय मुंडे को कभी पार्टी में देखनी पड़ी जिसके बाद साल 2013 में बीजेपी छोड़कर धनंजय मुंडे एनसीपी में शामिल हो गए. धनंजय को लगता था कि बहन पंकजा मुंडे की वजह से पार्टी में हैसियत कम होती जा रही है. साल 2014 से शुरू हुई चचेरे भाई-बहनों की सियासी अदावत चुनाव दर चुनाव धारदार होती जा रही है. बीड जिले की परली विधानसभा सीट उस सियासी जंग का हर पांच साल में गवाह बनती है. साल 2014 में पंकजा मुंडे जीतीं तो इस बार धनंजय ने उन्हें हरा दिया.हालांकि, पवार परिवार में ऐसी तलवारें म्यान से बाहर नहीं निकली हैं लेकिन जब ‘घड़ी’ खराब होने लगती है तो समय बदलने में देर नहीं लगता है.

समर्थन का फैसला अजित पवार ने लिया जिस पर भरोसा कर बीजेपी ने पूरा मंच सजाया. लेकिन मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तब निशाने पर बीजेपी और राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी रहे. सवाल सुबह 5 बजकर 17 मिनट पर राष्ट्रपति शासन हटने पर उठ रहे हैं तो सवाल सुबह मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री पद के शपथग्रहण पर उठ रहे हैं. ये दलीलें दी जा रही हैं कि घुड़सवार ही भागा है और घोड़े अपनी जगह अस्तबल में हैं. लेकिन ये कोई साफ-साफ नहीं बता पा रहा है कि अस्तबल के घोड़ों की लगाम किसके हाथ में है?  इन सबके बीच अजित पवार चुप हैं और धीरे-धीरे पत्ते खोले जा रहे हैं ताकि एनसीपी के विधायकों को ये भरोसा दिलाया जा सके कि अजित पवार ने पार्टी हक में सही फैसला सही वक्त मे लिया. पहले वो डिप्टी सीएम बने तो उसके 24 घंटों के बाद ही उन्हें एंटी करप्शन ब्यूरो ने सिंचाई घोटाले के 9 मामलों से क्लीन-चिट मिल गई. एसीबी के क्लीन-चिट देने की टाइमिंग पर भी सवाल उठ सकते हैं. लेकिन ये सिर्फ अजित पवार के लिए ही एक भरोसा जगाने वाली राहत नहीं है बल्कि एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार के लिए भी एक संदेश है कि भतीजे पर भरोसा करने का समय आ गया है.

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महाराष्ट्र में मचे सियासी घमासान के बीच अजित पवार केंद्र बिंदु बन गए हैं.


राजनीति में हर व्यक्ति अपनी पहचान बनाना चाहता है. जब पहचान बन जाती है तो शख्सीयत को बरकरार रखना चाहता है. अजित पवार भी साल 2014 की तरह अपनी शख्सीयत को अगले पांच साल तक दोबारा से नेपथ्य में फिक्स-डिपॉज़िट नहीं करना चाहते ने. न ही वो अपने करियर को गिरफ्तारी की लटकती तलवार के बीच झूलते देखना चाहते थे. उनके पास विकल्प साफ था. दोनों जगह उनके पास डिप्टी सीएम बनने का मौका था लेकिन बीजेपी के साथ ‘बम्पर ऑफर’ भी था. बहरहाल, शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी के विधायकों का होटल टूर जारी है. विधायकों को पर्दे के पीछ रख कर पहरेदारी जारी है. फ्लोर-टेस्ट के लिए तैयारियां की जा रही हैं. लेकिन इन सबसे बेफिक्र देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद का कार्यभार संभाल लिया. बीजेपी कह सकती है कि सरकार चल निकली.

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First published: November 25, 2019, 5:19 PM IST
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