• Home
  • »
  • News
  • »
  • nation
  • »
  • 2024 में नरेंद्र मोदी का चैलेंजर बनने के लिए ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने राहुल गांधी को कैसे पछाड़ा

2024 में नरेंद्र मोदी का चैलेंजर बनने के लिए ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने राहुल गांधी को कैसे पछाड़ा

ममता ने साबित कर दिया कि जरूरत पड़ने पर वह उठ सकती हैं और भाजपा का पुरजोर मुकाबला कर सकती हैं.

ममता ने साबित कर दिया कि जरूरत पड़ने पर वह उठ सकती हैं और भाजपा का पुरजोर मुकाबला कर सकती हैं.

Loksabha Election 2024: विपक्ष असमान ताकतों की एक सेना है, जिसके पास एक कमांडर इन चीफ भी नहीं है, जो युद्ध के मैदान में अपनी सेना का नेतृत्व कर सके. पूर्णकालिक अध्यक्ष के बिना कांग्रेस नेतृत्वहीन है.

  • News18Hindi
  • Last Updated :
  • Share this:

    (राधिका रामसेशन)

    इससे पहले कि हमें एहसास हो, अगला लोकसभा चुनाव हमारे सिर पर होगा, जिसको लेकर अब तक उत्साह और अपेक्षाओं की हिलोरें उठनी चाहिए थीं, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा. भाजपा सुकून से बैठी है, जिसके वर्चस्व को चुनौती देने वाला कोई दिखाई नहीं देता. सवाल यह नहीं है कि केंद्र में तीसरी बार बीजेपी सरकार बनेगी या नहीं, बल्कि विपक्ष का गेम प्लान क्या है? अगर है भी तो. विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर कांग्रेस को बीजेपी-एनडीए के गठबंधन को मात देने के लिए विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करना चाहिए, लेकिन विपक्ष असमान ताकतों की एक सेना है, जिसके पास एक कमांडर इन चीफ भी नहीं है, जो युद्ध के मैदान में अपनी सेना का नेतृत्व कर सके. पूर्णकालिक अध्यक्ष के बिना कांग्रेस नेतृत्वहीन है. सोनिया गांधी यह जाहिर करती हैं कि वह पार्टी की अनिच्छुक अंतरिम अध्यक्ष हैं. उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी राहुल गांधी अस्थिर और जिद्दी दिखाई पड़ते हैं, जिनकी कोशिश कुछ हासिल किए बिना अपनी स्थिति मजबूत करने की है. पार्टी के ही 23 असंतुष्टों नेताओं का समूह मौके की तलाश में है. दूसरी ओर मुट्ठी भर राज्यों में जहां कांग्रेस सत्ता में है, वहां आंतरिक कलह हावी है, जिसे हाईकमान भी हवा देता रहता है. स्पष्ट तौर पर कोई नया क्षेत्र दिखाई नहीं देता, जहां कांग्रेस अपनी घेराबंदी कर सके.

    ऐसे में विपक्ष की उम्मीद कहां है? सब कुछ खत्म नहीं हुआ है, क्योंकि नजर को थोड़ा दूर ले जाएं तो दो क्षेत्रीय नेता हैं, दोनों मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय आकांक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं को खुलकर जाहिर किया है और कठिन बाधाओं के बावजूद उन्हें साकार करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल, पश्चिम बंगाल और दिल्ली के मुख्यमंत्री, क्षत्रपों की भीड़ में हैं, जिनकी नजर केंद्र पर है, भले ही वे अपनी सीमाओं के भीतर काम करते हों. तमाम बाधाओं के साथ, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने अपने भौगोलिक दायरे में सीमित नहीं रहने के इरादे स्पष्ट कर दिए हैं. ऐसे में ये जानना दिलचस्प है कि ऐसे कौन कारण हैं, जिन्होंने दोनों मुख्यमंत्रियों की महत्वाकांक्षाओं को पंख दिए हैं और 2024 की चुनावी जंग में राहुल गांधी के आगे खड़ा कर सकते हैं.

    यूपी-उत्तराखंड के लिए AAP के ऐलान
    कुछ लोग कहेंगे कि यह केजरीवाल का दुस्साहस है, जो एक केंद्रशासित प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और उनके अधिकार सीमित हैं. बावजूद इन दलीलों के अरविंद केजरीवाल मैदान में हैं, पंजाब में आम आदमी पार्टी एक बार फिर पूरी ताकत के साथ चुनावी मैदान में उतर रही है. 2017 के चुनावों में खराब प्रदर्शन के बावजूद पार्टी एक बार फिर गोवा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में लड़ने की तैयारी में है. इन सभी राज्यों में 2022 में वोटिंग होगी. केजरीवाल ने गुजरात में भी पैर जमा लिया है, ये एक और राज्य है, जहां आने वाले दिनों में चुनाव होंगे. उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के लिए अपने एजेंडे का ऐलान करके अरविंद केजरीवाल ने बता दिया है कि वे दोनों राज्यों की सियासत को लेकर गंभीर हैं. पार्टी ने दोनों राज्यों के लिए लोकलुभावन वादे किए हैं. रोजगार की कमी वाले पहाड़ी राज्य के लिए केजरीवाल ने ‘हर घर रोजगार’ कार्यक्रम, बेरोजगार युवाओं के लिए 5,000 रुपये मासिक भत्ता, छह महीने की अवधि में 10,000 सरकारी नौकरियों का सृजन, उत्तराखंड के निवासियों के लिए सरकारी नौकरियों 80 फीसदी आरक्षण का वादे के साथ प्रवासी मंत्रालय के गठन का ऐलान किया है.

    पूर्वाेत्तर पर ममता की निगाह
    केजरीवाल ने हिंदुत्व में आस्था जताई है. ये सॉफ्ट तौर पर दिखता है, उन्होंने उत्तराखंड को आध्यात्म की वैश्विक राजधानी बनाने का वादा भी किया है. लोकलुभावन वादा? कम से कम ये वोटरों तक पहुंचने का एक तरीका तो है. उत्तर प्रदेश के लिए आम आदमी पार्टी ने किसानों के लिए मुफ्त बिजली के साथ अन्य के लिए 300 यूनिट मुफ्त बिजली और बकाये बिल को अलग करने का ऐलान किया है. वहीं ममता बनर्जी ने पूर्वोत्तर पर निगाह गड़ाई है. त्रिपुरा पहले लेफ्ट का गढ़ था, लेकिन अब टीएमसी ने राज्य की सियासत में गर्मी बढ़ा दी है. बीजेपी ने इसे नोट किया है, तो लेफ्ट अपना वर्चस्व फिर से स्थापित करने के लिए बेताब है. टीएमसी के जुझारू होने के बाद माकपा हरकत में आई और भाजपा के साथ सड़कों पर टकराव दिखने लगा. दूसरी ओर राहुल गांधी अपनी बहन प्रियंका गांधी के साथ कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं. और ऐसा लगता है कि पार्टी अपने ही एक शासित राज्य को खो देगी.

    विरासत बनाम सियासत
    भाजपा के अथक अभियान का धन्यवाद कि ‘वंशवाद’ अब एक बुरा शब्द है. राहुल एक विरासती, पांचवीं पीढ़ी के नेहरू-गांधी हैं. वंशावली को अब कोई विशेषता नहीं है, अब लोग काम, प्रतिष्ठान और कड़ी मेहनत की बात करते हैं. इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि ममता और केजरीवाल एक बदले हुए माहौल के बाय-प्रोडक्ट हैं, जबकि राहुल गांधी उत्तराधिकारी हैं. राहुल गांधी को कभी कांग्रेस में जगह के लिए लड़ना नहीं पड़ा, लेकिन कौन जानता है कि भविष्य क्या है? वहीं, ममता बनर्जी ने कांग्रेस से नाता तोड़ लिया, सीताराम केसरी के नेतृत्व को खारिज कर दिया, टीएमसी के तौर पर अपनी पार्टी बनाई. लेफ्ट से कई बार हारने के बावजूद उस पर कायम रहीं और अंत में सफलता का स्वाद चखा. एक राजनेता के रूप में वह जानती हैं कि उन्हें अकेले ही उस राजनीतिक पूंजी को बचाना और बनाना है, जो टीएमसी ने जमा की है. लिहाजा बीजेपी की ओर से एक बड़े खतरे का आभास होने और 2019 के लोकसभा चुनावों में लगा झटका ममता बनर्जी को अपना किला बचाने के लिए उकसाने को पर्याप्त था. ममता ने साबित कर दिया कि जरूरत पड़ने पर वह उठ सकती हैं और भाजपा का पुरजोर मुकाबला कर सकती हैं.

    अन्ना हजारे आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल को ये भलीभांति मालूम है कि मुख्यधारा की राजनीति ही उनके सब कुछ है और उन्होंने बिना किसी हिचक इसे स्वीकार किया है. दिल्ली में केजरीवाल की सफलता इसका स्पष्ट उदाहरण है.

    बीजेपी को उसी के दांव से मात
    ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल बिना किसी हिचक के बीजेपी की नकल करते हैं, क्योंकि उन्हें इलहाम है कि कांग्रेस बीता हुआ कल है और बीजेपी भविष्य है. दोनों नेताओं ने बीजेपी के दांवपेच को बखूबी अपनाया है, लेकिन राहुल गांधी ऐसा नहीं कर पाए हैं. केजरीवाल ने कभी भी सॉफ्ट हिंदुत्व की अपनी रणनीति को लेकर आंखें नहीं चुराई हैं, भले ही अगले चुनाव में उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़े. ममता बनर्जी ने बीजेपी के साथ वही किया है, जो बीजेपी ने विधानसभा चुनाव से पहले ममता के साथ किया. अगर बीजेपी ने टीएमसी से शुभेंदु अधिकारी को तोड़ा तो ममता बनर्जी ने इसकी भरपाई बीजेपी के चार विधायकों के साथ सांसद बाबुल सुप्रियो को तोड़कर किया. राहुल गांधी ने चुनावों के दौरान ‘जनेऊ’ धारण किया, मंदिर में जाकर शीश नवाया, लेकिन उन्हें इसकी कीमत ज्यादा भारी पड़ी.

    राजनीतिक दुस्साहस और सोची समझी रणनीति
    राजनीतिक दुस्साहस और धृष्टता के अलावा क्या कोई और चीज भी केजरीवाल को पंजाब, गोवा और अन्य राज्यों और ममता को उत्तर-पूर्व में ले जाती. यह एक सोची समझी रणनीति है. ममता ने कांग्रेस की सुष्मिता देव को अपने साथ ले लिया है. पूर्व कांग्रेस सांसद और राहुल गांधी की करीबी सुष्मिता देव को असम में टीएमसी को मजबूत करने का काम सौंपा गया है. राहुल गांधी अपने कंफर्ट जोन केरल के साथ चिपके हुए हैं. और ऐसा लगता है कि उन्होंने नेहरू-गांधी की सियासी जागीर रहे यूपी को छोड़ दिया है.

    सियासी वर्चस्व स्थापित करना
    ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने बीजेपी को मजबूर किया है कि वे उनकी चाल पर खेलें. दोनों नेताओं के बयान, एक्शन और पॉलिसी पर बीजेपी रिएक्ट करती है. राहुल गांधी भी प्रतिक्रिया देते हैं और अक्सर हंसी के पात्र बन जाते हैं. ममता बनर्जी के माथे पर पसीने की एक बूंद भी नहीं आई, जब बीजेपी ने उनके एक करीबी नेता को तोड़ लिया. संकट के समय ममता को खुद नैया पार लगानी थी, वहीं आम आदमी पार्टी को बड़ी गुटबाजी का सामना करना पड़ा, जब केजरीवाल ने पार्टी में अपनी स्थिति को सुप्रीमो के तौर पर गढ़ना चाहा, वर्चस्व स्थापित किया. दोनों नेताओं ने चुनावों में खुद को साबित किया और पार्टी के भीतर के आलोचकों को चुप करा दिया.

    वहीं, कांग्रेस के ‘ओल्ड गॉर्ड’ से निपटने में राहुल गांधी ने सहयोगी के बजाय दुश्मन ज्यादा बना लिए हैं. सबसे महत्वपूर्ण ये है कि राहुल गांधी पार्टी के भीतर खुद को सत्ता केंद्र के रूप में स्थापित करने का लिटमस टेस्ट अभी पास नहीं कर पाए हैं; मतलब ये कि वे कांग्रेस के लिए वोट जुटा सकते हैं.

    पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

    हमें FacebookTwitter, Instagram और Telegram पर फॉलो करें.

    विज्ञापन
    विज्ञापन

    विज्ञापन

    टॉप स्टोरीज