कैसे मानचित्र बनाने के प्रयासों के बीच दुनिया की छत पर शुरू हुआ था भारत-चीन युद्ध

कैसे मानचित्र बनाने के प्रयासों के बीच दुनिया की छत पर शुरू हुआ था भारत-चीन युद्ध
ह्वेनसांग के वृतांत के आधार पर तैयार किया गया था नक्शा (सांकेतिक फोटो)

आजादी के बाद से ही, भारतीय राजनयिक (Indian Diplomats) धीरे-धीरे चीनी नक्शे के पश्चिम की ओर खिसकते जाने को लेकर चिंतित थे- यह एक ऐसी प्रक्रिया थी जो कम्युनिस्ट क्रांति (Communist Revolution) से बहुत पहले ही शुरु हो गई थी.

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नई दिल्ली. काली बजरी के दर्रे- काराकोरम (Karakoram) से, हिमाचल के रास्ते से गुजरने वाले व्यापारियों की तुर्क बोली में- फ्रैंक लुडलो, चिप-चैप में उतरती हुई, मौन नदी, दौलत बेग ओल्डी (Daulat Beg Oldi) को जाती है, जहां एक महान रईस की मौत हुई थी. वहां से यह रास्ता खुले मैदान, दीपांग और फिर हाजी लंगर को जाता है, जहां मक्का (Meqqa) जाने वाले श्रद्धालुओं को भोजन कराया जाता था. इसके आगे बुर्तसे का कैंप ग्राउंड है, जिसका नाम एक औषधीय झाड़ी पर पड़ा है. यहां पर गालवान नदी के पहले पड़ने वाली आखिरी बाधा है, ये पहाड़ियां अक्साई चिन पठार (Aksai Chin plateau) तक जाती हैं. इन्हें कहते हैं मुर्गो, नर्क का द्वार.

लुडलो का नक्शा (Ludlow’s map), उन्होंने अपने 1928 के अभियान (expedition) के यात्रा वृतांत में एक सुरक्षित कैंप वाली जगह देखकर लिखा है, "एक झोपड़ी को पत्थरों और मिट्टी के ढेर से खाई के उल्टी ओर खड़ा किया गया है, जो हवाओं से बचाता है. मैंने इस झोपड़ी के अंदर देखा और पाया कि इसमें तीन खोपड़ियां और अन्य भयानक मानवीय अवशेष पड़े हुये थे."

दोनों देशों की राष्ट्रवादी बहस में इस जमीन को माना जाता है पवित्र
करीब 100 साल बाद, ये नाम अभी भी भारत और चीन के बीच दुनिया की सबसे ऊंची छत पर चल रही तनातनी में उभरते रहते हैं. दोनों ही देशों में राष्ट्रवादी चर्चाओं, इस जंगली पर्वतीय इलाके के प्रत्येक सेंटीमीटर को एक पवित्र जमीन के तौर पर देखा जाता है. जिसे 1962 के युद्ध में खून बहाकर पवित्र किया गया था.



यह संघर्ष क्यों और कैसे शुरू हुआ, इसे लेकर एक और कहानी बताई जाती है: सीमाओं, और मिथकों के बारे में एक कहानी, जिसे भूमि के नक्शे पर खोदा गया था, जब कोई भी नहीं थी. दोनों महान एशियाई राष्ट्र-राज्यों के अस्तित्व में आने के बाद से पिछली सदी सीमाओं की कल्पना और उसके लिए संघर्ष में गुजरी है.



ह्वेनसांग की यात्रा के आधार पर तैयार किया गया नक्शा
चार प्रमुख क्लासिकल चीनी साहित्य में एक माने जाने वाले में से एक उपन्यास 'पश्चिम की यात्रा' में कहा गया है, "घोड़ों का एक दल, उस एक शब्द से आगे नहीं निकल सकता है जो मुंह से निकल गया है." भिक्षु ह्वेनसांग ने बौद्ध धर्म के महान सूत्रों को इकट्ठा करने के लिए भारत और मध्य एशिया की यात्रा की. इस यात्रा के नौ शताब्दियों के बाद, उनकी अविश्वसनीय, सत्रह साल की यात्रा उपन्यास की नींव बन गई, जिसका श्रेय वू चेंग को दिया गया. 1762 में, ह्वेनसांग (Xuanzang) की यात्रा को बड़े पैमाने को चित्रित करने के लिए महान सम्राट कियानलॉन्ग के आदेश पर संकलित एक नक्शा पुस्तक में जोड़ा गया था.

मानचित्र में दिखाया गया कि हिंदुस्तान कुएन लुन श्रृंखला के दक्षिण में कहीं स्थित है. यह शब्द जीवन पा गया और यह नक्शा, सदियों बाद, अक्साई चिन के लिए भारत के दावों की नींव बनाने के लिए काम आएगा.

आजादी के बाद से ही, भारतीय राजनयिक धीरे-धीरे चीनी नक्शे के पश्चिम की ओर खिसकते जाने को लेकर चिंतित थे- यह एक ऐसी प्रक्रिया थी जो कम्युनिस्ट क्रांति से बहुत पहले ही शुरू हो गई थी. 1920 के दशक की शुरुआत में, विदेश मंत्रालय ने 1960 के एक दस्तावेज में उल्लेख किया "चीनी मानचित्र पारंपरिक सीमा से भटक गया है, और इसमें भारतीय क्षेत्र के बड़े क्षेत्र शामिल कर लिये गये हैं".

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