बंजर ज़मीन पर खेती के लिए मजबूर हैं किसान, कैसे दोगुनी होगी आय?

भारतीय किसान (File Photo)

देश में ऐसी ज़मीन जिस पर खेती नहीं होती अब 100 लाख हेक्टेयर तक बढ़ गई है जबकि किसान बंजर ज़मीन पर खेती करने के लिए मजबूर हैं. ऐसे कैसे दोगुनी होगी किसानों की आय?

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28 फ़रवरी 2016 को किसानों की एक रैली में खुद पीएम नरेंद्र मोदी ने ऐलान किया था कि देश के किसानों की आय साल 2022 तक दोगुना करने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है. इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए कृषि मंत्रालय में काम करने वाले वरिष्ठ आईएएस अधिकारी डॉ. अशोक दलवई की देखरेख में एक समिति बनाई गई थी. इसी समिति की सातवीं रिपोर्ट में सामने आया है कि साल 1970-71 के बाद से गैर कृषि भूमि क्षेत्र 100 लाख हेक्टेयर तक बढ़ गया है. इसकी वजह बंजर होती ज़मीन नहीं बल्कि उपजाऊ ज़मीन पर उद्योग और नई टाउनशिप बनाया जाना है.

क्या कह रही है रिपोर्ट
बता दें कि अशोक दलवई की ये समिति देश में कृषि नीति से संबंधित 14 खंडों की एक व्यापक समीक्षा रपोर्ट देने वाली है. इस रिपोर्ट के 13 खंड अभी तक सार्वजनिक हो चुके हैं जिन पर नज़र डालने से साफ़ हो जाता है कि किसानों की आय दोगुनी करना कितना मुश्किल है. ये समिति जैसे-जैसे कृषि क्षेत्र का आकलन कर रही है, वैसे-वैसे कृषि संकट की गंभीरता का पता चल रहा है. इसकी सातवीं रिपोर्ट जिसका नाम 'Improving the Factors of Productivity & Efficient Use of Resources to Add to Farmers Income' में इस बात का ज़िक्र किया गया है कि साल 1970-71 के बाद से गैर कृषि भूमि क्षेत्र 100 लाख हेक्टेयर तक बढ़ गया है. इसकी वजह बंजर होती ज़मीन नहीं है बल्कि उपजाऊ ज़मीन पर उद्योग और नई टाउनशिप बनाया जाना है. चिंताजनक बात यह है कि ज्यादा से ज्यादा बंजर और असिंचित जमीन कृषि के दायरे में लाई जा रही है जिससे पानी की कमी और उत्पादन में गिरावट के चलते किसानों के लिए हालात और ख़राब हो रहे हैं.



बंजर ज़मीन क्यों घट रही है ?
रिपोर्ट में ये बात भी कही गई है कि न सिर्फ कृषि भूमि घट रही है बल्कि बंजर ज़मीन में भी लगातार गिरावट देखने को मिल रही है. पहली नज़र में ये बात उत्साहित करने वाली है कि बंज़र ज़मीन घटी है लेकिन असलियत ये है कि उपजाऊ ज़मीन पर उद्योग लगाने और टाउनशिप बसाने के चलते किसान बंजर ज़मीन पर खेती करने के लिए मजबूर हो रहे हैं. रिपोर्ट बताती है कि भारत की जोत भूमि 1970 से 1,400 लाख हेक्टेयर के आसपास है. लेकिन गैर कृषि कार्यों के लिए भूमि का उपयोग 1970 में 196 लाख हेक्टेयर से 2011-12 में 260 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है. सिर्फ साल 2000-2010 के दशक में करीब 30 लाख हेक्टेयर कृषि जमीन गैर कृषि कार्यों के लिए इस्तेमाल की गई है. दूसरी तरफ जो बंजर और असिंचित जमीन 1971 में 280 लाख हेक्टेयर थी, वह साल 2012 में घटकर 170 लाख हेक्टेयर रह गई है.

क्या हैं इसके नुकसान ?
रिपोर्ट के नतीजों पर एग्रो इकॉनोमिस्ट देवेंद्र शर्मा की राय है कि उपजाऊ ज़मीन का शहरीकरण में इस्तेमाल और किसान का बंजर ज़मीन पर खेती करना देश की कृषि अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार जैसा है. पहला तो बढ़ती जनसंख्या के मद्देनज़र कृषि योग्य उपजाऊ भूमि सबसे बड़ा एसेट है जहां कम मेहनत से ज्यादा उपज हासिल की जा सकती थी. दूसरी तरफ ऐसी ज़मीन जिन किसानों से ली जाती है वो या तो मज़दूर किसानों में परिवर्तित हो जाते हैं या फिर बंजर ज़मीनों पर खेती करने लगते हैं.



 

देवेंद्र के मुताबिक बंजर ज़मीन के आस-पास सिंचाई के साधनों की कमी होती है ऐसे में ग्राउंड वाटर का दोहन होता है. इससे न सिर्फ कृषि का खर्चा बढ़ता है बल्कि उपज भी उपजाऊ ज़मीन के मुकाबले कम ही होती है. ऐसे किसी मॉडल में किसान की आय दोगुनी करना फिलहाल एक सपने जैसा ही है. रिपोर्ट भी कहती है कि इस नई कृषि भूमि पर भारत का खाद्य उत्पादन टिका है लेकिन इस भूमि का अधिकांश हिस्सा बारिश के जल पर निर्भर है. यही वजह है कि किसानों की आय को दोगुना करना एक बड़ी चुनौती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि के दायरे में आई जमीन की उर्वरता और सेहत ठीक नहीं है. इस जमीन को उपजाऊ और आर्थिक रूप से सार्थक बनाने के लिए बहुत ध्यान देने की जरूरत है.

कितनी बढ़ी है किसानों की आय ?
नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डवलपमेंट यानी नाबार्ड का ताज़ा सर्वे कह रहा है कि बीते चार सालों में किसानों की आय 2505 रुपए ही बढ़ सकी है. गांवों में रहने वाले 41% से ज्यादा परिवार अभी भी कर्जे में दबे हैं और इनमें से 43% वो हैं जिनकी आय कृषि पर निर्भर हैं.नाबार्ड के इंडिया रूरल फाइनेंशियल इनक्लूजन सर्वे (NAFIS) के मुताबिक साल 2016-17 में भारत के गांव में रह रहे एक किसान परिवार की मासिक आय 8,931 रुपए हो गई है. नेशनल सैम्पल सर्वे ऑर्गनाइजेशन (NSSO) के साल 2012-13 के आंकड़ों और इसी साल की नाबार्ड रिपोर्ट पर नज़र डालें तो पता चलता है कि तब किसानों की आय 6,426 रुपए प्रतिमाह थी. यानी किसानों की मासिक आय में 2,505 रुपए महीना कि बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है. इस सर्वे के मुताबिक भारतीय किसान अभी भी कई बड़ी परेशानियों से घिरे हैं जिसमें कर्ज, घटती आमदनी, फसल बीमा की कमी सबसे महत्वपूर्ण हैं.



क्या कहती है डबलिंग फार्मर्स इनकम कमेटी ?
डबलिंग फार्मर्स इनकम कमेटी के अध्यक्ष डॉ. अशोक दलवाई ने News18 Hindi से ख़ास बातचीत में बताया कि किसानों की प्रोडक्टिविटी बढ़ जाए, उत्पादन लागत कम हो, मार्केट मिल जाए और उचित मूल्य मिले तो किसानों की आय दोगुनी करने का सपना साकार हो सकता है. इस दिशा में सरकार काम कर रही है. पहले सिर्फ कृषि के बारे में सोचा जाता था लेकिन पहली बार किसानों के बारे में भी सोचा गया है, ताकि वह खुशहाल हों. कितनी उपज हुई इसके साथ-साथ यह बहुत महत्वपूर्ण है कि किसान को लाभ कितना मिला.

उधर कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि प्रोडक्टिविटी बढ़ाने, उत्पादन लागत कम करने, मार्केट की उपलब्‍धता और उचित मूल्य मिलने से ही किसानों की आय बढ़ सकती है. कमेटी के सदस्य एवं भाजपा किसान मोर्चा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष विजयपाल सिंह तोमर कांग्रेस पर सवाल करते हैं. उन्होंने कहा 'देश में इस वक्त करीब 22 फीसदी किसान गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं इसका जिम्मेदार कौन है? कृषि भूमि को बिना किसी रोक-टोक के उद्योगों के लिए आवंटित किया जाता रहा इसके लिए पिछली सरकारों से सवाल किया जाना चाहिए.

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