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कितनी पुरानी है कृष्ण की बांसुरी, कहां बजा था पहला फ्लूट

कितनी पुरानी है कृष्ण की बांसुरी, कहां बजा था पहला फ्लूट

भारत में बांसुरी और भगवान कृष्ण एक दूसरे के पर्याय माने जाते हैं.

भारत में बांसुरी और भगवान कृष्ण एक दूसरे के पर्याय माने जाते हैं.

बांसुरी शायद दुनिया का पहला वाद्ययंत्र है. हजारों साल पुराना. इसकी ध्वनि का भी अपना पूरा एक विज्ञान है. यकीनन भारत में भगवान कृष्ण के होठों से लगी रहने वाली बांसुरी को भारत की संगीत की दुनिया में अलग तरह से विकसित किया गया. बांसुरी के छेदों की संख्या, बांस की गुणवत्ता, हवा का दबाव और कई बातें ऐसी होती हैं, जो इसकी ध्वनि को सुरीला बनाती हैं.

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जन्माष्टमी का दिन है. कृष्णमय माहौल है. राधे-राधे कहते हुए जब आंखें बंद करेंगे तो कृष्ण भगवान की जो छवियां उभरने लगेंगी, उन सभी में वो अपनी बांसुरी के साथ ही होंगे. कृष्ण और बांसुरी का संग ऐसा ही था जैसे कोई ऐसी जोड़ी जिसे अलग नहीं किया जा सकता. बगैर बांसुरी कृष्ण की कल्पना करना कठिन है. क्या आपको मालूम है कि बांसुरी उन वाद्यंयत्रों में है, जिसे शायद सबसे पहले मनुष्य ने बजाया. जब मनुष्य ने इसे अनायास ही पकड़ा और इसे फूंकते ही संगीत लहरियां निकलीं तो उसके आनंद का ठिकाना नहीं रहा.

वैसे तो कहा यही जाता है कि मनुष्य के विकासक्रम में बांसुरी उसके सबसे शुरुआती साथियों और वाद्ययंत्रों में रही होगी. ये आमतौर पर लकड़ी से ही बनती है. वैसे अब धातु की बांसुरी का भी इस्तेमाल होने लगा है. होर्नबोस्टल-सैश्स के उपकरण वर्गीकरण के अनुसार, बांसुरी को तीव्र-आघात एरोफोन के रूप में वर्गीकृत किया जाता है.

क्योंकि यह प्राकृतिक बांस से बनायी जाती है, इसलिये लोग उसे बांस बांसुरी भी कहते हैं. बांसुरी बनाने की प्रक्रिया कठिन नहीं है, सबसे पहले बांसुरी के अंदर की गांठों को हटाया जाता है, फिर उस के शरीर पर कुल सात छेद खोदे जाते हैं. सबसे पहला छेद मुंह से फूंकने के लिये छोड़ा जाता है, बाक़ी छेद अलग अलग आवाज़ निकालने का काम देते हैं.

बांसुरी से अलग अलग तरह की कितनी ही धुनें निकाली जा सकती हैं. तेज, भारी, हल्की और तरह तरह की धुनें और संगीत. इससे कई तरह की प्राकृतिक आवाज़ें भी एक्सपर्ट लोग निकालकर दिखा देते हैं. मसलन कई तरह के पक्षियों की हू-ब-हू आवाजें.

ये है भारत की शास्त्रीय संगीत में उपयोग होने वाली 08 छेदों की बांसुरी, जिसका बांस दक्षिण भारत में खास जगह पर ही मिलता है.

यूरोप में मिल रही हैं 40000 साल पुरानी बांसुरी
वैसे तो कहा जाता है कि बांसुरी का इतिहास 40,000 से 35,000 साल पुराना है. हालांकि ये शायद और पुराना है. बहुत पुरानी बांसुरियां अब भी जर्मनी के स्वाबियन अल्ब क्षेत्र में पाई गई हैं. भारत में भी बांसुरी का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा है.

दुनिया की तकरीबन सभी सभ्यताओं में बांसुरी की अपनी भूमिका रही है. माना जाता है कि जब आदम काल में मनुष्य ने सूखी और पोली बांस की छेदवाली लकड़ी को अनायास फूंका होगा, जो उसने इससे अलग तरह की प्यारी सी धुन सुनी होगी. उसके बाद से ही ये उसके जीवन में अनिवार्य तौर पर शामिल हो गई होगी. ये भी कहा जाता है कि शायद सबसे पुरानी बांसुरी हड्डी से भी बनी होगी.

क्या पहली बांसुरी हड्डी से बनी 
खोजी गई सबसे पुरानी बांसुरी गुफा में रहने वाले एक भालू की जांघ की हड्डी का टुकड़ा हो सकती है, जिसमें दो से चार छेद हो सकते हैं, यह स्लोवेनिया के डिव्जे बेब में पाई गई है. ये करीब 43,000 साल पुरानी है. वैसे 2008 में जर्मनी के उल्म के पास होहल फेल्स गुहा में 35,000 साल पुरानी बांसुरी भी पाई गई.कुल मिलाकर यूरोप में कई हजारों साल पुरानी हड्डी से लेकर लकड़ी की बांसुरी मिलीं, जो 05 से 07 छेद वाली थीं. चीन से भी एक मकबरे से 9500 साल पुरानी सारस के पंख की हड्डियों से बनी बांसुरी मिली.

यूरोप और अमेरिका में अब इस तरह की मैकेनिकल कंसर्ट बांसुरी बजाई जाती है. इसका इस्तेमाल आर्केस्ट्रा में भी होता है.

बाइबल और धर्मग्रंथों में भी इसका जिक्र
बाइबिल से लेकर कई धर्म से जुड़ी किताबों में बांसुरी बजाने का वर्णन है. वैसे ईसाई परंपरा में जुबल को बांसुरी का आविष्कारक माना जाता है. वैसे भारत की प्राचीन संस्कृति में बांसुरी की मौजूदगी अनिवार्य तौर पर रही है. क्रॉस बांसुरी की शुरुआत भारत में हुई और ग्रंथों में 1500 ईसापूर्व में क्रॉस बांसुरी का वर्णन है.

क्या है बांसुरी में ध्वनि का विज्ञान
जब बांसुरी के छिद्र के आर-पार वायु धारा प्रवाहित की जाती है, तो छिद्र पर वायु कंपन होने से ध्वनि पैदा होती है. वादक यंत्र के छिद्रों को खोल एवं बंद करके ध्वनि के स्वर में बदलाव करता है. परिवर्तन करता है, बांसुरी के अंदर की लंबाई, छेद बंद किए जाने पर हवा के लिए बढ़ी लंबाई अनुनाद आवृत्ति में बदल जाती है. छेद बंद करने और खोलने पर वायु का दबाव बदलता है और इससे स्वर की आवृत्ति में भी बदलाव आता है.

पुलिस की सीटी भी बांसुरी का रूप
पुलिस की सीटी जो तेज बजती है, वो बांसुरी का ही रूप है. कुल मिलाकर बांसुरी बजाना और इससे ध्वनि का अलग अलग निकलना एक तरह का विज्ञान है, जो बताता है कि हवा को अलग अलग कोण या दबाव से गुजारने पर उसमें कंपन होता है और जो वायु का इफेस्ट बाहर आएगा वो अलग अलग ध्वनि लिए होगा. अलग अलग तरह की बांसुरी को बजाने के लिए कम या ज्यादा वायु की जरूरत होती है.

बांसुरी कई तरह की और कई आकार की होती हैं. इनका आकार, मोटाई, छेदों की संख्या से इनसे निकलने वाली ध्वनि भी बदलती रहती है.

ये कई तरह की
बांसुरी कई तरह की होती है. ज़्यादातर बांसुरियों को संगीतकार या वादक होठ के किनारों से बजाता है. हालांकि, कुछ बांसुरियों, जैसे विस्सल, जैमशोर्न, फ्लैजिओलैट, रिकार्डर, टिन विस्सल, टोनेट, फुजारा एवं ओकारिना में एक नली होती है जो वायु को किनारे तक भेजती है, इन्हें फिपिल फ्लूट कहा जाता है। फिपिल, यंत्र को एक विशिष्ट ध्वनि देता है.

हालांकि इस पर संगीतकार या वादक का नियंत्रण कुछ कम होता है. परंपरागत बांसुरी मुंह से बजायी जाती हैं. कुछ संस्कृतियों में नाक से बजायी जाने वाली बांसुरी प्रयोग होती है. चीनी बांसुरी को “डी” कहा जाता है. इसकी कई किस्में होती हैं. जापानी बांसुरी को फू कहते हैं.

भारत में पहली बार क्लासिकल संगीत निकालने के लिए मशहूर संगीतज्ञ और बांसुरीवादक पन्नालाल घोष ने खास बांसुरी बनाई थी, जिसमें बेहतरीन क्वालिटी के बांस का इस्तेमाल हुआ.

कैसी होती है भारतीय बांस निर्मित बांसुरी
भारतीय शास्त्रीय संगीत में बांस से निर्मित बांसुरी का विकास पश्चिमी बांसुरी से अलग तरीके से हुआ. भगवान कृष्ण को परंपरागत रूप से बांसुरी वादक माना जाता है. पश्चिमी संस्करणों की तुलना में भारतीय बांसुरी बहुत साधारण हैं; वे बांस द्वारा निर्मित होते हैं एवं चाबी रहित होती हैं.

पन्ना लाल घोष की बनाई खास बांसुरी
महान भारतीय बांसुरी वादक पन्नालाल घोष ने सबसे पहले सात छेदों वाली 32 इंच लंबी बांस बांसुरी को परंपरागत भारतीय शास्त्रीय संगीत बजाने योग्य बनाया था. भारतीय शास्त्रीय संगीत की धुनों और सूक्ष्मता को भलीभांति प्रकट करने के लिये पंडित रघुनाथ प्रसन्ना ने बांसुरी वादन के क्षेत्र में विभिन्न तकनीकों का विकास किया. इसी घराने के शिष्यों में पंडित भोलानाथ प्रसन्ना, पंडित हरी प्रसाद चौरसिया, पंडित राजेन्द्र प्रसन्ना दुनियाभर में अपने मधुर बांसुरी वादन के लिए फेमस हुए.

बांस की गुणवत्ता
बांसुरी की ध्वनि की गुणवत्ता कुछ हद तक उसे बनाने में प्रयुक्त विशेष बांस पर निर्भर करती है. माना जाता है कि बांसुरी के लिए बेहतरीन बांस दक्षिण भारत के नागरकोइल क्षेत्र में पैदा होता है.

Tags: Classical Music, Lord krishna, Music, Sri Krishna, Sri Krishna Janmashtami

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