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OPINION: 'गोडसे के विचार रक्तबीज जैसे... जरूरी है इस सोच का संहार'

News18Hindi
Updated: November 30, 2019, 3:20 PM IST
OPINION: 'गोडसे के विचार रक्तबीज जैसे... जरूरी है इस सोच का संहार'
भारतीय जनता पार्टी की सांसद साध्वी प्रज्ञा.

प्रज्ञा (Pragya) ने जब गोडसे (Nathuram Godse) को देशभक्त कहा, तब ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर गोडसे अमर रहे, प्रज्ञा वेलडन, गोडसे तुम गांधी के हत्यारे ही सही लेकिन देशभक्त हो जैसे स्लोगन ट्रेंड कर रहे थे.

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  • Last Updated: November 30, 2019, 3:20 PM IST
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पौराणिक कथाओं में एक रक्तबीज नामक दानव का उल्लेख मिलता है, जिसे त्रिदेव में से एक ब्रम्हाजी से वरदान प्राप्त था कि यदि उसकी रक्त की एक बूंद पड़े तो उसके जैसे अनेक रक्तबीज प्रकट हो जाएं. मिथक है कि इसी वरदान के कारण वह अमर हो गया और देवताओं का संहार करने लगा, किन्तु तभी शक्ति और संहार की देवी काली माता का रूप सामने आया. मां ने रक्तबीज को अपनी जीभ लंबी करते हुए तरह लपेटा कि उसका रक्त जमीन पर गिरने से पहले वह पीती गई। इस तरह रक्तबीज का अंत हो गया.

दरअसल यह धार्मिक प्रसंग मालेगांव मस्जिद ब्लास्ट जैसी आतंकी वारदात की आरोपी भाजपा की सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर के गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त कहे जाने के बाद याद आया. प्रज्ञा ठाकुर को लोकसभा में गोडसे देशभक्त वाले अपने बयान पर बुरी तरह घिरने, बिना शर्त माफी मांगने के दबाव और अपनी ही पार्टी के सख्त एक्शन के बाद एक ही दिन में ढाई घंटे के भीतर दो बार माफी मांगनी पड़ी. माफी मांगने को भी महिला एंगल से इमोशनल टर्न देने की कोशिश की गई थी. शुक्रवार को लोकसभा में 12.30 बजे पहली बार अपने माफीनामे में परंतु शब्द जोड़ते प्रज्ञा ने बेहद ड्रामाई अंदाज में कहा कि मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया, यह बेहद निंदनीय है. मैं महात्मा गांधी और देशहित में उनके कार्यों का सम्मान करती हूं. परंतु एक सांसद ने मुझे आतंकवादी कहा, जबकि मेरे खिलाफ कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ है. एक महिला होने, महिला सांसद के नाते यह अपमानजनक है. अगर मेरे किन्हीं बयानों से किसी को ठेस पहुंची हो, तो मैं खेद प्रकट करती हूं. परंतु शब्द से जुड़ी इस माफी को सदन ने नकार दिया. इसके बाद इस मुद्दे को शांत करने के लिए बुलाई सर्वदलीय बैठक में भी वो नहीं पहुंचीं तथा अपरान्ह 2.55 बजे अचानक लोकसभा मे पहुंचीं और कहा कि 27 नवंबर को एसपीजी बिल पर चर्चा के दौरान मैंने गोडसे को देशभक्त नहीं कहा, मैने नाम ही नहीं लिया, फिर भी किसी को ठेस पहुंची हो, तो खेद प्रकट करते हुए क्षमा चाहती हूं.

लोकसभा में पहली बार की माफी तो वैसी ही थी, जैसी उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान अपना प्रचार करते हुए 26-11 के मुंबई हमले में शहीद हेमंत करकरे की मौत उनके श्राप से होने और सूतक हट जाने के बयान पर तीखी आलोचना के बाद मांगी थी. उन्होंने कहा था कि हालांकि मेरी माफी से दुश्मनों को लाभ होगा, लेकिन फिर भी मैं अपने बयान के लिए माफी मांगती हूं. करकरे को श्राप की बात कहना मेरा व्यक्तिगत दुख था, जिसे मैंने व्यक्त किया. बहरहाल, प्रज्ञा ने माफी मांग ली. भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने गोडसे को देशभक्त कहे जाने और ऐसे किसी भी विचार की कड़ी निंदा करते हुए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को प्रेरक, पथप्रदर्शक बताया.


प्रज्ञा ने माफी तो मांग ली, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इस माफीनामे से गोडसे क्या देशभक्त वाले विचार का भी अंत हो गया? नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ. प्रज्ञा ने जब गोडसे को देशभक्त कहा, तब ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर गोडसे अमर रहे, प्रज्ञा वेलडन, गोडसे तुम गांधी के हत्यारे ही सही लेकिन देशभक्त हो जैसे स्लोगन ट्रेंड कर रहे थे. इनकी संख्या लाखों में थी. प्रज्ञा के समर्थन में सोशल मीडिया निरंतर गोडसे भक्तों के विचारों से रंगा हुआ है. प्रज्ञा से ज्यादा गोडसे के चाहने वालों की भीड़ है. पल-पल राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों की मॉब लिंचिंग हो रही है. गोडसे के विचार दानव रक्तबीज के रक्त की तरह फैल कर रहे हैं और प्रज्ञा की तरह गोडसे भक्त पैदा हो रहे हैं. इनमें भाजपा, उसके तमाम नेता, सरकार में बैठे खास मंत्री, फॉलोवर्स सब शामिल हैं.

यह खासतौर पर तब हो रहा है, जब केन्द्र सरकार की पहल पर पूरा देश गांधीजी का 150वां जयंती वर्ष मना रहा है. भाजपा नेताओं, सांसदों, मंत्रियों को गांव-गांव, शहर-शहर गांधी संकल्प यात्रा निकालने के लिए कहा गया. हालांकि प्रज्ञा ठाकुर ने इस तरह की यात्रा को फिजूल का प्रचार बताते हुए उसमें शामिल होने से इनकार कर दिया था. ऐसे में शायद भाजपा समझ रही होगी कि गांधी संकल्प यात्रा किनके बीच में निकालने की जरूरत है? प्रज्ञा जैसों को तो इस खास मौके पर भी यह समझ नहीं आ रहा होगा कि गोडसे के बारे में क्या करना या बोलना चाहिए या क्या नहीं? क्योंकि क्षुद्र मानसिकता के प्रदर्शन के लिए किसी डिग्री होने की जरूरत नहीं होती.


रक्तबीज की रक्तबूंद की तरह गोडसे के विचार वालों को बढ़ाने वाली प्रज्ञा की हरकतों से भाजपा बार-बार मुसीबत में पड़ रही है, असहज हो रही है, इससे अब शायद उसकी समझ में आ जाए कि राजनीतिक फायदे के लिए हर किसी को गले लगाने के क्या नतीजे होते हैं. प्रज्ञा जैसे लोगों से स्पष्ट दूरी बनाने का काम पूरी सख्ती और दृढ़ता से होना चाहिए, रक्तबीज की तरह फैलने वाले गोडसे को देशभक्त ठहराने वाले विचारों का समापन बेहद जरूरी है. गांधी के विचारों, नीतियों से किसी व्यक्ति, समूह, संगठन, राजनीतिक दल या उसके नुमांइदे को असहमति के बावजूद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हत्यारे को महिमामंडित करने, उसके अतिवाद का गुणगान करने का अधिकार तो किसी को नहीं दिया जा सकता. अगर ऐसा नहीं हुआ तो रक्तबीज तो पैदा होंगे ही, जिनका संहार मुश्किल होता जाएगा.

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First published: November 30, 2019, 3:20 PM IST
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