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Opinion: कांग्रेस के लिए 'संकटमोचक' अहमद पटेल को खोने के क्या हैं मायने?

Opinion: कांग्रेस के लिए 'संकटमोचक' अहमद पटेल को खोने के क्या हैं मायने?

बुधवार को 71 साल की उम्र में अहमद पटेल ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

बुधवार को 71 साल की उम्र में अहमद पटेल ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

अहमद पटेल (Ahmed Patel) ने न केवल कांग्रेस (Congress) और उसके सहयोगियों बल्कि पार्टी और मनमोहन सिंह की सरकार के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य किया. कॉर्पोरेट के साथ-साथ राजनीतिक नेताओं तक पहुंचने की उनकी क्षमता ने पूर्व पार्टी प्रमुख राहुल गांधी को भी अभिभूत किया.

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    (अनिता कत्याल)

    पिछले दिसंबर में मनी लॉन्ड्रिंग मामले में फंसे पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम (P Chidambaram) को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के एक दिन पहले मीडिया ने कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं अहमद पटेल (Ahmed Patel) और कपिल सिब्बल (Kapil Sibal) से उनके सहयोगी की किस्मत के बारे में सवाल किए थे. तब अहमद पटेल ने साफ कहा था कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला चिदंबरम के पक्ष में जाएगा. जबकि कपिल सिब्बल जो चिदंबरम के वकील थे, इस मामले में अनिश्चित रहे.

    ये वाकया कांग्रेस पार्टी के चाणक्य कहे जाने वाले अहमद पटेल के बारे में बहुत कुछ कहती है, जिन्होंने इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी, फिर सोनिया गांधी का राजनीतिक जीवन में बखूबी साथ निभाया. ये अहमद पटेल ही थे, जिनकी बदौलत सोनिया गांधी राजनीति में स्थापित हो पाईं और मजबूती से आज भी खड़ी हैं. लेकिन अब हालात बदल गए हैं. बुधवार को 71 साल की उम्र में अहमद पटेल ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. इसके साथ ही वो कांग्रेस में एक गहरा शून्य छोड़ गए.

    Ahmed Patel Dies: कांग्रेस के लिए क्यों बड़ी क्षति है अहमद पटेल का निधन

    अहमद पटेल 16 वर्षों के दौरान सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार थे. आत्म-संबल और कर्म में विश्वास करने वाले अहमद पटेल को सोनिया प्रमुख विश्वासपात्र, मार्गदर्शक, दोस्त और सहयोगी बताती हैं. एक ऐसा साथी जो सभी आपात परिस्थितियों में साथ देता था. जब यूपीए सरकार 2004-2014 तक सत्ता में थी, तब पटेल सोनिया गांधी और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी थे. उन्होंने पार्टी के नेताओं की शिकायतों को सुना और निपटारा भी किया.


    पर्दे के पीछे रह कर करते थे कांग्रेस के संकट का निवारण
    इसलिए कोरोना संक्रमित होने और एक महीने तक अस्पताल में इलाज कराते हुए अहमद पटेल का जाना सोनिया गांधी के लिए एक व्यक्तिगत क्षति है. कांग्रेस के लिए तो ये एक बड़ा झटका है. कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) के 10 साल के शासन के दौरान वह पर्दे के पीछे रह कर कांग्रेस के संकट का निवारण करते रहे. वह कभी भी मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं थे, फिर भी उन्हें किसी भी कैबिनेट मंत्री की तुलना में अधिक शक्ति मिली हुई थी.

    अहमद पटेल ने न केवल कांग्रेस और उसके सहयोगियों बल्कि पार्टी और मनमोहन सिंह की सरकार के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य किया. कॉर्पोरेट के साथ-साथ राजनीतिक नेताओं तक पहुंचने की उनकी क्षमता ने पूर्व पार्टी प्रमुख राहुल गांधी को भी अभिभूत किया.

    माना जाता है कि राहुल के पटेल से अच्छे रिश्ते नहीं रहे हैं. लेकिन उन्हें अगस्त 2018 में पार्टी के कोषाध्यक्ष के रूप में वापस लाया गया. साल 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस पार्टी का खजाना खाली हो गया था. पटेल से उम्मीद थी कि वे उद्योग घरानों सहित सभी क्षेत्रों से डोनेशन लेकर कांग्रेस को मजबूत लड़ाई लड़ने में मदद करेंगे.


    सोनिया के मुकाबले राहुल गांधी से नहीं बैठ पाया तालमेल
    कांग्रेस के हलकों में यह स्वीकार किया गया कि अहमद पटेल, राहुल गांधी के साथ वैसा तालमेल नहीं बिठा पाए, जैसा कि उन्होंने सोनिया गांधी के साथ बनाया था. तालमेल न होते हुए भी राहुल गांधी जब कांग्रेस के अध्यक्ष बने, तब भी अपनी मां के सबसे भरोसेमंद सहयोगी की उपेक्षा नहीं कर पाए. पटेल को पार्टी के कोषाध्यक्ष के रूप में अपनी नई भूमिका में नकदी-संकटग्रस्त पार्टी के लिए धन जुटाने का चुनौतीपूर्ण काम दिया गया था. कॉर्पोरेट क्षेत्र के दिग्गजों के साथ अच्छे संबंधों को देखते हुए अहमद पटेल इस जिम्मेदारी के लिए सबसे उपयुक्त थे.

    अहमद पटेल की कांग्रेस पार्टी में व्यापक भूमिका को देखते हुए केवल यह उम्मीद की जानी थी कि उनकी मौत के बाद की बातचीत पार्टी में उनकी जगह को भरने की कोशिश को लेकर होती. कांग्रेस पटेल के बिना कैसे सर्वाइव करेगी, ये बड़ा सवाल है. क्योंकि, हाल के चुनावों में एक के बाद एक मिली करारी हार के बाद पहले से ही कांग्रेस पार्टी ढलान पर है.


    वरिष्ठ नेताओं के साथ आंतरिक मंथन कर रही कांग्रेस
    पार्टी आज नेतृत्वविहीन है और वरिष्ठ नेताओं के साथ आंतरिक मंथन कर रही है. कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनावों की मांग के साथ और अधिक जवाबदेही के साथ जनता के बीच जा रही है. सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए अब शारीरिक तौर पर उतनी सक्षम नहीं हैं, जितनी पहले थीं. जबकि, राहुल गांधी जिम्मेदारी लेने के लिए अभी भी तैयार नहीं हैं. हालांकि, वे सत्तारूढ़ बीजेपी के खिलाफ पार्टी की लड़ाई का नेतृत्व जरूर कर रहे हैं. एकमात्र अहमद पटेल ही थे, जो पार्टी संगठन और कार्यकर्ताओं की बीच की कड़ी थे. वह एकमात्र नेता थे जो सबका फोन उठा सकते थे और असंतुष्टों के साथ बातचीत कर सकते थे.

    अहमद पटेल का अंतिम संस्कार आज, राहुल गांधी भी होंगे शामिल

    यह सच है कि संगठन, संस्थान और राजनीतिक दल किसी एक व्यक्ति पर पूरी तरह से निर्भर नहीं हैं. राजनीतिक चुनौतियां किसी व्यक्ति विशेष के अभाव में नहीं आती है. लेकिन, कांग्रेस के संदर्भ में अलग कहानी है. अगर कांग्रेस अच्छी पोजिशन में होती, तो शायद अहमद पटेल की कमी पार्टी को यूं न खलती. कोई न कोई उनकी जगह को भरने के लिए तैयार रहता. मगर ऐसा नहीं है.


    वर्तमान स्थिति में अहमद पटेल जैसे वरिष्ठ नेता का निधन कांग्रेस में निराशा की समग्र स्थिति है. हालांकि, राहुल गांधी ने समय-समय पर अपने करीबियों को पार्टी के प्रमुख पदों पर रखा, लेकिन किसी के पास अहमद भाई के नेतृत्व जैसी क्षमता, अनुभव और अधिकार नहीं है.

    (Disclaimer: लेखक सीनियर जर्नलिस्ट हैं. ये उनके निजी विचार हैं. अंग्रेजी में इस आर्टिकल को पूरा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )

    Tags: Ahmed Patel death, All India Congress Committee, Kapil sibal, Sonia Gandhi

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