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OPINION: कैसे बचाएं हम अपना लोकतांत्रिक चेहरा?

News18Hindi
Updated: December 11, 2019, 12:13 PM IST
OPINION: कैसे बचाएं हम अपना लोकतांत्रिक चेहरा?
हैदराबाद में हुए रेप के आरोपियों को पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया था.

हैदराबाद (Hyderabad Rape)में पुलिस ने रेप के आरोपियों का जिस तरह एनकाउंटर किया उससे न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं. लेकिन क्या न्याय के लिए ये हड़बड़ी और जोश खतरनाक नहीं है?

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  • Last Updated: December 11, 2019, 12:13 PM IST
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हैदराबाद पुलिस की ‘दिलेरी’ से पैदा हुई उन्मादित खुशी का शोर कम हुआ हो, तो अब थोड़ा थीर होकर सोचने का वक्त है. क्या इंसाफ और सजा देने का अधिकार एक ही संस्था को दिया जा सकता है? क्या सारी ताकत किसी एक ही संस्था को दी जा सकती है? मुमकिन है कि सारी शक्ति हासिल करने के बाद वह संस्था निरंकुश नहीं होगी? याद करें छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के सारकेगुडा को. जून 2012 में सुरक्षाबलों ने पुलिस के साथ मिलकर एनकाउंटर किया था. उनका दावा था कि उन्होंने 17 नक्सलियों को मार गिराया है. गौरतलब है कि इस एनकाउंटर में कुछ नाबालिग भी मारे गए थे. एनकाउंटर पर उठे सवालों के बाद इस मामले की जांच के लिए जस्टिस वीके अग्रवाल कमेटी बनी. उसने राज्य सरकार को बीते महीने रिपोर्ट सौंप दी है. रिपोर्ट में साफ तौर पर लिखा गया है कि एनकाउंटर फर्जी था. इसमें नक्सली बताकर आम लोगों को मारा गया था.

गुड़गांव के रेयान इंटरनेशनल स्कूल का मामला याद होगा. सितंबर 2017 में इस स्कूल के टॉयलेट से दूसरी कक्षा के छात्र की लाश मिली थी. देश भर में आक्रोश फैल गया था. पुलिस ने घंटे भर के भीतर केस सुलझा लिया था. स्कूल के सीसीटीवी कैमरे काम नहीं कर रहे थे, तो भी पुलिस ने ‘अपराधी’ ड्राइवर अशोक को ढूंढ़ निकाला था. गिरफ्तार अशोक ने कुबूल भी कर लिया था अपना गुनाह. अपराधी को पकड़ने के बाद पुलिस ने जांच बंद कर दी. मां-बाप जांच के नतीजों से संतुष्ट नहीं हुए, कोशिश करते रहे. आखिर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और जांच सीबीआई को सौंपी गई. वारदात के दो महीने बाद सीबीआई ने मामला सुलझाया, पाया कि ड्राइवर अशोक निर्दोष था. हत्या उसी स्कूल के 11वीं में पढ़ने वाले एक लड़के ने की थी. सिर्फ अपनी परीक्षा टलवाने के लिए. जरा सोचिए अगर पुलिस ने एनकाउंटर में अशोक को मार गिराया होता तो?

इन घटनाओं को याद दिलाने का मतलब कहीं से भी हैदराबाद गैंगरेप और मर्डर, उन्नाव में रेप पीड़िता की हत्या या ऐसे किसी भी मामले के खिलाफ खड़ा होना नहीं है. बल्कि इस टिप्पणी का मकसद सिर्फ यह ध्यान दिलाना है कि इस लोकतंत्र के तीन महत्वपूर्ण खंभे हैं. हर खंभे का दायित्व तय है. हर खंभे को अपनी हद तक सीमित रहने की दरकार है. कोर्ट का फैसला आने से पहले अगर दूसरी संस्थाएं फैसला देने लग जाएं, तो स्थिति विकट होगी. यही विकट स्थिति हैदराबाद में हुए इस एनकाउंटर में दिखती है. हम जिस जोश और हड़बड़ी के साथ पुलिस वालों को ‘सिंघम’ बनाते दिख रहे थे, वह हड़बड़ी और वह जोश खतरनाक है.


इस मसले पर पक्ष और विपक्ष बनने के बजाए तटस्थ होकर सोचने की जरूरत है. हमें यह सोचना चाहिए कि एनकाउंटर के बाद बने जश्न का माहौल क्या कह रहा है? जाहिर तौर पर यह इस देश की न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ उपजा असंतोष है जो तुरंत न्याय की चाह में तब्दील होता जा रहा है. हम इस एनकाउंटर को इस तर्क के साथ जायज ठहरा रहे हैं कि यह न्याय हुआ.

सच तो यह है कि इससे बड़ा अन्याय हो नहीं सकता कि कोर्ट के फैसले से पहले पुलिस और जनता ने फैसला कर दिया. दरअसल, हमारा सारा रोष उस न्यायिक प्रक्रिया के खिलाफ है जो न्याय करने में लंबा वक्त लेती है. कहते हैं कि देर से मिला न्याय एक अर्थ में अन्याय है. हमारी मानसिकता इस देर के कारण बोझिल हो चुकी है. हमारी अदालतें न्याय देने में तय वक्त का पालन नहीं कर पा रहीं और हम जल्दी न्याय पाने के लिए इतना अधीर हुए जा रहे हैं कि अन्याय को भी न्याय मानकर जश्न में डूब रहे हैं.


इस देश के नागरिकों का रोष जायज है. हमारी विधायिका, न्यायपालिका और कार्यवालिका इस देश के नागरिकों का वह भरोसा जीत पाने में नाकाम रही हैं जो धीरज के साथ न्याय का इंतजार कर सके. हमें इस देश की न्यायिक प्रक्रिया को और चुस्त-दुरुस्त करने की जरूरत है. उसे व्यापक और विस्तृत करने की दरकार है. हैदराबाद एनकाउंटर के बाद झारखंड में भी महिलाओं और पुरुषों ने जश्न सा मनाया. लगभग हर रोज कोसे जाने वाले पुलिसकर्मियों की कलाइयों पर राखियां बंधीं. उनकी जय-जयकार हुई. नेता और जनता भीड़तंत्र बनकर ऐसे ही इंसाफ की मांग करने लगे. इस मांग और जय-जयकार की अंतर्ध्वनी सुनने की जरूरत है. अभी झारखंड के चुनावी माहौल में केंद्र के कई बड़े राजनेता यहां आए. यहां की जनता ने उन्हें सुना. ये नेता अपने प्रचार मंच से एक बार भी इस गंभीर मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं की. उन्होंने जनता से वोट मांगे, पर यह वादा करने से चूक गए कि हम उस व्यवस्था को बनाने की कोशिश करेंगे जो जनता को सुरक्षा दे. उसे न्याय दे. दरअसल, सत्ता पाने और उसका सुख भोगने की होड़ में हमारे राजनेता आम आदमी के रोष और उसकी तकलीफ से दूर होते गए है.

एनकाउंटर के बाद बरसने वाले फूल और जयकारे की गूंज के बाद प्रधान न्यायाधीश बोबडे का कथन याद रखने की जरूरत है कि बदला लेने के लिए की गई कार्रवाई से न्याय का चेहरा बदल जाता है. हमारी न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करना होगा कि न्याय में हो रहा विलंब जल्द से जल्द खत्म हो. हमारी न्यायिक प्रक्रिया में देरी के हर बैरिकेड को यथाशीघ्र दूर नहीं किया जा सका तो इस देश का लोकतांत्रिक चेहरे को गंभीर नुकसान पहुंचेगा.

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First published: December 11, 2019, 12:13 PM IST
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