COVID-19: कोरोना के खिलाफ कितने काम की है मोनोक्लोनल एंटीबॉडी?

मोनोक्लोनल एंटीबॉडी है नया इलाज? ( सांकेतिक फोटो.)

मोनोक्लोनल एंटीबॉडी कॉकटेल REGEN-COV2 के एक प्रयोग में कोविड-19 के गंभीर मरीजों के उपचार में इसे लेकर काफी अच्छे परिणाम मिले हैं.

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    नई दिल्ली. कोविड के इलाज को लेकर लगातार चलती शोध रोज नई उम्मीद लेकर आ रही है. इसी कड़ी में एक और उम्मीद की किरण नजर आई है.  मोनोक्लोनल एंटीबॉडी कॉकटेल REGEN-COV2 के एक प्रयोग में कोविड-19 के गंभीर मरीजों के उपचार में इसे लेकर काफी अच्छे परिणाम मिले हैं. यूके में एके क्लीनिकल ट्रायल में इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं. कोविड-19 के इलाज में ये खोज कितनी काम की हो सकती है और भारत में ये कितनी कारगर है ?  एक पड़ताल  -

    क्या होती है मोनोक्लोनल एंटीबॉडी?
    वायरल इन्फेक्शन से लड़ने के लिए हमारा शरीर एक प्रोटीन तैयार करता है जिसे एंटीबॉडी कहते हैं. मोनोक्लोनल एंटीबॉडी एक तरह की कृत्रिम एंटीबॉडी होती है जो हमारे इम्यून सिस्टम की गतिविधियों की नकल करती है. इन्हें एक विशेष प्रकिया के ज़रिये तैयार किया जाता है जिसमें मानव शरीर से खास तरह की एंटीबॉडी को अलग करना और उनकी क्लोनिंग शामिल होती है.
    ये मोनोक्लोनल एंटीब़ॉडी खास तरह के वायरस या उनके एक हिस्से को लक्ष्य बनाकर तैयार की जाती है. मसलन REGEN-COV2 को दो मोनोक्लोनल एंटीबॉडी के मिश्रण से विकसित किया जाता है जिनका निशाना SARS-CoV-2 स्पाइक प्रोटीन होता है. मोनोक्लोनल एंटीबॉडी स्पाइक प्रोटीन के विशेष हिस्से के साथ जुड़ जाता है और उसके स्वस्थ कोशिकाओं के संक्रमण करने की प्रक्रिया को रोक देता है. कोविड-19 के अलावा मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का इस्तेमाल कैंसर, इबोला और एचआईवी में भी किया जा चुका है.


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    कोविड-19 के उपचार में कितनी असरदार? 
    महामारी के दौरान की गई शोध ने मोनोक्लोनल एंटीबॉडी से अस्पताल में भर्ती होने का खतरा कम होने की उम्मीद बढ़ी है. कुछ मोनोक्लोनल एंटीबॉडी ने तो वायरस के विभिन्न वेरिएंट के खिलाफ सक्रियता कायम रखने की काबिलियत भी दिखाई है. यूएस के राष्ट्रपति के स्वास्थ्य सलाहकार और यूएस नेशनल इन्स्टिट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इन्फेक्शन डिजीज इन्फेक्शन के निदेशक डॉ एंथोनी फाउची  ने व्हाइट हाउस ब्रीफिंग के दौरान इस बात का समर्थन किया. अब तक इस उपचार की एक अहम और आशाजनक बात नजर आई है कि ये थेरेपी गंभीर और हल्के तीव्र कोविड-19 के मरीजों पर काफी सफल रही है. हालांकि इसे अभी तक उन मरीजों पर इस्तेमाल  की अनुमति नहीं मिली है जो कोविड-19 के गंभीर मरीज हैं और अस्पताल में भर्ती है और जिन्हें ऑक्सीजन की ज़रूरत है.


    इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक चंडीगढ पीजीआईएमईआर के पल्मोनोलॉजी विभाग के पूर्व प्रमुख पद्मश्री डॉ डी. बेहरा का कहना है कि, ये बेहद जरूरी है कि इसे सही मरीज को सही वक्त पर दिया जाए, तभी इसका पूरा फायदा मिल सकता है. वहीं डॉ वी के पॉल, नीति आयोग के हेल्थ मेंबर और कोविड -19 वैक्सीन प्रशासन के विशेषज्ञ समूह के प्रमुख का कहना है कि कुछ बढ़ते हुए वेरिएंट जैसे डेल्टा प्लस, मोनोक्लोनल एंटीबॉडी के भमता को कम करने की योग्यता रखता है.

    नया अध्ययन क्या कहता है?
    यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड ने बताया कि ऐसे कोविड 19 के गंभीर मरीज जिन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया था और जिनकी अंदर प्राकृतिक तौर पर एंटीबॉडी बढ़ नहीं रही थी, उनमें मोनोक्लोनल एंटीबॉडी दिए जाने के बाद मौत का खतरा हर पांचवें मरीज में सामान्य देखरेख वाले मरीजों की तुलना में कम पाया गया. ऐसे  प्रत्येक 100 मरीज जिनका उपचार एंटीबॉडी कॉम्बिनेशन से हुआ उनमें 6 से भी कम लोगों की मौत हुई. थेरेपी की मदद से ना सिर्फ उनके अस्पताल में रहने की ज़रूरत में कमी आई बल्कि उन्हें वेंटिलेटर की ज़रूरत भी कम पड़ी. हालांकि पूरी आबादी में अभी इसके परिणाम प्राप्त नहीं हुए हैं. इसमें वो मरीज भी  शामिल हैं जिनका शरीर ठीक से एंटीबॉडी बना रहा है. जिससे अब तक ये बात निकल कर आती है कि ये थेरेपी उन मरीजों में ज्यादा कारगर है जिनका शरीर खुद की एंटीबॉडी नहीं बना पा रहा है और जो कोविड की गंभीरता की वजह से अस्पताल में भर्ती है. सितम्बर 2020 से मई 2021 के बीच में करीब 9785 मरीजों पर हुए इसके पहले ट्रायल के परिणाम, ये साबित करने  के लिए काफी हैं कि ये उपचार मरीजों को अस्पताल जाने के खतरे से बचाता है.

    भारत में इसकी उपलब्धता
    REGEN-COV2 - भारत में यह स्विस की एक बड़ी दवा निर्माण कंपनी के साथ भारतीय कंपनी सिप्ला के करार के जरिए उपलब्ध है. मोनोक्लोनल एंटीबॉडी casirivimab और imdevimab के मिश्रण को मई में सेंट्रल ड्रग्स स्टैण्डर्ड कंट्रोल आर्गेनाइजेशन की ओर से आपातकाल उपयोग की अनुमति मिल चुकी है.

    जून की शुरुआत में एक और एंटीबॉडी कॉकटेल  थेरेपी- एली लिली की bamlanivimab और etesevimab को भी ऐसे ही आपातकाल उपयोग की अनुमति दी गई है. दोनों एंटीबॉडी कॉकटेल ऐसे हल्के से कम गंभीर मरीजों पर इस्तेमाल की जा सकती है जिन्हें ऑक्सीजन की ज़रूरत नहीं है लेकिन जिनकी बीमारी आगे चलकर गंभीर हो सकती है. ग्लैक्सो स्मिथ काइन जिसने मई 26 को घोषणा की थी कि यूएस एफडीए ने Sotrivimab को आपातकाल इस्तेमाल की इजाजत दे दी है और अब वो भारत में इसकी उपलब्धता को लेकर विकल्प तलाश रहे हैं. भारत में Zydus Cadila ट्रायल के ज़रिये ZRC-3308 एंटीबॉडी कॉकटेल बनाने की योजना बना रहा है.


    क्या ये महंगी है?
    इस तरह की थेरेपी  काफी महंगी होती है क्योंकि इन्हें बनाना मुश्किल होता है और इसमें वक्त भी बहुत लगता है. भारत में सिप्ला REGEN-COV2 के 1 लाख पैक की आपूर्ति कर रहा है जिसका अधिकतम मूल्य 1 लाख 20 हज़ार रूपये प्रति पैक होगा. एक पैक से दो  मरीजों का उपचार किया जा सकता है. इस तरह से एक मरीज के इलाज में इसका खर्च करीब 59,750 होगा.मोनोक्लोनल एंटीबॉडी टिश्यू कल्चर के जरिये बनाई जाता है, इसमें कोशिकाओं को उगाना होता है, और ये कोशिकाएं प्रोटीन उत्पन्न करती है, फिर इसे शुद्ध करने की ज़रूरत होती है.


    मोनोक्लोनल एंटीबॉडी और प्लाज्मा थेरेपी में क्या अंतर?
    भारत में प्लाजमा को कोविड-19 के उपचार के दिशानिर्दशों की सूची से बाहर कर दिया गया. पिछले आठ महीनों से मरीजों में इसके लाभ के कोई उल्लेखनीय परिणाम देखने को नहीं मिल रहे थे. प्लाज्मा की तुलना में मोनोक्लोनल एंटीबॉडी को लेकर वैज्ञानिक ज्यादा आश्वस्त हैं, हालांकि दोनों ही एंटीबॉडी आधारित थेरेपी हैं पर इनके निर्माण का तरीका अलग होता है. प्लाज्मा थेरेपी में कोविड-19 से ठीक होने वाले की एंटीबॉडी इस्तेमाल होती है. इसका मतलब ये है कि इस थेरेपी में ठीक हुए मरीज में बनी एंटीबॉडी दूसरे मरीज को दी जाती है. वहीं मोनोक्लोनल एंटीबॉडी में  एक खास तरह की एंटीबॉडी लेकर उसका फैक्ट्री में बड़े स्तर पर निर्माण किया जा सकता है.




    एंटबॉडी कॉकटेल के लिए दो या ज्यादा इस तरह की मिश्रण को दिया जाता है. डॉ फाउची का कहना है कि  मोनोक्लोनल एंटीबॉडी एक समान प्रवृत्ति की वजह से ये पूरी तरह से शुद्ध होता है. मोनोक्लोनल एंटीबॉडी और प्लाज्मा के बीच सबसे बड़ा अंतर यही है कि प्लाज्मा में कई दूसरी चीजें होती हैं जिससे एलर्जी हो सकती है जबकि मोनोक्लोनल एंटीबॉडी के साथ ये बात लागू नहीं होती है. इसलिए ये उपचार के मामले में ज्यादा कारगर है.

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