ऐसे बना 'आयाराम-गयाराम' का सियासी जुमला

ऐसे बना 'आयाराम-गयाराम' का सियासी जुमला
निर्दलीय विधायक गयालाल ने नौ घंटे में तीन पार्टियां बदली थीं

भारतीय राजनीति में ‘आया राम, गया राम’ का मुहावरा हरियाणा की देन है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 26, 2017, 1:49 PM IST
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गुजरात और हिमाचल का चुनावी समर शुरू होने के साथ ही नेताओं के बीच आयाराम-गयाराम का खेल भी शुरू हो गया है. दिल और दल दोनों बदल रहे हैं.

कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों के नेता अपने हित साधने के लिए दूसरी पार्टियों का दामन थाम रहे हैं. सुबह किसी दल में, रात को किसी और में. आयाराम-गयाराम का दुख हर पार्टी झेल रही है.

दरअसल, राजनीति में नेताओं के दल बदलने का चलन नया नहीं है. तेजी से पाला बदलने की इस प्रवृत्‍ति को लेकर आयाराम-गयाराम की कहावत ही बन गई. आइए जानते हैं कि कहां से और कैसे शुरू हुई यह कहावत और किस तरह से यह वर्तमान राजनीति का सबसे असरदार शब्‍द बन गया.



हरियाणा से चलन में आई कहावत
दरअसल, इसकी जड़ हरियाणा की राजनीति में है. आयाराम-गयाराम का जुमला दलबदल के पर्याय के रूप में 1967 में मशहूर हुआ.

हरियाणा के हसनपुर (सुरक्षित) क्षेत्र से निर्दलीय विधायक गयालाल ने 1967 में एक ही दिन में तीन बार दल बदल कर रिकॉर्ड बना दिया था. इसके साथ ही भारतीय राजनीति में आयाराम-गयाराम का मुहावरा मशहूर हो गया.

वरिष्‍ठ पत्रकार नवीन धमीजा कहते हैं कि हरियाणा के एक राज्यपाल जीडी तपासे ने एक बार कहा था- 'जिस तरह हम कपड़े बदलते हैं, वैसे ही यहां के विधायक दल बदलते हैं.' हरियाणा के पहले सीएम भगवत दयाल शर्मा की सरकार गिरने के दौरान इस कहावत का जन्‍म हुआ.

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9 घंटे में बदलीं तीन पार्टियां
भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस से टूट कर आए विधायकों ने विशाल हरियाणा पार्टी नाम से नई पार्टी का गठन किया. फिर उन्‍होंने दक्षिण हरियाणा के बड़े नेता राव बिरेंद्र सिंह की रहनुमाई में नई सरकार का निर्माण किया. इसी दौरान फरीदाबाद क्षेत्र में आने वाले हसनपुर सीट के निर्दलीय विधायक गयालाल ने एक दिन में तीन पार्टियां बदल डालीं.

बताया जाता है कि गयालाल पहले कांग्रेस से यूनाइटेड फ्रंट में गए, फिर कांग्रेस में लौटे और फिर 9 घंटे के अंदर ही यूनाइटेड फ्रंट में शामिल हो गए. उस समय बिरेंद्र सिंह ने कहा था, 'गया राम, अब आया राम है.' इसके बाद से ही दलबदलू नेताओं के लिए यह मुहावरा बन गया. हरियाणा के वयोवृद्ध कांग्रेस नेता बलदेव राज ओझा बताते हैं कि इसी घटना से सियासत में एक नया मुहावरा मिला था.

किताबों में दर्ज दलबदलू राजनीति का इतिहास
वरिष्‍ठ पत्रकार हरिवंश ने अपनी पुस्‍तक 'झारखंड: सपने और यथार्थ' में इस घटना का जिक्र किया है.  वह लिखते हैं कि ‘1967 के बाद हरियाणा से जिस आयाराम गयाराम की राजनीतिक संस्‍कृति शुरू हुई थी वह क्‍या थी? सुबह में जो एमएलए इधर होता था, दोपहर में दूसरे खेमे में. शाम में तीसरे, रात में चौथे खेमे में’.

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राजीव रंजन की पुस्‍तक '1000 राजनीतिक प्रश्‍नोत्‍तरी' नामक किताब में तो इस घटना पर प्रश्‍नोत्‍तरी दी गई है. बताया गया है कि 1967 में सबसे पहले संसद में यशवंतराव चह्वाण ने आयाराम गयाराम शब्दबंध का जिक्र किया. केंद्रीय माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड की 11वीं कक्षा के राजनीति विज्ञान की पुस्‍तक में भी इस घटना का जिक्र किया गया है. उसमें कहा गया है ‘हरियाणा में आयाराम-गयाराम की राजनीति शुरू हुई.
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