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Analysis: शिवसेना के साथ गठबंधन कांग्रेस के लिए साबित हो पाएगा फायदे का सौदा?

सोनिया गांधी को शपथ ग्रहण समारोह का न्योता देने आए शिवसेना नेता आदित्य ठाकरे (बाए)

सोनिया गांधी को शपथ ग्रहण समारोह का न्योता देने आए शिवसेना नेता आदित्य ठाकरे (बाए)

महाराष्‍ट्र में कांग्रेस (Congress) ने शिवसेना के साथ गठबंधन कर देश के सबसे धनी राज्‍य की सरकार में हिस्‍सेदारी हासिल कर ली है. साथ ही अब तक कांग्रेस के लिए अछूत रही घोर दक्षिणपंथी पार्टी (Shiv Sena) से समझौता कर लंबे समय से चली आ रही धर्मनिरपेक्षता (Secularism) और सांप्रदायिकता (Communal) की बहस से भी खुद को बचा लिया है.

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    भावदीप कंग

    भारतीय राजनीति में अजीब-अजीब गठबंधन (Alliance) हुए हैं, लेकिन घोर दक्षिणपंथी शिवसेना (Shiv Sena) और सेंटर-लेफ्ट कांग्रेस व एनसीपी (Congress-NCP) के गठबंधन जैसी अजीब घटना भारतीय राजनीत में पहले कभी नहीं हुई होगी. क्‍या यह शत-प्रतिशत सहूलियत का समझौता है या ये हमारे लोकतंत्र के वैचारिक स्पेक्ट्रम में एक बड़े बदलाव की शुरुआत है. सेंटर-राइट बीजेपी (BJP) और कांग्रेस-एनसीपी का गठबंधन भी इतना अजीब नहीं लगता, जितना कांग्रेस के हाथ का शिवसेना के बाघ के पंजे को पकड़ना नजर आ रहा है. हालांकि, महाराष्‍ट्र (maharshtra) में हुई सियासी उठापटक में विचारधारा की कोई भूमिका थी ही नहीं. यहां हर हाल में सत्‍ता हासिल करने का खेल चल रहा था.

    कांग्रेस ने समय-समय पर बदली अपनी विचारधारा
    महाराष्‍ट्र में सियासी विरोधियों ने राम मंदिर निर्माण (Ram Mandir) को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की मंजूरी के तुरंत बाद आपस में हाथ मिला लिया. हर व्‍यक्ति ऐसे बयान दे रहा था ताकि सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता की तकरार को तूल न मिल सके. भारतीय राजनीति 80 के दशक की शुरुआत में ऐसे ही मुद्दों के इर्दगिर्द घूम रही थी. इस दौर में कांग्रेस की विचारधारा में अलग ही बहाव नजर आ रहा था. पंडित जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) के अवसरवाद और इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के समाजवाद से लेकर पीवी नरसिम्‍हा राव (PV Narsimha Rao) का दक्षिणपंथ की ओर झुकाव तक कांग्रेस ने समय-समय पर अलग-अलग रुख अपनाया था. कांग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमाहेन सिंह (Dr. Manmohan Singh) के शासनकाल में नव-उदारवादी समाजवाद को अपनाया.

    राहुल ने अपने पिता की विचारधारा को अपनाया
    90 का दशक भारतीय राजनीति में दक्षिणपंथ के दबदबे का दौर था. ऐसे में सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने वामदलों के साथ मिलकर लोकलुभावन नीतियां बनाईं. साथ ही कांग्रेस को स्‍पष्‍ट तौर पर धर्मनिरपेक्ष दल के रूप में स्‍थापित करने के लिए अल्‍पसंख्‍यकवाद को बढ़ावा दिया. उनके बाद राहुल गांधी (Rahul Gandhi) अपने पिता राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) की तरह रूढि़वादी उदारवाद को लेकर आगे बढ़े. समय के मुताबिक खुद को ढालने की प्रवृत्ति देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए बेहतर ही साबित हुई है. अब शिवसेना के साथ गठबंधन कर कांग्रेस न सिर्फ देश के सबसे धनी राज्‍य की सरकार में शामिल हो गई है, बल्कि धार्मिक बहुलवाद और अल्‍पसंख्‍यक अधिकारों पर कभी न खत्‍म होने वाली बहस से भी खुद को दूर कर लिया है.

    कांग्रेस ने पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक अपनी विचारधारा को जरूरत के मुताबिक समय-समय पर बदला है.


    शिवसेना से गठबंधन के खिलाफ कांग्रेस में उठी थी आवाज
    कांग्रेस के लिए महाराष्‍ट्र में शिवसेना के साथ गठबंधन करना आसान नहीं था. कांग्रेस के दक्षिणी राज्‍यों के ऐसे बड़े नेताओं ने इसका विरोध किया था, जिन्‍होंने पार्टी की धर्मनिरपेक्ष छवि को बनाए रखने के लिए बहुत कुछ दांव पर लगाया था और हमेशा भगवाकरण का विरोध किया था. क्‍या वे अंत में इस बात पर शिवसेना के साथ जाने के लिए तैयार हुए कि अगर सरकार नहीं बनाई गई तो प्रदेश कांग्रेस में फूट पड़ सकती है. क्‍या उदारवादी मतदाताओं के बीच बीजेपी की बढ़ती स्‍वीकार्यता के कारण कांग्रेस ने इस बार धर्मनिरपेक्षता से दूरी बनाई है. दरअसल, बीजेपी ने लोगों को समझाया कि न तो वह संवेदनहीन सांप्रदायिक पार्टी है और न ही उसका स्‍वभाव फासीवादी है. बीजेपी ने मतदाताओं को समझाया कि उसे संस्‍थाओं को बेहतर तरीके से चलाने के लिए नियंत्रण चाहिए कि उन्‍हें बर्बाद करने के लिए.

    कांग्रेस को ढूंढनी होंगी एनडीए सरकार के काम में खामियां
    बीजेपी के रुख के कारण कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता को लेकर की गई बातों का लोगों पर कुछ खास असर नहीं हुआ. आतंकवाद (Terrorism) के खिलाफ कांग्रेस का नरम रवैया और सरकार में रहकर भ्रष्‍टाचार (Corruption) को बढ़ाने के रिकॉर्ड ने बीजेपी को उभरने का मौका दिया. अब कांग्रेस ऊंचे वैचारिक स्‍तर को पकड़कर बैठी नहीं रह सकती है. अब कांग्रेस को एनडीए सरकार (NDA Government) के कामकाज पर पूरा ध्‍यान देना होगा. उनमें खामियां ढूंढनी होंगी. हाल में हुए विधानसभा चुनावों में स्‍पष्‍ट तौर पर दिख रहा है कि मतदाता बीजेपी से दूर जा रहे हैं. लोग अर्थव्‍यवस्‍था (Economy) के हालात को लेकर सरकार की आलोचना कर रहे हैं. अब तक कोई नहीं सोच सकता था कि मुख्‍यधारा की एक धर्मनिरपेक्ष पार्टी दक्षिणपंथी दल का समर्थन कर सकती है.

    यूरोप में हुए गठबंधनों जैसा है शिवसेना-कांग्रेस का करार
    महाराष्‍ट्र में हुआ दक्षिण-वाम (Left-Right) समझौता यूरोप (Europe) में हुए कुछ गठबंधनों की ही तरह है. ग्रीस में कट्टरपंथी वामदल सीरिजा ने रूढि़वादी एएनईएल (ANEL) के साथ गठबंधठन किया था. वहीं, इटली में सरकार के खिलाफ हुए एक आंदोलन ने वाम गुट को राइट लीग से गठबंधन करने के लिए मजबूर कर दिया था. महाराष्‍ट्र में हुए इस अजूबे के सूत्रधार एनसीपी प्रमुख शरद पवार जबरदस्‍त व्‍यवहारिक व्‍यक्ति हैं. उन्‍होंने चुनाव से पहले शिवसेना के साथ गठबंधन से इनकार कर दिया था. इसका कारण दोनों दलों की विचारधाराओं में टकराव नहीं था. उन्‍हें पता था कि इस गठबंधन के कारण उनका अपना वोटबैंक खिसक जाएगा. चुनाव के बाद हालात बदल गए. शिवसेना के साथ गठबंधन कर उनके पास मराठा और दलितों का समर्थन हासिल करने का मौका है.

    सियासी हमले के लिए मौके की तलाश में रहेगी बेीजेपी
    महायुती के निशाने पर अब शिवसेना के बजाय बीजेपी होगी. वहीं, बीजेपी भी शिवसेना पर सियासी हमले का कोई मौका नहीं चूकेगी. अगर शरद पवार गठबंधन को बनाए रखने में अफसल हुए तो बीजेपी को बड़ा मौका मिल जाएगा. वहीं, अब कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता के बजाय आम लोगों से जुड़े मुद्दों पर ध्‍यान दे सकती है. महाराष्‍ट्र में बना शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस का यह नया गठबंधन दक्षिणपंथी खेमे में पड़ी पहली दरार है.
    (लेख वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. लेख उनके निजी विचार हैं.)

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