Lockdown: कोरोना काल में बेघरों का क्या? न टेस्टिंग-न वैक्सीनेशन, लॉकडाउन से और परेशानी

रास्तों पर गुजर-बसर करने वाले इन लोगों के लिए लॉकडाउन और नाइट कर्फ्यू जैसे शब्दों के मायने अलग हैं. (प्रतीकात्मक: Shutterstock)

रास्तों पर गुजर-बसर करने वाले इन लोगों के लिए लॉकडाउन और नाइट कर्फ्यू जैसे शब्दों के मायने अलग हैं. (प्रतीकात्मक: Shutterstock)

Homeless and Coronavirus: रास्तों पर गुजर-बसर करने वाले इन लोगों के लिए लॉकडाउन (Lockdown) और नाइट कर्फ्यू जैसे शब्दों के मायने अलग हैं. घर नहीं होने और खुले में घूमने-फिरने के चलते ये देश में कोरोना वायरस नियंत्रण की सरकार की कोशिशों को और मुश्किल बना सकते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 26, 2021, 7:11 AM IST
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नई दिल्ली. राजधानी दिल्ली (Delhi) में लॉकडान को एक हफ्ते के लिए बढ़ा दिया गया है. कर्नाटक (Karnataka) में भी सरकार ने लॉकडाउन की घोषणा के संकेत दे दिए हैं. महाराष्ट्र में 'कर्फ्यू' जारी है. भारत के अन्य राज्यों में भी नाइट कर्फ्यू (Night Curfew), संपूर्ण लॉकडाउन जैसे फैसले लिए गए हैं. दरअसल, सरकार और जानकारों का मानना है कि इन उपायों से लोगों की गतिविधियों में कमी आती है और कोरोना वायरस के प्रसार को कुछ हद तक काबू किया जा सकता है. इन पाबंदियों के लागू होने के बाद लोगों का कुछ समय के लिए घर से बाहर निकलना बंद हो जाता है. अब सवाल उन लोगों का उठता है, जिनका घर ही नहीं है. इनकी न टेस्टिंग की सही व्यवस्था दिखती है और न ही वैक्सीनेशन की और ऊपर से नाइट कर्फ्यू या लॉकडाउन जैसी चीज़ें इनकी मुश्किलें बढ़ा देती हैं.

सरकारी रिकॉर्ड में 'बेघर' कही जाने वाली ये आबादी देश में 17 लाख 72 हजार 889 है. इनमें से 8 लाख 34 हजार 541 लोग शहरी क्षेत्र में हैं. जबकि, 52 फीसदी से ज्यादा यानि 9 लाख 38 हजार 348 ग्रामीण हिस्सों में हैं. आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में बेघरों की संख्या एक लाख से ज्यादा है. जबकि, महाराष्ट्र में 2 लाख और उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 3 लाख 29 हजार 125 लोगों के पास घर नहीं है. ये आंकड़े जनगणना 2011 के हैं.

रास्तों पर गुजर-बसर करने वाले इन लोगों के लिए लॉकडाउन और नाइट कर्फ्यू जैसे शब्दों के मायने अलग हैं. घर नहीं होने और खुले में घूमने-फिरने के चलते ये देश में कोरोना वायरस नियंत्रण की सरकार की कोशिशों को और मुश्किल बना सकते हैं. जानकार बताते हैं कि ये अन्य लोगों तो नहीं, लेकिन आपस में ही कोरोना वायरस का जोखिम बढ़ा सकते हैं. वे इन्हें संक्रमण के मामलों को लेकर जागरूक करने की बात कहते हैं.

सामाजिक संस्थाएं निभा रही हैं अहम भूमिका
दिल्ली में संचालित आश्रय अधिकार अभियान की निदेशक परमजीत कौर पिछले 20 सालों से लगातार बेघरों को जगह और दूसरी जरूरत की चीजें मुहैया कर रही हैं. वे कहती हैं 'पिछली बार जब लॉकडाउन हुआ था, तो पहली बार था. इस बार हमारे पास कुछ समय भी था और कुछ अनुभव भी था. प्रबंधन के लिहाज से यहां हालात थोड़े हमारे पक्ष में आते हैं. पिछला लॉकडाउन हमारे लिए काफी चौंकाने वाला था.'

महामारी के दौर में भी उन्होंने काम जारी रखा है. उन्होंने बताया कि दिल्ली में उनके 12 शेल्टर सेंटर्स हैं, जिनमें से 4 को आइसोलेशन सेंटर्स बना रखा है. उन्होंने कहा कि 7 किचन के जरिए इन सभी केंद्रों पर खाना पहुंचाया जाता है. उन्होंने बताया कि आश्रय गृह में एंट्री के दौरान खाने, सैनिटेशन और हाइजीन की पूरी व्यवस्था है. सोशल डिस्टेंसिंग के साथ उन्हें रखेंगे. उन्होंने बताया कि जब कोई व्यक्ति आता है, तो उसकी थर्मल स्क्रीनिंग होती है. सरकार की मेडिकल टीम हफ्ते में एक बार आती है, नहीं तो 102 सेवा उपलब्ध है.

कई चुनौतियां भी हैं



मुंबई के अंधेरी ईस्ट में स्नेहासदन स्थित है. यहां फादर नोएल पिंटो के निदेशन में बेघर बच्चों की देखरेख की जाती है. वे टेस्टिंग में होने वाली देरी को सबसे बड़ी परेशानी बताते हैं. वे कहते हैं कि अस्पतालों में भी समय के हिसाब से काम होता है. यानि एक समय के बाद टेस्टिंग नहीं की जाती है. अगर बच्चे शाम या रात के समय मिल गए, टेस्ट होना मुश्किल होता है. बगैर टेस्टिंग के नए सदस्य को अन्य बच्चों के साथ रखना और खतरनाक हो सकता है.

उन्होंने कहा 'हम पुलिस को कम से कम एंटीजन टेस्ट कराने का निवेदन करते हैं.' हालांकि, वे इस बात को मानते हैं कि एंटीजन टेस्ट से सटीक नतीजे नहीं आते, लेकिन इससे संकेत मिल जाते हैं. लेकिन एंटीजन टेस्ट की भी सरकारी अस्पतालों में सीमित टाइमिंग होती है. पिंटो बताते हैं कि अगर सरकार अस्थाई क्वारंटीन सेंटर बनाए, तो थोड़ी सुविधा हो सकती है. इसके अलावा उन्होंने बताया कि इस दौरान लोग जो आमतौर पर बेघर बच्चों को लेकर पुलिस या संस्थाओं तक पहुंच रहे थे, उनमें से भी कुछ लोग अब थोड़ा हिचकने लगे हैं, हालांकि, उन्होंने पुलिस और काम कर रहे लोगों की सराहना की है.

पिछले लॉकडाउन को याद कर कौर कहती हैं 'कई लोग नशे की लत का भी शिकार थे. बंद कैंपस में रखना काफी मुश्किल था. उन लोगों को यह एहसास दिलाना काफी मुश्किल था कि आप यहां सुरक्षित हैं.' उन्होंने बताया कि तमाम कोशिशों के बाद भी बेघर लोगों के नजर आने पर वहां अपना पता छोड़कर आते हैं. अगर मुमकिन होता है, तो हम थर्मल स्क्रीनिंग के बाद गाड़ी में लेकर आ जाते हैं.



रिपोर्ट्स बताती हैं कि हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क ने नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स से कोविड काल में बेघर बच्चों के हितों की रक्षा करने की अपील की है. कई मामलों में सही फोटो आईडी और महामारी को लेकर जागरूकता नहीं होने के चलते इनके टीकाकरण की राह आसान नहीं है. 1 मई से सरकार ने 18 साल से ज्यादा उम्र के सभी लोगों को वैक्सीन लगवाने की तैयारी की है.
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