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सुवेंदु अधिकारी के जाने से बंगाल में ममता को होगा कितना नुकसान, आंकड़ों से समझें पूरी कहानी

2019 के लोकसभा चुनाव में सुवेंदु अधिकारी के गढ़ में 13 में से 9 सीटों पर टीएमसी की हुई हार. फाइल फोटो
2019 के लोकसभा चुनाव में सुवेंदु अधिकारी के गढ़ में 13 में से 9 सीटों पर टीएमसी की हुई हार. फाइल फोटो

सुवेंदु (Suvendu Adhikari) के बंगाल सरकार से इस्तीफा देने के बाद सियासी गलियारों में कोहराम मचा रहा है, लेकिन चुनावी आंकड़े बता रहे हैं कि अपने गढ़ में टीएमसी का झंडा बुलंद रख पाने में नाकाम रहे अधिकारी...

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 28, 2020, 10:53 PM IST
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कोलकाता. सुवेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) के शुक्रवार को बंगाल सरकार से इस्तीफा देने पर बीजेपी की बांछें खिल गईं और राज्य बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष (Dilip Ghosh) ने तत्काल प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अधिकारी के लिए पार्टी के दरवाजे खुले हैं. लेकिन, फैक्ट ये है कि टीएमसी (TMC) 2019 के लोकसभा चुनाव में उन 13 सीटों में नौ सीटों पर हार गई जिन्हें सुवेंदु अधिकारी का गढ़ माना जाता था और ये भी कि पुरुलिया, झारग्राम, मुर्शिदाबाद, मालदा, पूर्वी मिदनापुर, पश्चिम मिदनापुर, बांकुड़ा और बिशनुपुर में लोगों के बीच अधिकारी बेहद लोकप्रिय हैं.

पुरुलिया में 1 लोकसभा सीट और 9 विधानसभा की सीटें हैं. मुर्शिदाबाद में तीन लोकसभा की और 19 विधानसभा की सीटें हैं. मालदा में दो लोकसभा सीट और 12 विधानसभा सीटें हैं और पूर्वी मिदनापुर में दो लोकसभा की और 15 विधानसभा की सीटें हैं. बांकुड़ा और बिशनुपुर को मिलाकर देखें तो दो लोकसभा की और 6 विधानसभा की सीटें हैं. पश्चिमी मिदनापुर में दो लोकसभा की और 15 विधानसभा की सीटें हैं. झारग्राम में एक लोकसभा की और चार विधानसभा की सीटें हैं. कुल 13 लोकसभा सीटें और 86 विधानसभा की सीटें... इन इलाकों में सुवेंदु अधिकारी को बूथ मैनेजमेंट का शानदार टास्कमास्टर माना जाता था.

2019 लोकसभा चुनाव के आंकड़ों को देखें तो चार सीटों- कांठी (जहां सुवेंदु के पिता शिशिर अधिकारी टीएमसी के टिकट पर जीते लेकिन बीजेपी को 33.54 प्रतिशत वोट शेयर मिला, और शिशिर को 3.82 प्रतिशत वोट का नुकसान हुआ), तामलुक (सुवेंदु के भाई दिव्येंदु टीएमसी के टिकट पर जीते, लेकिन बीजेपी को 30.54 वोट प्रतिशत मिला, और दिव्येंदु को 3.52 प्रतिशत वोटों का नुकसान हुआ), जंगीपुर (टीएमसी के खलीलुर रहमान ने बीजेपी की माफुजा खातून को हराया) और मुर्शिदाबाद (टीएमसी के अबू ताहेर खान जीते) को छोड़कर बाकी सीटों पर टीएमसी को हार का सामना करना पड़ा.




बीजेपी ने 13 सीटों में से 7 पर (बरहामपुर और मालदा दक्षिण सीट पर कांग्रेस को जीत मिली) अपने दम पर जीत हासिल की और सुवेंदु अधिकारी के गढ़ कहे जाने वाले इन जिलों में घातक सेंध लगाई. अगर हर सीट का करीबी से आकलन करें तो पुरुलिया सीट पर बीजेपी के ज्योतिर्मय सिंह महतो ने ना केवल जीत हासिल की बल्कि टीएमसी की मृगांका महतो को 2 लाख से ज्यादा वोटों से हराया. बीजेपी के वोट शेयर को देखें तो इसमें 42.15 प्रतिशत का उछाल देखने को मिला है, जबकि टीएमसी के वोट शेयर में 4.68 प्रतिशत की कमी आई.


मिदनापुर में बीजेपी के राज्य अध्यक्ष दिलीप घोष ने टीएमसी के मानस रंजन भूनिया को 88 हजार से ज्यादा वोटों से हराया. घताल की तरह ही मिदनापुर में बीजेपी के वोट शेयर में 34.36 प्रतिशत का उछाल देखने को मिला. झारग्राम सीट पर बीजेपी के कुनार हेम्ब्राम ने टीएमसी के बीरबाह सोरेन को 11 हजार से ज्यादा वोटों से हरा दिया. मिदनापुर की तरह ही झारग्राम में भी बीजेपी के वोट शेयर में 34.33 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई.

कुल मिलाकर सुवेन्दु अधिकारी के गढ़ में 13 लोकसभा सीटों में से 9 पर टीएमसी को हार का सामना करना पड़ा. दो पर कांग्रेस जीती. जंगीपुर और मुर्शिदाबाद को छोड़ दें तो बाकी सीटों पर टीएमसी का वोट प्रतिशत भी कम हुआ, जबकि बीजेपी के वोट शेयर में 29 से 30 प्रतिशत की उछाल देखने को मिली.

न्यूज18 के साथ बातचीत में राजनीतिक विशेषज्ञ कपिल ठाकुर ने कहा कि ये फैक्ट है कि सुवेंदु के गढ़ में टीएमसी को हार का सामना करना पड़ा. लेकिन टीएमसी में एक ही नेता है और उसका नाम है ममता बनर्जी. लोग टीएमसी को वोट ममता के नाम पर देते हैं. सुवेंदु खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश बीजेपी के साथ मोलभाव के लिए कर रहे हैं. ठाकुर ने कहा कि अभी सुवेंदु के असर के बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी. लेकिन, देखना होगा कि उनके फैसलों पर जनता की प्रतिक्रिया क्या होती है. पिछले कुछ महीनों से सुवेंदु अधिकारी टीएमसी के झंडे और बैनर के बिना रैलियां कर रहे हैं. इन रैलियों में उनके समर्थक आमरा दादार अनुगामी (हम अपने बड़े भाई के फॉलोवर हैं) के नारे लगा रहे हैं.

शुक्रवार को कूच बिहार से टीएमसी विधायक मिहिर गोस्वामी के बीजेपी ज्वॉइन करने से कुछ घंटे पहले सुवेंदु अधिकारी ने ममता कैबिनेट से इस्तीफा देकर राजनीतिक पारा बढ़ा दिया. सुवेंदु ने ममता सरकार से ट्रांसपोर्ट और सिंचाई मंत्री के पद से इस्तीफा दिया. हालांकि अब भी वे टीएमसी के विधायक हैं और विधानसभा से इस्तीफा नहीं दिया है. माना जा रहा है कि सुवेंदु ने टीएमसी छोड़ने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं.

2007 में पश्चिमी मिदनापुर के नंदीग्राम में ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) के आंदोलन के पीछे सुवेंदु अधिकारी की बड़ी भूमिका मानी जाती है. नंदीग्राम से उठे इस आंदोलन की लहर पर सवार होकर ममता ने बंगाल में 34 साल पुराने लेफ्ट फ्रंट के शासन को उखाड़ फेंका. आगे चलकर ममता बनर्जी ने सुवेंदु को इसका इनाम भी दिया और फायदा सुवेंदु के परिवार को भी मिला.

तब से लेकर सुवेंदु को टीएमसी में ताकतवर नेता के तौर पर देखा जाता रहा है, लेकिन कहा जाता है कि टीएमसी के कुछ नेताओं के हाव भाव से सुवेंदु खुश नहीं हैं और सिर्फ ममता के निर्देश पर पार्टी के लिए काम कर रहे हैं. 2017 में नेताजी इंडोर स्टेडियम में टीएमसी की संगठनात्मक बैठक से भी सुवेंदु गायब रहे. मार्च 2020 में भी ऐसा ही हुआ. मीडिया में खबरें चलने लगीं कि सुवेंदु ने टीएमसी से इस्तीफा दे दिया. 9 अगस्त 2020 को झारग्राम में आयोजित एक कार्यक्रम से भी सुवेंदु गायब रहे.

पार्टी के कार्यक्रमों से सुवेंदु के गायब रहने से टीएमसी में असहजता लगातार बढ़ती गई और अधिकारी के इन कदमों को 2021 के विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी के खिलाफ जाने के संकेत के तौर पर लिया जाता रहा है. हाल ही में बंगाल बीजेपी अध्यक्ष ने कहा था कि सुवेंदु बड़े नेता हैं और पार्टी में उनका स्वागत है.

हालांकि टीएमसी को लाभ और नुकसान के बारे में अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी, लेकिन ममता बनर्जी अपनी गोटियां बिछाने में लगी हैं और युवा नेताओं के दम पर पार्टी की संगठनात्मक कमजोरियों को दूर करने में लगी हैं. पार्टी के युवा नेताओं में महुआ मोइत्रा, कर्नल दिप्तांशु चौधरी (रिटायर्ड), रंजीब बनर्जी, जितेंद्र तिवारी (आसनसोल मेयर), पार्थ प्रतिम रॉय ममता के युवा तुर्क की भूमिका में दिख रहे हैं. 2021 की गर्मियों में होने वाला बंगाल विधानसभा का चुनाव तो भी आकार ले रहा है.
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