आग उगलती धरती; बढ़ती आबादी, पर्यावरण और प्रदूषण

पृथ्वी पर आज जितना पानी है, पहले उससे कहीं ज्यादा था. (प्रतीकात्मक तस्वीर)
पृथ्वी पर आज जितना पानी है, पहले उससे कहीं ज्यादा था. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

प्रकृति ने मनुष्य को सभी प्रजातियों में सबसे अधिक बुद्धिमान बनाया है. मनुष्य फिर भी अपने स्वार्थ के कारण कदम दर कदम पर्यावरण को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा हैं. हमारा अस्तित्व उस वातावरण पर निर्भर करता है, जिसमें हम रहते हैं और हम उसी से खिलवाड़ कर रहे हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 11, 2020, 10:27 PM IST
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प्रकृति ने मनुष्य को सभी प्रजातियों में सबसे अधिक बुद्धिमान और जागरूक बनाया है और मनुष्य अपने स्वार्थ व जरूरतों के कारण कदम दर कदम पर्यावरण को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा हैं. हमारा अस्तित्व उस वातावरण पर निर्भर करता है जिसमें हम रहते हैं. हम उसी वातावरण के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं- जिसका नतीजा यह है कि एयर क्वालिटी इंडेक्स जो कि वायु प्रदूषण का स्तर बताता है, उसमें इन दिनों भारी उछाल आया है. यदि अब भी इस बढ़ते खतरे के मद्देनजर उचित कदम नहीं उठाए गए तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी की जिस प्रकार वायरस से बचने के लिए हम मास्क का उपयोग कर रहे हैं, उसी प्रकार आने वाले समय में यह प्रदूषित हवा से बचने के लिए अनिवार्य हो जाएगा.

बिगड़ते मौसम की मार हम हर साल झेलते हैं और फिर चलता है आरोप प्रत्यारोप का सिलिसला. धरती का तापमान दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है. आइए जानते हैं ऐसा क्यों हो रहा है- दरअसल, आधुनिकीकरण के कारण मानव जीवन में कई प्रकार के उपकरण आए और इसके साथ आया उद्योग. विकासशील देशों में बढ़ते औद्योगिकीकरण से रोजगार तो मिला, पर इंडस्ट्रीज से निकलने वाले धुएं और वेस्ट प्रोडक्ट्स का उचित प्रबंधन न हो पाने के कारण पर्यावरण को निरंतर क्षति पहुंचती रही.

बढ़ती जनसंख्या के साथ बढ़ते वाहनों का प्रयोग और उससे निकलने वाले हानिकारक धुएं ने हमारे ओजोन लेयर को भी नुकसान पहुंचाया है. हमारे वायुमंडल में इन हानिकारक गैसों की एक मोटी सतह जमती जा रही है जो सूर्य की किरणों को सोख लेती हैं जिसके कारण होती है ग्लोबल वॉर्मिंग. हमारी जलवायु पर इसका असर ऐसा है कि हर साल भीषण गर्मी की मार हमें झेलनी पड़ती है और साथ ही प्रदूषित हवा हमारे फेफड़ों को बदतर करती जा रही है.



विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization-WHO) ने यह बयान दिया है कि काश पर्यावरण-प्रदूषण और ग्लोबल वॉर्मिंग हमारे स्वास्थ पर असर न डालती, पर ऐसा नहीं है. यह जानलेवा बीमारियों के लिए उपयुक्त संसाधन है. प्रकृति की सबसे जागरूक प्रजाति होने का क्या अर्थ है जब हम अपने पर्यावरण का ही संरक्षण न कर पाएं. मनुष्य की बुद्धिमत्ता अगर उसी के विनाश का कारण बन जाए तो यह कैसी बुद्धिमत्ता. पर्यावरण से ही हम हैं और हमसे यह पर्यावरण.
विश्व के प्रत्येक नागिरक का यह कर्त्तव्य बनता है कि वह जीवन देने वाली इस प्रकृति का सम्मान करे एवं उसे सुरिक्षत रखने का भरसक प्रयास करे. आज से ही बल्कि अभी से ही हमें यह प्रण लेना होगा कि सरकार के साथ-साथ व्यक्तिगत रूप से भी हम अपनी जलवायु को बचाने के लिए प्रयासरत रहेंगे. और विचार करने योग्य है कि यदि यही प्रण देश की 135 करोड़ जनता और विश्व की 7.8 अरब आबादी करती है, तो सोचिए हम कितना बदलाव ला सकते हैं. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)

(लेखक परिचय: समसामयिक विषयों पर लेखन. पर्यावरण, धर्म, शिक्षा, महिलाओं और बच्चों के विकास आदि विषयों पर लगातार लिखती रही हैं.)
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