रोटी की जंग: हमारे देश की जटिल समस्या है भूख और भुखमरी

रोटी, कपड़ा और मकान जीवन की बुनियादी जरूरतों की श्रेणी में सर्वोच्च स्थान पर आता है (प्रतीकात्मक तस्वीर)

रोटी, कपड़ा और मकान जीवन की बुनियादी जरूरतों की श्रेणी में सर्वोच्च स्थान पर आता है (प्रतीकात्मक तस्वीर)

एक ऐसा देश जहां हर तरह के अनाज एवं पोषक-तत्वों से भरपूर फल-फूल आदि की भरमार हो, जहां की मिट्टी अत्यधिक उपजाऊ एवं खनिजों से भरपूर हो, जहां देश का 60 प्रतिशत हिस्सा खेती के लिए उपयोग किया जाता हो, ऐसे देश में भुखमरी की समस्या होना चिंताजनक है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 28, 2020, 8:44 PM IST
  • Share this:

नई दिल्ली. जीवन जीने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान बुनियादी जरूरतों की श्रेणी में सर्वोच्च स्थान पर आता है. कहते हैं- ‘नींद न जाने टूटी खाट, भूख न जाने बासी भात’. जब प्राथमिकताओं की बात आती है तो दो वक़्त की रोटी का इंतज़ाम सबसे पहले किया जाता है. इस हाड़-मांस के शरीर को ज़िंदा रखने के लिए सही खुराक अतिआवश्यक है. लेकिन रोटी और मकान की जंग, पिछड़े और गरीब तबके ने जितनी महसूस की होगी, हमारे लिए उसका आकलन लगा पाना भी मुश्किल है.

जिस वक़्त हम अपने सुंदर घरों में सभी सुविधाओं से लैस, एक आरामदायक जीवन बिता रहे हैं. उसी वक़्त, किसी परिवार में सुबह के बाद शाम के खाने तक का ठिकाना नहीं है. हर रोज रोटी और पानी का संघर्ष किसी के लिए एक दैनिक दिनचर्या है. इन सब के बावजूद, हर कोई एक ही भूख महसूस करता है और भोजन हर जीवित व्यक्ति की प्राथमिक आवश्यकता है. यह कुछ लोगों के लिए एक रोजमर्रा की परीक्षा है, और कुछ को जीवन-भर इस कमी का एहसास भी नहीं होता. भूख और भुखमरी वर्षों से हमारे देश की एक जटिल समस्या है.

एक ऐसा देश जहां हर तरह के अनाज एवं पोषक-तत्वों से भरपूर फल-फूल आदि की भरमार हो, जहां की मिट्टी अत्यधिक उपजाऊ एवं खनिजों से भरपूर हो, जहां देश का 60 प्रतिशत हिस्सा खेती के लिए उपयोग किया जाता हो, ऐसे देश में भुखमरी की समस्या होना चिंताजनक है. विगत दिनों महामारी के कारण लाखों मजदूरों ने अपनी नौकरियां गवाई और कई छोटे-मोटे व्यवसाय कर अपना पेट पालने वाले लोगों का काम ठप्प पड़ गया. ऐसे कष्टदायक समय में भूख और निर्वाह की लड़ाई और भी तीव्र हो गई. पिछले कुछ दिनों से दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान हाल ही में लागू किए गए कृषि संशोधन नियमों के खिलाफ धरने पर बैठे हैं. इस आंदोलन का कारण कहीं न कहीं सरकार और उद्यमियों के ऊपर अविश्वास है और बिना जांचे-परखे लागू किए गए नियम जिसने किसानों के मन में एक अनजाना डर पैदा कर दिया है. देश में हर रोज़ न जाने कितना अनाज ख़राब हो जाता है. और न जाने कितना ही अनाज मंडियों में उचित व्यवस्था के अभाव में सड़ जाता है.

ऐसे में यही अनाज जब जरूरतमंदों तक न पहुंच कर इस प्रकार व्यर्थ हो जाता है तो सरकारी व्यवस्था और आपूर्ति नियमो पर संदेहास्पद चिन्ह लगना लाजमी है. पूरे विश्व में 11 से 15 प्रतिशत लोगों की आज भी भूख से जंग जारी है. भारत सरकार का लक्ष्य है कि आगामी कुछ वर्षों में देश की भुखमरी की समस्या पर पूर्ण विराम लगा सकें, परंतु कथनी और करनी में बहुत फर्क है. जब तक प्रत्येक नागरिक को अन्न की कीमत और ताकत का भली भांति अंदाजा नहीं होगा तब तक वह भोजन को व्यर्थ होने से नहीं बचा सकेंगे. कहते हैं न की- 'समझ वही सकता है जिसके साथ होता है'.
आगे किसी भी काम से पहले, सरकार को देश में बुनियादी जरूरतों की आपूर्ति के लिए ठोस व्यवस्था करनी होगी क्योंकि जब तक एक मजबूत नींव नहीं डाली जाएगी, तब तक देश सही अर्थों में विकसित नहीं हो पाएगा. अनाज का सही तरीके से उपयोग हो सके इसके लिए युद्धस्तर पर कोशिशों की जरुरत है ताकि कहीं कोई अन्न का दुरूपयोग न करे और कहीं कोई दाने-दाने का मोहताज न हो. भारत विश्व में सबसे अधिक कृषि क्षेत्रफल रखता है, ऐसे देश में भूखमरी और कुपोषण एक धब्बे की तरह लगता है. हम कृषि उत्पादों और खरीद के उचित प्रबंधन और वितरण से संबंधित जिम्मेदार निर्णयों से काफी हद तक भुखमरी से निजात पा सकते हैं.

इसके साथ ही प्रचुर मात्रा में उपलब्ध स्थानीय पोषक खाद्य-पदार्थों की जानकारी एवं जागरूकता तथा सरकार की तरफ से अनाज का बेहतर प्रबंधन रोटी की जंग में सफलता दिला सकता है.

'गरीब के जीवन के कुछ ही हैं सुख



मिलता रहे अन्न, मिटती रहे भूख'

(डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)

अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज