Opinion: हैदराबाद गैंगरेप-आखिर पुलिस एनकाउंटर पर देश क्यों मना रहा है जश्न!

Opinion: हैदराबाद गैंगरेप-आखिर पुलिस एनकाउंटर पर देश क्यों मना रहा है जश्न!
घटनास्थल पर जश्न मनाते लोग (PTI)

यहां देखने वाली बात ये है कि आखिर लोगों का कानून से विश्वास क्यों उठ रहा है! जिस संसद पर कानून बनाने की जिम्मेदारी है, उसमें एक तिहाई से ज्यादा सांसदों पर मुकदमें दर्ज हैं. एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक 539 सांसदों में 233 यानी 43 फीसदी सांसदों पर किसी न किसी अपराध में मामला दर्ज है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 6, 2019, 1:24 PM IST
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हैदराबाद (Hyderabad Gangrape and murder case) में महिला डॉक्टर के रेप और हत्या के आरोप में गिरफ्तार आरोपियों के एनकाउंटर के बाद जिस तरह पुलिस की तारीफ हो रही है, उससे एक बात तय है कि देश इस पुलिस मुठभेड़ से खुश है. हालात यहां तक हैं कि देश के अलग-अलग हिस्सों में पुलिस मुठभेड़ पर जश्न मनाया जा रहा है. महिलाएं पुलिसवालों को राखी बांध रही हैं. कोई भी ये जानना नहीं चाहता कि आखिर पुलिस मुठभेड़ में जो हुआ वो कैसे हुआ! क्या पुलिस की जांच के दौरान हालात सच में इस कदर हो गए थे कि पुलिस के पास एनकाउंटर को छोड़ कोई रास्ता नहीं बचा था?

क्या सच में आरोपी भागने और पुलिसवालों से हथियार छीनने की कोशिश कर रहे थे? इसका जवाब जो भी हो, लेकिन एक बात तो तय है कि देश के लोग अब न्याय के लिए लंबा इंतजार नहीं करना चाहते. क्योंकि इस तरह की मांग सिर्फ जनता ही नहीं कर रही थी, बल्कि देश में कानून बनाने वाली संसद में भी अपराधियों को जनता को सौंप देने तक की मांग उठी.

इस मुठभेड़ के बाद आम लोगों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती, मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान, फिल्म जगत से जुड़े लोग पुलिस की इस कार्रवाई की तारीफ कर रहे हैं. ये हालात तब हैं जब जश्न मनाने वाले लोगों में से ज्यादातर कभी न कभी पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठा चुके हैं!



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पुलिस में अपना हीरो क्यों तलाश रहे हैं लोग!
दरअसल इस पुलिस मुठभेड़ के बाद जश्न की जो तस्वीरें आ रहीं हैं, वो सिस्टम पर उठ रहे विश्वास को दिखाती हैं. देश के आम आदमी को अब लगने लगा है कि देश में सिस्टम से कुछ नहीं हो सकता चाहें वो न्याय की लड़ाई ही क्यों न हो. ऐसे में वो सिस्टम के खिलाफ अपने उस हीरो की तलाश में है, जो दशकों से सिनेमा के पर्दे पर उसका मनोरंजन करता रहा है.

उनके लिए कानून और न्याय नामक शब्द बेमानी है. उसका काम सिर्फ बदला लेना है और वो हर उस चीज का बदला लेता है जो उसके साथ घटा है और सिनेमा के पर्दे पर उस हीरो को देखकर पब्लिक ताली बजाती है. उसका हीरो अगर कहीं लूट भी करता है तो सही है. उसका हीरो खून भी करता है तो सही है. लेकिन हमें समझना होगा कि हमारे संविधान या कानून में बदला नहीं न्याय की बात होती है.

इसलिए सेल्फ डिफेंस में खून को खून नहीं माना जाता, हर घटना और दुर्घटना की परिस्थितियों का आकलन किया जाता है, जो आरोपी गिरफ्त में आए हैं क्या सही में वहीं आरोपी हैं इसकी जांच की जाती है. ये प्रक्रिया लंबी है, लेकिन न्याय के लिए जरूरी भी है. हालांकि हमारा फिल्मी हीरो इसमें यकीन ही नहीं रखता. उसका तो बदला ही न्याय है, लेकिन यहां देखने वाली बात है कि आखिर हीरो पैदा कब होता है. जब उस इलाके के लोगों का विश्वास कानून और पुलिस से उठ जाता है. तो क्या वाकई इस देश में लोगों का विश्वास पुलिस और कानून से उठता जा रहा है.

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आखिर क्यों उठ रहा है सिस्टम से भरोसा
यहां देखने वाली बात ये है कि आखिर लोगों का कानून से विश्वास क्यों उठ रहा है! जिस संसद पर कानून बनाने की जिम्मेदारी है, उसमें एक तिहाई से ज्यादा सांसदों पर मुकदमें दर्ज हैं. एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक 539 सांसदों में 233 यानी 43 फीसदी सांसदों पर किसी न किसी अपराध में मामला दर्ज है. एक रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ दिल्ली में 4 साल में पुलिसकर्मियों पर रेप के 53 मामले दर्ज हुए, जिसमें सिर्फ 11 जेल गए. इनमें किसी को सजा नहीं मिली, जबकि 8 आरोपी तो पीसीआर में ड्यूटी तक कर रहे हैं.

अदालतों में समय से न्याय नहीं मिल रहा है. जिस निर्भया कांड के बाद देश हिल गया, उसके आरोपियों की सजा अब तक सिर्फ कागजों पर है, जबकि देश में सरकार बनने, नेताओं की जमानत जैसे बड़े मुद्दे पर कोर्ट के फैसले महीनों में ही आ जा रहे हैं. ऐसे में देश की आम जनता का भरोसा कानून बनाने वाली संसद, कानून का पालन करने वाली पुलिस और कानून का पालन न करने पर सजा देने वाली न्यायपालिका तीनों से उठता जा रहा है और वो सड़क पर न्याय की मांग करने लगी है.

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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