वैज्ञानिक तैयार कर रहे 'अहिंसा मीट,' जिसके लिए न तो जानवर काटे जाएंगे और न ही बहेगा खून

देश में वैज्ञानिक अब ऐसा मीट तैयार कर रहे हैं, जिसके लिए न तो जानवर काटे जाएंगे और न ही खून बहेगा. ये मीट साइंटिफिक लैबोरेट्रीज में तैयार होगा और आजकल मिलने वाले मीट से कहीं ज्यादा पौष्टिक होगा.

News18Hindi
Updated: July 18, 2019, 9:53 PM IST
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गोकशी के नाम पर हिंसा की खबरें इन दिनों आम हैं. लेकिन आने वाले कुछ सालों में शायद कोई इसकी बात भी न करे, क्योंकि देश में वैज्ञानिक अब ऐसा मीट तैयार कर रहे हैं, जिसके लिए न तो जानवर काटे जाएंगे और न ही खून बहेगा. ये मीट साइंटिफिक लैबोरेट्रीज में तैयार होगा और आजकल मिलने वाले मीट से कहीं ज्यादा पौष्टिक होगा. इसे 'क्लीन मीट' या 'अहिंसा मीट' कहा जा रहा है.

हैदराबाद के सेंटर ऑफ सेलुलर एंड मोलिक्यूलर बायोलॉजी CCMB में अहिंसा मीट तैयार किया जा रहा है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि आने वाले 4-5 सालों में क्लीन मीट का उत्पादन फैक्ट्रियों में मौजूद लैब्स में किया जा सकेगा. इसके लिए पहले बकरी का स्टेम सेल निकाला जाता है. स्टेम सेल उस कोशिका को कहते हैं, जिसमें विभाजन की क्षमता होती है. बकरी के स्टेम सेल को लैब में विकसित किया जाता है. स्टेम सेल विभाजित होते-होते मांस के टुकड़े का रूप ले लेती हैं. लेकिन इसमें सबसे बड़ी चुनौती कोशिकाओं के विभाजन और विकसित होने के लिए उनको पोषक तत्व देने की है.

इस तरह से लैब में विकसित किया जाएगा मांस
सीसीएमबी के डायरेक्टर राकेश कुमार मिश्रा ने बताया कि 'कोशिकाओं को लैब में विकसित करने के लिए गाय के खून में मौजूद कोशिकाओं के जीवद्रव्य का इस्तेमाल किया जाता है. इसे सीरम कहते हैं. सीरम बहुत ज्यादा पौष्टिक होता है और कोशिकाएं उसी से भोजन ग्रहण कर विकसित होती हैं. लेकिन क्लीन मीट बनाने के लिए अगर हम गाय के खून से तैयार सीरम का इस्तेमाल करेंगे, तो इस प्रोजेक्ट का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा. हम इसके लिए हर्बल या सिंथेटिक सीरम बनाना चाहते हैं. यह सबसे बड़ी चुनौती है. हमारे पास इसका कोई फॉर्मूला नहीं है. लेकिन हम भरोसा है, कि हम ऐसा कर पाएंगे'.

कोशिकाओं को इंफेक्शन से बचाना होता है मुश्किल
सीसीएमबी के वैज्ञानिक अब तक इंसान और चूहों की कोशिकाओं पर तमाम परीक्षण किया करते थे. लेकिन क्लीन मीट बनाने के लिए पहली बार बकरी के स्टेम सेल पर काम करना शुरू किया है. इसके लिए
हैदराबाद में ही मौजूद नेशनल मीट रिसर्ट इंस्टीट्यूट ने बकरी के स्टेम सेल मुहैया कराए हैं. संस्थान के सामने तीन और चुनौतियां हैं. सीसीएमबी के वैज्ञानिक बताते हैं कि लैब में कोशिकाएं विभाजित होते-होते कुछ अलग रूप लेना शुरू कर देती हैं. कोशिकाओं को यह अहसास कराना जरूरी होता है कि वो शरीर के अंदर ही हैं. इसके लिए उस तरह का माहौल बनाए रखना जरूरी है. कोशिकाओं को इंफेक्शन से बचाना भी एक मुश्किल लेकिन जरूरी काम है.
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असली मांस जैसा स्वाद लाना भी है चुनौती
अहिंसा मीट तैयार करने में एक और चुनौती उसके स्वाद को लेकर है. वैज्ञानिक मानते हैं कि यह जरूरी नहीं कि लैब में तैयार मीट का स्वाद पूरी तरह से जानवरों को मारकर निकाले गए मीट जैसा ही हो. लेकिन जीनोमैट्रिक तकनीक से स्वाद को बदला जा सकता है. अहिंसा मीट प्रोजेक्ट में जुटे वैज्ञानिक मानते हैं कि खाने वालों को जब क्लीन मीट की आदत हो जाएगी, तो वही उन्हें अच्छा लगने लगेगा. सीसीएमबी में काम करने वाली सोमदत्ता मांसाहारी हैं. सोमदत्ता के मुताबिक 'लैब में तैयार मीट से सूप या कीमा बनाना संभव होगा. क्लीन मीट के बीच में हड्डी नहीं होगी. इसलिए ऐसे व्यंजन नहीं बन पाएंगे, जिन्हें हड्डी के साथ पकाया जाता है. हड्डी के साथ अहिंसा मीट बनाने में थोड़ा और वक्त लग सकता है'.

सामान्य मीट से ज्यादा सेहतमंद होगा
अहिंसा मीट सेहत के लिए बेहतर विकल्प माना जा रहा है. सामान्य मीट में विटामिन बी-12 की कमी होती है. लेकिन लैब में तैयार होने वाला मीट में ऐसे बदलाव किए जा सकते हैं कि वो सभी जरूरी पोषक तत्वों से युक्त होगा. ऐसा मीट पूरी तरह हाइजीनिक होगा. सीसीएमबी के डायरेक्टर राकेश कुमार मिश्रा ने बताया कि अहिंसा मीट सेहत के लिए अच्छा रहेगा, क्योंकि उसका उत्पादन करते वक्त इस बात की जानकारी होगी कि वो कैसे तैयार हो रहा है. सेल इंजीनियरिंग के जरिए मीट में पोषक तत्व बढ़ाए जा सकेंगे.

वैज्ञानिक मानते हैं कि शाकाहारी लोगों का भी होगा इस मांस की ओर रुझान
खाद्य सुरक्षा की दिशा में अहिंसा मीट को एक मील के पत्थर के तौर पर देखा जा रहा है. मीट उत्पादन में लगे उद्योगों ने इसमें रुचि जाहिर की है. अहिंसा मीट का बड़े पैमाने पर उत्पादन करना भी एक बड़ी चुनौती होगी. वैज्ञानिकों को जाहिर तौर पर ऐसी तकनीक भी विकसित करनी होगी, ताकि इसका ज्यादा उत्पादन किया जा सके. इस प्रोजेक्ट में जुड़े साइंटिस्ट मानते हैं कि शाकाहारी लोग भी अहिंसा मीट को एक विकल्प के तौर पर अपना सकते हैं, क्योंकि इसके उत्पादन में किसी जानवर की जान नहीं जाती.

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First published: July 16, 2019, 10:36 PM IST
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