दिवालिया कानून में संशोधन से लोन निपटान प्रक्रिया में आएगी ट्रांसपेरेंसी- वित्त मंत्री

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि आईबीसी 2016 से पहले किसी ऋण शोधन अक्षमता मामले में लगने वाला औसत समय करीब 4.3 वर्ष था और इसमें लागत भी अधिक होती थी.

News18Hindi
Updated: July 29, 2019, 8:14 PM IST
दिवालिया कानून में संशोधन से लोन निपटान प्रक्रिया में आएगी ट्रांसपेरेंसी- वित्त मंत्री
दिवालिया कानून में संशोधन से व्यापक स्पष्टता सुनिश्चित होगी- वित्त मंत्री
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Updated: July 29, 2019, 8:14 PM IST
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को राज्यसभा में कहा कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता में प्रस्तावित संशोधन का मकसद ऋण निपटान प्रक्रिया में अधिक स्पष्टता लाना है. उन्होंने कहा कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2019 (Insolvency and Bankruptcy Code Amendment Bill 2019 ) इस उद्देश्य से लाया गया है कि इसमें अधिक स्पष्टता लाई जा सके, ताकि कानून का जो वास्तविक मकसद मौजूद है, उसके खिलाफ कानून की व्याख्या नहीं की जा सके. जबकि मंत्री ने कहा कि आठ संशोधनों में से चार विवरणात्मक प्रकृति के हैं.

सीतारमण ने विधेयक को लेकर कही ये बात
सदन में विधेयक को पेश करते हुए सीतारमण ने कहा कि आशंका जताई जा रही है कि जिस मूल मकसद से संसद में यह संहिता लायी गयी थी उसे कमजोर किया जा रहा है. हम इसको विलुप्‍त नहीं होने दे सकते, लेकिन हमें इसमें स्पष्टता लानी होगी.

उन्होंने कहा कि जब तक 2016 में मूल संहिता (आईबीसी) देश में नहीं लायी गयी थी, देश में ऋण शोधन अक्षमता ढांचा अच्छी स्थिति में नहीं था तथा विधेयक का जो मकसद था उसके पर्याप्त नतीजे नहीं मिल रहे थे.

इसके साथ ही निर्मला सीतारमण ने कहा कि आईबीसी 2016 से पहले किसी ऋण शोधन अक्षमता मामले में लगने वाला औसत समय करीब 4.3 वर्ष था और इसमें लागत भी अधिक होती थी.

वित्त मंत्री ने कहा कि इस संहिता के आने के ढाई वर्षों के बाद हमने महसूस किया कि कुछ मामलों में स्पष्टता के अभाव में अदालतों और एनसीएलटी द्वारा दी गई व्याख्या से कई महत्वपूर्ण सवाल पैदा हुए हैं . जबकि स्पष्टता के अभाव में आईबीसी का विधायी मकसद खुद ही कमजोर हो रहा है.

इस कारण हुआ है संशोधन
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निर्मला सीतारमण कहा कि इस संहिता की निगरानी एक केन्द्रीय सरकारी नियंत्रण समिति द्वारा की जा रही है और जो संशोधन किये जा रहे हैं, वे अंशधारकों से उपयुक्त परामर्श के बाद बनाये गये हैं. सच कहा जाए तो अंशधारकों के हितों के बीच संतुलन कायम करना एक मुद्दा बनता जा रहा है और इसी कारण से इन संशोधनों को लाया गया है.

कांग्रेस नेता कपिल सिब्‍बल ने कही ये बात
चर्चा में भाग लेते हुए कांग्रेस के कपिल सिब्बल ने कहा कि कुछ संशोधनों की दिशा सही है और सराहनीय है. हालांकि इसमें मौजूद कुछ खामियों की ओर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने इस विधेयक को प्रवर समिति में भेजने का आग्रह किया.

उन्होंने कहा,'देश की अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुजर रही है जहां आटोमोबाइल, इस्पात, रीयल इस्टेट और तत्काल खपत उपभोक्ता माल (एफएमसीजी) से जुड़ी कंपनियां मुश्किलों से जूझ रही हैं. जबकि चिंता इस बात की है कि सरकार जिस तरह से समस्या का समाधान कर रही है, उससे देश में बेरोजगारी और बढ़ेगी.'

उन्होंने आगे कहा कि इस परिस्थिति का लाभ देश में चार पांच बड़े निगमित घरानों को ही मिल रहा है जो बेहद कम कीमत पर ऐसी संकटग्रस्त कंपनियों को कब्जे में ले रही हैं.

भाजपा नेता ये बोले
चर्चा में भाग लेते हुए भाजपा के भूपेन्द्र यादव ने कहा कि यह देखना चिंता की बात है कि निगमित कंपनियों का ऋण पांच वर्षों में इतना बढ़ा जो वर्ष 2009 में महज 12 लाख करोड़ रुपये ही था. क्यों लेखा खातों का समायोजन नहीं किया गया और गैर निष्पादक आस्तियों (एनपीए) को बढ़ने दिया गया.
उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार देश की अर्थव्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए कृतसंकल्प है. इसी कारण से सरकार ने काला धन पर रोक लगाने के उपाय लेकर सामने आई तथा आर्थिक अपराध करने वालों पर रोक लगाने तथा घर खरीदने वालों के लिए राहत देने वाले कानून लायी.

भूपेन्द्र यादव ने देश में पूंजी लगाने वालों को ‘व्यवसाय करने की आसानी’ का माहौल देने के लिए ऐसे मामलों के त्वरित निपटान करने की खातिर अधिक न्यायधीशों और प्रशिक्षित पेशेवरों को तैनात किये जाने की भी सलाह दी.

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First published: July 29, 2019, 7:52 PM IST
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