ICAI की सलाह, बैंक कर्जों को मंजूरी देने के लिये होनी चाहिये एक केन्द्रीय एजेंसी

ICAI की सलाह, बैंक कर्जों को मंजूरी देने के लिये होनी चाहिये एक केन्द्रीय एजेंसी
प्रतीकात्मक फोटो

गुप्ता का कहना है कि कई बार कंपनियों का कारोबार उनकी गुणवत्ता और मात्रात्मकता के मुताबिक नहीं बढ़ रहा होता है ब​ल्कि बाजार में उत्पाद के दाम बढ़ जाने की वजह से उनका कारोबार बढ़ जाता है

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बैंकों के फंसे कर्ज की गहराती समस्या के बीच लागत लेखाकारों की शीर्ष संस्था ‘इंस्टीट्यूट ऑफ कास्ट एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (आईसीएआई)’ ने बैंकों से दिये जाने वाले बड़े कर्ज प्रस्तावों की जांच-परख के लिये एक केन्द्रीय एजेंसी बनाने का सुझाव दिया है.

इसका कहना है कि इस एजेंसी में लागत लेखाकारों के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाना चाहिये ताकि कर्ज फंसने के मामलों में कमी लाई जा सके.

‘इंस्टीटयूट ऑफ कास्ट एकाउंटेंटस ऑफ इंडिया’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय गुप्ता ने कहा कि बैंकों से जो भी बड़े कर्ज दिये जाते हैं उन सभी की जांच परख करने के लिये वित्त मंत्रालय द्वारा एक केन्द्रीय एजेंसी का गठन किया जाना चाहिये. ऐसे प्रस्तावों का लागत मूल्यांकन करने के साथ साथ परियोजना की दक्षता, वहनीयता को लेकर भी ऑडिट यानी उनकी लेखा परीक्षा होनी चाहिये.



उल्लेखनीय है कि इन दिनों सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक बैंक फंसे कर्ज यानी एनपीए की समस्या का सामना कर रहे हैं. यह समस्या विशेषतौर से इस्पात, बिजली, दूरसंचार तथा कुछ अन्य क्षेत्रों में ज्यादा है. कड़ी प्रतिस्पर्धा से बाजार मूल्य घटने अथवा मांग कमजोर पड़ने से इन क्षेत्रों की कंपनियां वित्तीय संकट में फंस गई.



गुप्ता का कहना है कि आमतौर पर हजारों करोड़ रुपये के बड़े कर्ज बैंकों के समूह देते हैं. बड़े बैंकों के पास शोध, विकास के बेहतर साधन होते हैं वह कर्ज प्रस्ताव का बेहतर आकलन कर सकते हैं लेकिन कई छोटे बैंक है जिनके पास कर्ज प्रस्तावों का मूल्यांकन और लेखा ऑडिट करने की अच्छी सुविधायें नहीं हैं, ऐसे में कर्ज प्रस्तावों पर विचार करने वाली केन्द्रीय एजेंसी बेहतर भूमिका निभा सकती है.

गुप्ता ने कहा कि आमतौर पर कंपनियां और उनके प्रवर्तक अपने उत्पाद की लागत को लेकर गोपनीयता का हवाला देते हैं. उन्होंने कहा, ‘किसी भी परियोजना में जब पूरा पैसा बैंकों का लगता है जो कि जनता का पैसा है तो फिर कंपनियों की तरफ से मूल्यांकन को लेकर गोपनीयता क्यों बरती जानी चाहिये. इसमें हर मामले में पूरी पारदर्शिता होनी चाहिये.’

उन्होंने कहा कि किसी भी परियोजना, उद्वम की सफलता में बेहतर मूल्यांकन की बड़ी भूमिका होती है. भारतीय लागत लेखाकार संस्थान इन्ही मुद्दों पर जोर देता है और उसका गुणवत्ता और दक्षता पर ज्यादा ध्यान रहता है. दूसरी तरफ वित्तीय लेखाकार केवल वित्तीय आंकड़ों पर ही ज्यादा ध्यान देते हैं.

गुप्ता का कहना है कि कई बार कंपनियों का कारोबार उनकी गुणवत्ता और मात्रात्मकता के मुताबिक नहीं बढ़ रहा होता है ब​ल्कि बाजार में उत्पाद के दाम बढ़ जाने की वजह से उनका कारोबार बढ़ जाता है. इस मामले में उन्होंने पेट्रोलियम कंपनियों का उदाहरण दिया. विश्व बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने से तेल और गैस उत्पादन करने वाली कंपनियों का कारोबार बढ़ जाता है, इसमें कंपनी की तरफ से अपना कोई प्रयास नहीं होता है. कई बार तो कंपनी को वास्तव में नुकसान हो रहा होता है. ऐसे में उसके उत्पाद की लागत लेखापरीक्षा होने पर स्थिति का पता चल जाता है.

देश में लागत लेखाकार पेशेवरों के कौशल विकास व नियमन के लिए संसद में पारित कानून से इस संस्था की स्थापना की गई. पहले इसका नाम इंस्टीट्यूट आफ कास्ट एंड वर्क्स एकाउंटेंट्स आफ इंडिया (आईसीडब्ल्यूएआई) था.

 
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