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ICSE सिलेबस से हटाई गई हिंदी के मशहूर लेखक की कहानी, ये थी वजह

भाषा
Updated: November 5, 2019, 10:44 PM IST
ICSE सिलेबस से हटाई गई हिंदी के मशहूर लेखक की कहानी, ये थी वजह
'जामुन का पेड़' कहानी ICSE की 10वीं कक्षा के हिंदी के पाठ्यक्रम से हटा ली गई है

हिंदी-उर्दू के मशहूर कहानीकार कृष्ण चंदर की लघु कथा ‘‘जामुन का पेड़’’ ICSE की 10वीं कक्षा के हिंदी के पाठ्यक्रम से हटा ली गई है. कृष्ण चंदर ने अंग्रेजी में भी कहानियां लिखीं. उन्होंने बॉलीवुड की फिल्में -- ‘धरती के लाल’, ‘ममता’ और ‘शराफत’ की पटकथा भी लिखी थी.

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नई दिल्ली. बोर्ड की परीक्षाओं से महज तीन महीने पहले हिंदी-उर्दू के मशहूर कहानीकार कृष्ण चंदर की लघु कथा ‘‘जामुन का पेड़’’ ICSE की 10वीं कक्षा के हिंदी के पाठ्यक्रम से हटा ली गई है. यह कहानी सरकारी महकमे की कार्यशैली और लालफीताशाही पर एक करारा व्यंग्य है. हालांकि, इस कदम के लिये ‘काउंसिल ऑफ इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्ज़ामिनेशंस’ ने कोई कारण नहीं बताया है. वहीं, उसके इस कदम पर प्रख्यात कवियों ने सवाल उठाये हैं.

ICSE के एक आधिकारिक आदेश में कहा गया है, ‘‘2020 और 2021 की परीक्षाओं में निर्धारित पाठ्यक्रम (10 वीं कक्षा) कृष्ण चंदर की कहानी ‘जामुन का पेड़’ की परीक्षा नहीं ली जाएगी. संबद्ध शिक्षकों और अभ्यर्थियों को इस बारे में सूचना दी जाए.’’

1960 में लिखी गई थी कहानी
काउंसिल के सचिव एवं मुख्य अधिकारी गेरी अराथून ने इस कदम के पीछे मौजूद कारणों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. यह भी स्पष्ट नहीं है कि क्या यह फैसला सिर्फ 2020 और 2021 अकादमिक सत्र के लिये लिया गया है. यह कहानी 1960 के दशक में लिखी गई थी. यह एक हास्य व्यंग रचना है जिसमें लेखक ने सरकारी महकमे,उसकी कार्यशैली और लालफीताशाही पर करारा व्यंग किया है.

इस लघु कथा के जरिये कहानीकार ने अंधड़ के बाद सचिवालय में एक जामुन का पेड़ गिर जाने और उसके नीचे दबे व्यक्ति को निकालने के लिए की गई कार्रवाई तथा चपरासी से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) तक की कार्यशैली पर व्यंग्य किया गया है.

अंग्रेजी में भी लिखी हैं कहानियां
हिंदी और उर्दू में लिखने के अलावा कृष्ण चंदर ने अंग्रेजी में भी कहानियां लिखी. उन्होंने बॉलीवुड की फिल्में -- ‘धरती के लाल’, ‘ममता’ और ‘शराफत’ की पटकथा भी लिखी थी. हिंदी के प्रख्यात कवि अशोक चक्रधर ने ICSE के इस कदम पर कहा कि छात्र व्यंग्य को समझने के लिये पर्याप्त रूप से परिपक्व हैं.
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उन्होंने पीटीआई भाषा से कहा, ‘‘मुझे लगता है कि 10 वीं के छात्र व्यंग्य को समझने के लिये और उचित-अनुचित पर फैसला करने के लिये पर्याप्त रूप से परिपक्व हैं. यदि नीति बनाने वालों को लगता है कि देश में लालफीताशाही खत्म हो गई है तो उन्हें पाठ्यपुस्तकों से निश्चित ही ‘जामुन का पेड़’ हटा देना चाहिए क्योंकि कहानी के उद्देश्य को हासिल कर लिया गया है.’’ उनके विचारों से सहमति जताते हुए भोपाल के कवि राजेश जोशी ने कहा, ‘‘ऐसा नहीं है कि 10 वीं कक्षा के छात्र यह नहीं समझते कि भ्रष्टाचार क्या है.... यह स्थिति (कहानी हटाने की) घर से आईना हटाने जैसा है.... ’’

किशोरों के लिए अनुपयुक्त नहीं कहानी की भाषा
लेखक एवं व्यंग्कार संपत सरल ने कहा कि वह इस कहानी की भाषा या विषयवस्तु के किशोरों के लिये अनुपयुक्त रहने का कोई कारण नहीं देखते हैं. जयपुर के लेखक ने कहा, ‘‘यह कहानी उन 10 शीर्ष व्यंग्यों में है जो मैंने पढ़ी हैं. ’’

उत्तर प्रदेश में हिंदी के एक शिक्षक ने कहा, ‘‘जामुन का पेड़ ने उनके करियर के दो दशकों में कभी अपनी प्रासंगिकता नहीं खोई और उनके छात्र इस फैसले से निराश हैं.’’ उन्होंने कहा, ‘‘ये बच्चे कल के नौकरशाह हैं और कहानी उन्हें हकीकत से रूबरू कराती है.’’

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First published: November 5, 2019, 10:44 PM IST
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