भारत को अगर कोरोना पर काबू पाना है तो शीर्ष चिकित्सा विशेषज्ञ की बात सुनें

तेजी से बढ़ रहे हैं कोरोना के मामले. (File pic)

तेजी से बढ़ रहे हैं कोरोना के मामले. (File pic)

डॉ. फाउची ने सीएनएन न्यूज़ 18 के ज़का जैकब से भारत में कोरोना वायरस की दूसरी लहर के प्रकोप पर बात की और सुझाव दिए कि किस तरह बेहद सीमित चिकित्सीय संसाधनों को फिर से खड़ा किया जाए और देश को इस जानलेवा लहर से बाहर निकाला जा सके.

  • Share this:

भारत में मौजूदा हालात को बेहद गंभीर और खतरनाक बताने वाले अमेरिका के शीर्ष चिकित्सा विशेषज्ञ और कोरोना वायरस की स्थिति पर विशेष पकड़ रखने वाले डॉ. एंथनी फाउची का कहना है कि इस वक्त भारत सरकार को सैन्य बल समेत तमाम संसाधनों को एकजुट कर अस्थायी अस्पताल बनाने चाहिए और अन्य देशों को न सिर्फ सामग्री के स्तर पर बल्कि श्रमबल के स्तर पर भी मदद के लिए आगे आना चाहिए.

डॉ. फाउची ने सीएनएन न्यूज़ 18 के ज़का जैकब से भारत में कोरोना वायरस की दूसरी लहर के प्रकोप पर बात की और सुझाव दिए कि किस तरह बेहद सीमित चिकित्सीय संसाधनों को फिर से खड़ा किया जाए और देश को इस जानलेवा लहर से बाहर निकाला जा सके. प्रस्तुत है इस साक्षात्कार के कुछ अंश –

  • ज़का – इस वक्त भारत कोविड 19 की दूसरी लहर से जूझ रहा है और आपने यकीनन इस पर नज़र बनाए रखी होगी. आपको क्या लगता है, क्या इस दूसरी लहर में कोई एक ऐसी बात है जो आपको अलग लग रही है?


    डॉ. फाउची – इस लहर को आप अमेरिका की उस लहर के बराबर ही मान सकते हैं जो पिछले साल हमने देखी थी. सर्दियां शुरू होने से पहले हमारे यहां दिन में तीन लाख केस आ रहे थे और हर दिन 3000 से 4000 मौतें हो रही थीं. तो जैसे कि भारतीय मीडिया के कई सदस्य मुझसे पूछ चुके हैं कि मेरे हिसाब से क्या किया जाना चाहिए. तो यह तो साफ है कि देश के कई हिस्सों को बंद करना होगा, खासतौर पर सबसे ज्यादा प्रभावित हिस्सों को, लेकिन छह महीने के लिए नहीं.
    जरूरत है कि संक्रमण की चेन को तोड़ा जाए और यह मुमकिन है बस अगर तीन या चार हफ्तों के लिए सब कुछ बंद रखा जाए, जैसे ही मामले कम होने लगे और लोगों का टीकाकरण होने लगे, उसके बाद आप आगे का कदम उठा सकते हैं, क्योंकि ज्यादा से ज्यादा लोगों का टीकाकरण जरूरी है. इसके अलावा स्वास्थ्य सेवा पर भी काम करना होगा.

    मैं जितना टीवी या प्रेस के जरिए देख पा रहा हूं, अस्पतालों में बेड की बहुत कमी है. अमेरिका ऑक्सीजन सिलेंडर, ऑक्सीजन  कंसंट्रेटर्स और पीपीई किट की मदद कर रहा है. जब अन्य देश मुसीबत में थे, तब भारत ने भी मदद की थी. इसलिए भारत के साथ खड़ा होना जरूरी है. हमें याद करना होगा कि पिछले साल जब चीन में मामले बढ़े थे, तब सेना की मदद से कई अस्पताल बनाए गए थे. अमेरिका में भी नेशनल गार्ड ने बहुत मदद की थी, मसलन वैक्सीन वितरण में. तो अगर आप भारतीय सेना को फील्ड अस्पताल बनाने के काम में शामिल कर सकें, जैसे आप किसी सैन्य संकट के दौरान करते हैं, तो यकीनन अस्पतालों में बेड की कमी के संकट से निपटा जा सकता है.


  • ज़का – भारत में जब पिछली बार संपूर्ण लॉकडाउन लगा था तो उसके आर्थिक अंजाम से हम अब तक जूझ रहे हैं.


    डॉ. फाउची - पिछले 16 महीनों में पूरी दुनिया ने जो देखा और पाया है, वो यह कि अगर आप इस प्रकोप को काबू में नहीं कर पाए तो अर्थव्यवस्था को ज्यादा नुकसान पहुंचेगा. तो जब आप अर्थव्यवस्था और बीमारी के प्रकोप के बीच झूल रहे हो तो सबसे पहले तो इस उभार को रोकें. जब कुछ हफ्ते के लिए सब कुछ बंद रहेगा, उसके बाद अर्थव्यवस्था पटरी पर आएगी. अमेरिका में देखिए, वहां भी अर्थव्यवस्था पटरी पर आ रही है. तो हम लंबे वक्त के लिए सब कुछ बंद करने की बात नहीं कर रहे हैं. बस उतने वक्त के लिए कि संक्रमण की चेन को तोड़ा जा सके और यह अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक नहीं, फायदेमंद ही होगा.


  • ज़का - इस बार दो बातें अलग हैं – कई युवाओं पर असर पड़ता दिख रहा है और कई लोगों को सांस लेने की दिक्कत हो रही है. ऐसा पहली लहर में नहीं दिखाई दिया था.


    डॉ. फाउची – ऐसा लग रहा है कि भारत में इस वक्त कम से कम दो वैरियेंट काम कर रहे हैं. एक है यूके वैरियेंट बी117 जो दिल्ली में पाया जा रहा है और एक है 617 जो महाराष्ट्र में दिख रहा है. पिछले साल के वुहान स्ट्रेन की तुलना में इन दोनों में ही संक्रमण फैलाने की क्षमता ज्यादा है. इस वजह से इसकी चपेट में बच्चे, बूढ़े, युवा सब आ रहे हैं. यह सोचने वाली बात है कि लोगों को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ रही है और आंकड़े बताते हैं कि यह वायरस, असल वायरस से कहीं ज्यादा खतरनाक है. जिसकी वजह से लोग बीमार पड़ रहे हैं. ऑक्सीजन की जरूरत भी बताती है कि किस तरह यह वायरस रोगजनक है.


  • ज़का – टीकाकरण की प्रक्रिया को तेज़ करने के लिए भारत को क्या करना होगा और अगर आप अमेरिका के कुछ उदाहरण के जरिए समझा पाएं जहां आपने 20 करोड़ लोगों का टीकाकरण किया है.


    डॉ. फाउची – वैक्सीनेशन कार्यक्रम के दो हिस्से हैं और अभी भारत की स्थिति ऐसी नहीं है कि वह दोनों को एक साथ चला सके. पहला तो यह है कि तेजी से वैक्सीन की आपूर्ति होती रहे जैसे हमने कई कंपनियों के साथ अनुबंध किए थे, खासकर दो कंपनियां MRNA और जे एंड जे.  हमने 60 करोड़ डोज़ के लिए अनुबंध किया और हर महीने वैक्सीन की आपूर्ति निर्बाध हो रही थी. दूसरी बात जब जो बाइडेन राष्ट्रपति बने तब उन्होंने लोगों तक टीका पहुंचाने का एक प्रभावशाली तरीका शुरू किया. हमने कम्युनिटी वैक्सीन केंद्र बनाए, राज्य स्तर पर योग्य स्वास्थ्य केंद्र, मोबाइल यूनिट, फार्मेसी तैयार की. रिटायर हो चुके डॉक्टर और नर्स भी इस काम में आगे आए. नेशनल गार्ड ने हमारी मदद की. तो सकारात्मक तौर पर हमने बहुत आक्रामक ढंग से लोगों का टीकाकरण किया. लेकिन इसके लिए निर्बाध आपूर्ति की जरूरत है. भारत को भी यही करना होगा. क्योंकि याद रखिए कि इससे पहले भारत वैक्सीन बनाने वाला सबसे बड़ा देश था. तो अब आपको अपने संसाधनों के जरिए वैक्सीन बनानी होगी. आपूर्ति की कमी है लेकिन अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए ज्यादा से ज्यादा आपूर्ति को सुनिश्चित करें और अन्य देशों से भी लेने का प्रयास करें.


  • ज़का – अमेरिका ने वैक्सीन बनाने वाली फार्मा कंपनियों के लिए पेटेंट अधिकार को खत्म करने का फैसला लिया है. आपकी क्या राय है. क्या ये भारत जैसे विकासशील देशों के लिए मददगार साबित होगा?


    डॉ. फाउची – हां होगा, लेकिन इससे वर्तमान हालात काबू में नहीं पा सकते क्योंकि अगर कंपनियों को बिना पेटेंट पाबंदियों के, mRna वैक्सीन की तैयार करने की तकनीक को बनाने के लिए अनुमति मिल भी जाती है, जैसे कि दिल्ली या मुंबई में तब भी इन सबमें वक्त तो लगेगा ही. तो यह फैसला लंबे वक्त के लिए तो सही है, लेकिन भारत की मौजूदा समस्या इससे दूर नहीं होगी. अभी तो बस लोगों को टीका लगाइए. साल भर बाद तकनीक स्थानांतरण के जरिए निर्माण क्षमता की जरूरत होगी लेकिन इसमें काफी वक्त लगने वाला है.


  • ज़का – क्या आप या सीडीसी या किसी और संस्था को नए वैरियेंट्स को करीब से समझने का मौका मिला?


    डॉ. फाउची – देखिए कुछ हफ्तों में हम इस पर बात कर पाएंगे कि वर्तमान में इस्तेमाल की जाने वाली वैक्सीन की क्षमता क्या है और वो 617 वैरियेंट से हमारी किस हद तक सुरक्षा कर सकती है.


  • ज़का – तो आप कह रहे हैं कि मौजूदा लहर में, वैक्सीन से ज्यादा फील्ड अस्पताल, बिस्तरों की क्षमता, ऑक्सीजन मुहैया करवाना ज्यादा जरूरी है. अगर भारत सरकार, आपसे सलाह मांगे तो आप क्या सुझाव देंगे?


     डॉ. फाउची – आपको इसे तीन स्तर पर देखना होगा – त्वरित, मध्यवर्ती और लंबे वक्त के लिए. अभी लोग मर रहे हैं, उन्हें अस्पताल में भर्ती करना होगा. उनकी जान बचाने के लिए ऑक्सीजन, दवाई, पीपीई चाहिए. जैसे कि हम मीडिया पर देख रहे हैं, लोगों को रिक्शा में ऑक्सीजन दी जा रही है, लेकिन उनके लिए बेड चाहिए. फिर मध्यवर्ती स्तर पर ज्यादा से ज्यादा लोगों का टीकाकरण हो ताकि तीन हफ्ते, या महीने बाद लोगों को बीमार होने से रोका जा सके. फिर लंबे वक्त के हिसाब से आपको वैक्सीन की सही तकनीक हासिल करनी होगी ताकि अगले छह महीने या एक साल के भीतर नई लहर को रोका जा सके. तो तीन चरण हैं- आज, कुछ हफ्तों से एक महीने तक और फिर एक साल.


  • ज़का – क्या तीसरी और चौथी लहर का खतरा भी है क्योंकि ऐसा लगता है कि हर लहर के साथ बीमारी की तीव्रता बढ़ती जाएगी, वह तेजी से फैलेगी और ज्यादा नुकसान पहुंचाएगी.


    डॉ. फाउची – हमने यह पाया कि अगर टीका अच्छा है, जैसे कि हमारे पास है तो ज्यादा असरदार एंटीबॉडी तैयार होती हैं, जो सिर्फ मूल वायरस से ही नहीं, बल्कि इसके वैरियेंट्स से होने वाली बीमारी से भी लोगों को 100 फीसदी तो नहीं, लेकिन काफी हद तक बचाता है. तो भारत में अगर 100 करोड़ से ज्यादा की आबादी के बड़े हिस्से का टीकाकरण हो जाए तो नए वैरियेंट के आने पर भी यह टीकाकरण इसके असर को कम करने में मददगार होगा. यह आएगा तो सही लेकिन अगर सबका टीकाकरण हो गया है तो यह आपको गंभीर बीमारी से बचाएगा. वैक्सीन, वैरियेंट पर विशेष तौर पर वार नहीं करेगा लेकिन उसके खिलाफ कुछ हद तक जरूर काम करेगा.


  • ज़का – रेमडेसिविर और डेक्सामेथासोन जैसे स्टेरॉइड्स पर काफी जोर दिया जा रहा है. इसे लेकर कोई तय प्रिस्क्रिप्शन तो नहीं है लेकिन आपको क्या लगता है, इन दवाइयों को कब लेना चाहिए?


    डॉ. फाउची – फिलहाल कुछ विशेष दवाइयां हैं जो वायरस के शुरुआत में दी जाती हैं, ताकि लोगों में लक्षण आते ही उन्हें अस्पताल न दौड़ना पड़े. लेकिन जब अस्पताल जाना पड़े तो वहां वेंटिलेशन और ऑक्सीजन के ज्यादा फ्लो की जरूरत पड़ती है, क्योंकि तब हालात अलग ही हो जाते हैं क्योंकि हमें शरीर की जलन और बिगड़ी प्रतिरोधक प्रतिक्रिया को संभालना होगा. यहीं पर डेक्सामेथासोन काम आती है. और अगले पड़ाव में तो जलन कम करने वाली दालचीनी भी काम नहीं आएगी. तो इलाज के दो छोर हैं, एक तो वो जब आप किसी को अस्पताल जाने से रोक पाएं और दूसरा तब जब कोई अस्पताल पहुंच जाए और उसकी जलन को कम किया जा सके.


  •  ज़का – डॉ. फाउची, कोविड 19 जैसे मुश्किल दौर में आपने पूरे देश की अगुआई की थी. रोज़ की ब्रीफिंग में आपकी बातें भरोसा देती थीं. आपकी सबसे बड़ी सीख जो आप भारत के लोगों से बांटना चाहेंगे?


     डॉ. फाउची – आप दूसरे देशों की आपदाओं से सीख सकते हैं. अमेरिका ने एक मुश्किल दौर देखा और हम अब भी उससे बाहर नहीं निकले हैं, लेकिन ऐसे वक्त में आपको एकजुट होकर खड़ा होना होगा. कितने भी मतभेद क्यों न हो, लेकिन दुश्मन एक ही है – वायरस. तो सब कुछ किनारे करके एक ही बात पर लेज़र बीम की तरह फोकस करें. जब अमेरिका और भारत जैसे बड़े और विविधता से भरे देश हों तो मिलकर ही वायरस से लड़ना होगा, आपको अपने तमाम संसाधनों को एकत्रित करना होगा और वायरस से लड़ना होगा. यही मैंने सीखा है.

अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज