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भारत में 2015-18 के बीच पड़ा 150 साल का सबसे लंबा सूखा, 41 महीने रही संकट की स्थिति

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Updated: October 23, 2019, 5:48 PM IST
भारत में 2015-18 के बीच पड़ा 150 साल का सबसे लंबा सूखा, 41 महीने रही संकट की स्थिति
आईआईटी गांधीनगर में सिविल इंजीनियरिंग विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर विमल मिश्रा के जरनल ऑफ हाइड्रोलॉजी में प्रकाशित शोध में 18 मेट्रोलॉजिकल और 16 हाइड्रोलॉजिकल सूखों की पहचान की गई है.

आईआईटी गांधीनगर (IIT, Gandhinagar) में सिविल इंजीनियरिंग विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर विमल मिश्रा (Associate Professor Vimal Mishra) के जरनल ऑफ हाइड्रोलॉजी (Journal of Hydrology) में 14 अक्‍टूबर को प्रकाशित शोध (Research) में कहा गया है कि इतनी लंबी अवधि का सूखा (Long-term Drought) दुनिया के सबसे ज्‍यादा आबादी वाले क्षेत्रों में एक के लोगों के सामने पानी की उपलब्‍धता का संकट पैदा (Water Crisis) कर सकता है.

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अनिरुद्ध घोषाल

नई दिल्‍ली. उत्‍तर प्रदेश (UP) के झांसी (Jhansi) में दो भाइयों मूरत सिंह यादव और चरन सिंह यादव के बीच पैतृक संपत्ति (Ancestral Property) को लेकर विवाद चल रहा था. आखिर में विवाद खत्‍म करने के लिए दोनों भाइयों ने जमीन का बंटवारा (Partition) कर लिया. इसके बावजूद दोनों के बीच झगड़े की एक जड़ जस की तस बनी रही. दरअसल, चरन सिंह अपने भाई के हिस्‍से में आए खेत के कुएं के पानी का बिना कुछ दिए इस्‍तेमाल करना चाहता था. इस पर दोनों के बीच सहमति नहीं बनी. इसके बाद 26 दिसंबर, 2017 को मध्‍य प्रदेश (madhya Pradesh) के छतरपुर जिले की पुलिस को सूचना मिली कि एक जगह पर एक आदमी पड़ा है, जिसकी आंखों पर पट्टी और हाथों में रस्‍सी बंधी है. पुलिस के रेस्‍क्‍यू करने पर मूरत ने बताया कि उसके गुस्‍साए भई चरन सिंह, उसके बेटों और रिश्‍तेदारों ने उसे नशा देकर बेहोश कर दिया था. इसे बाद उसे अनजान जगह ले जाकर एक सप्‍ताह से ज्‍यादा प्रताडि़त (Torture) किया. हालत खराब होती देख मुझे यहां छोड़ गए.

41 महीने तक चले सबसे लंबे सूखे का जलस्रोतों पर पड़ा बुरा असर
मूरत सिंह-चरन सिंह का इलाका बुंदेलखंड (Bundelkhand) क्षेत्र में पड़ता है्. ये क्षेत्र मध्‍य प्रदेश और उत्‍तर प्रदेश से सटा हुआ है. ये पूरा क्षेत्र शुष्‍क इलाका (Arid Territory) है. इस इलाके में कई साल से सूखे (Drought) जैसे हालात हैं. यहां पानी के स्रोत (Water Resources) बीच सर्दी (Mid-Winters) में भी सूख जाते हैं. इस कारण बड़ी संख्‍या में लोग इस इलाके को छोड़कर दूसरी जगहों पर बस रहे हैं. इस महीने जारी हुई एक रिपोर्ट में भारत में 1870-2018 के बीच मौसम के साथ ही अन्‍य कारणों से पड़े सूखे की जानकारी दी गई है. इसके मुताबिक भारत में 2015 से 2018 के बीच 150 साल का सबसे लंबा सूखा पड़ा. ये सूखा 41 महीने का था, जिसमें बारिश नहीं हुई. हालांकि, ये घातक स्‍तर का सूखा नहीं था. फिर भी इसका तालाबों, कुओं समेत तमाम जलस्रोतों और भूजल पर बुरा असर पड़ा. रिपोर्ट में कहा गया है कि इतनी लंबी अवधि के सूखे से दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले क्षेत्रों में शुमार भारत लोगों के सामने जल संकट की स्थिति पैदा हो जाएगी.

शोध में मेट्रोलॉजिकल और हाइड्रोलॉजिकल सूखों की पहचान की गई
आईआईटी गांधीनगर में सिविल इंजीनियरिंग विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर विमल मिश्रा (Vimal Mishra) के जरनल ऑफ हाइड्रोलॉजी (Journal of Hydrology) में 14 अक्‍टूबर को प्रकाशित शोध 'Long-term (1870-2018) drought reconstruction in the context of surface water security in India' में 18 मेट्रोलॉजिकल (Meteorological) और 16 हाइड्रोलॉजिकल (Hydrological) सूखों की पहचान की गई है. रिपोर्ट के मुताबिक, पांच सबसे घातक मेट्रोलॉजिकल सूखे 1899, 1876, 2000, 1918 और 1965 में पड़े थे. वहीं, पांच बड़े हाइड्रोलॉजिकल सूखे 1899, 2000, 1876, 1965 और 1918 में पड़े थे. शोध के मुताबिक, सबसे घातक मेट्रोलॉजिकल और हाइड्रोलॉजिकल सूखा 1899 में पड़ा था. मेट्रोलॉजिकल या मौसम के कारण पड़े सूखे में किसी इलाके में बारिश नहीं (Dry Weather) पड़ती, जबकि हाइड्रोलॉजिकल सूखे में नदियों, बड़े तालाबों समेत पानी के अन्‍य स्रोत सूख जाते हैं. इसका असर सूखे के बाद भी कई महीनों तक दिखता है.

भारत की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है. इसलिए यहां सूखे का असर व्‍यापक होता है. वहीं, भारत में खेती मानसून पर निर्भर है.

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भारत की बड़ी आबादी खेती पर और खेती मानसून पर है निर्भर
भारत की बड़ी आबादी कृषि (Agriculture) पर निर्भर है. इसलिए यहां सूखे का असर व्‍यापक होता है. वहीं, भारत में खेती मानसून (Mansoon) पर निर्भर है. मानसून के दौरान देश की सालाना जरूरत के मुताबिक, 80 फीसदी उत्‍पादों की बुआई होती है. पर्यावरण परिवर्तन के कारण सूखे की आशंका कई गुना बढ़ गई है. इससे देश में रेगिस्‍तान के फैलने की आशंका भी बढ़ गई है. इसके अलावा भारत में उपलब्‍ध जमीन का एक तिहाई हिस्‍सा जंगलों को काटकर खराब कर दिया गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि इन सभी कारणों से देश की जीडीपी में 2.5 फीसदी सालाना की कमी हो गई. भारत में सूखा और समुद्र के ऊपरी तापमान में वृद्धि के बीच संबंध भी चिंता का विषय है. पर्यावरण परिवर्तन पर संयुक्‍त राष्‍ट्र की अंतर-सरकार समिति (United Nations Intergovernmental Panel) की पिछले महीने जारी हुई रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया भर के समुद्रों की सतह का तापमान खतरे की रफ्तार से बढ़ रहा है.

गर्म हवाओं में बृद्धि के साथ ही बढ़ रहा है समुद्र का जलस्‍तर
शोध के मुताबिक, समुद्री गर्म हवाओं में बढ़ोतरी के साथ ही समुद्र के जलस्‍तर में भी वृद्धि हो रही है. 1982 से सुमुद्र से आने वाली गर्म हवाओं की फ्रिक्‍वेंसी दोगुनी हो चुकी है. इनकी तीव्रता में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है. वहीं, वैश्विक समुद्री तापमान बढ़ने की दर 1993 से अब तक दोगुना हो चुकी है. हालांकि, 2015-2018 के बीच पड़े सूखा पिछले पड़े तमाम सूखों से कम घातक था, लेकिन यह भारत में पड़े सभी सूखों से सबसे ज्‍यादा समय 41 महीने तक रहा था. इससे तमाम जलस्रोतों समेत भूजल पर भी काफी बुरा असर पड़ा था. इससे पता चलता है कि ऐसे सूखे भारत के सामने जलसंकट की स्थिति पैदा कर सकते हैं.

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First published: October 23, 2019, 5:45 PM IST
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