जजों को डराने के लिए महाभियोग का हथियार: अरुण जेटली

कांग्रेस पार्टी और उसके मित्रों ने महाभियोग को राजनीतिक उपकरण के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. महाभियोग एक प्रक्रिया है जिसके तहत 'होल्डर ऑफ ऑफिस' को इसलिए हटाते हैं ताकि 'ऑफिस का सम्मान' सुरक्षित रहे.

अरुण जेटली | News18Hindi
Updated: April 20, 2018, 7:37 PM IST
जजों को डराने के लिए महाभियोग का हथियार: अरुण जेटली
अरुण जेटली की फाइल फोटो
अरुण जेटली
अरुण जेटली | News18Hindi
Updated: April 20, 2018, 7:37 PM IST
मैंने कल जस्टिस लोया की मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच की ओर से जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ का 114 पन्नों का फैसला पढ़ा. यह फैसला सार्वजनिक और राजनीतिक स्पेस पर फैलाए जा रहे झूठ और साजिश की बखिया उधेड़ता है. इससे पहले कभी भी कोई राजनीतिक दल, कुछ रिटायर्ड जज और वरिष्ठ अधिवक्ता झूठ के जाल में इतना नहीं फंसे. जो इतना गहरा है कि वे खुद साजिशकर्ता के रूप में सामने आ रहे हैं. तथ्यों और कुछ समूहों की भूमिका पर गहन विश्लेषण बेहद जरूरी है क्योंकि मुझे लगता है कि ऐसी कोशिशें भविष्य में भी होंगी.

सोहराबुद्दीन केस में अमित शाह की कथित भूमिका
सोहराबुद्दीन केस में अमित शाह की कोई भूमिका नहीं थी. यह कथित एनकाउंटर केंद्रीय एजेंसियों ने राज्य पुलिस की मदद से किया था. मैंने 27 सितंबर 2013 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह को इस बारे में तथ्यों की जानकारी देते हुए एक विस्तृत पत्र लिखा था.

अमित शाह को इस घटना से जोड़ने वाले जो प्राथमिक सबूत जुटाए गए थे, वे रमनभाई पटेल और दशरथ भाई पटेल ने उपलब्ध कराए थे. दोनों कुख्यात 'लैंड ग्रैबर्स' हैं, जिन्होंने अमित शाह के ख़िलाफ़ सुबूत दिए थे. उनका दावा था कि उनके खिलाफ PASA के तहत हिरासत में लेने का आदेश रद्द करवाने की गुजारिश लेकर वे अमित शाह से मिलने उनके ऑफिस गए थे. दोनों का दावा था कि शाह ने इसके लिए उनसे 75 लाख रुपये मांगे थे, जो खास तारीखों में अजय पटेल नाम के एक शख्स के जरिए किश्तों में दिए गए थे. इस मीटिंग में अमित शाह ने इसका जिक्र किया था कि सोहराबुद्दीन को मारना क्यों जरूरी है.

यह दावा इस वजह से झूठा था क्योंकि विजिटर रजिस्टर के मुताबिक दोनों अमित शाह से मिलने कभी गए ही नहीं थे. दूसरे, दोनों पटेलों के खिलाफ कभी भी PASA ऑर्डर जारी ही नहीं किए गए थे. तीसरे, 75 लाख रुपये की किश्तें देने की कुछ तारीखों पर अजय पटेल के पासपोर्ट के मुताबिक वह देश से ही बाहर थे. ऐसे कमजोर सबूतों के सामने कोई भी कोर्ट अमित शाह को बरी कर देता.

शाह को जमानत देते समय गुजरात हाईकोर्ट ने कहा था कि इस केस में मुकदमा चलाने लायक सुबूत ही नहीं थे. अमित शाह को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि उनके खिलाफ इन लचर आरोपों की सुनवाई कौन से जज कर रहे हैं. शाह को बरी कर दिया गया. कुछ लोगों ने उनको बरी करने के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील की, हालांकि उनकी चुनौती खारिज कर दी गई. जज लोया की मौत का मामला उठाने वाले ज्यादातर लोग सोहराबुद्दीन केस में अमित शाह के खिलाफ खड़े थे.


‘द कैरेवेन’ मैग्जीन की फेक न्यूज
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, नागपुर के रवि भवन में 1 दिसंबर 2014 की सुबह जज लोया की छाती में दर्द हुआ. उस वक्त दो जिला न्यायाधीश उनके साथ थे. उन्होंने अपने दो सहकर्मियों को फोन किया और इस तरह जिला न्यायाधीश स्तर के चार अधिकारियों ने कार में जज लोया को अस्पताल पहुंचाया. हॉस्पिटल में उनका ईसीजी हुआ. प्राथमिक उपचार हुआ और केस कार्डियोलॉजी में स्पेशलाइज्ड हॉस्पिटल को रेफर कर दिया गया. जब तक वह कार्डियोलॉजी हॉस्पिटल पहुंचते, उनकी हालत संभवत: बिगड़ चुकी थी और वह गुजर गए. उन्हें बचाने की कोशिश की गई पर असफल रही.

उनकी कार्डिएक समस्या के दौरान केवल चार जज, दो अस्पतालों के डॉक्टर और मेडिकल स्टॉफ की ही उन तक पहुंच थी. हाईकोर्ट के चार जज दूसरे हॉस्पिटल पहुंचे जहां पोस्टमॉर्टम की सिफारिश की गई. पोस्टमॉर्टम तीसरे अस्पताल में करवाया गया और पीएम रिपोर्ट में कहा गया कि जज लोया की मौत कार्डिएक अरेस्ट से हुई थी. इसके बाद उनका शव लेकर दो मजिस्ट्रेट उनके गृहनगर पहुंचे. जज लोया के परिजन (जिन्होंने इसे एक स्वाभाविक मौत के तौर पर स्वीकार कर लिया था) और इस मामले से जुड़े सभी पक्षों के बयानों के बाद सुप्रीम कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा कि जज लोया की मौत स्वाभाविक कारणों से हुई और इसके तहत कोई संदिग्ध परिस्थति नहीं मिली. ‘द कैरेवेन’ मैग्जीन की स्टोरीज़ और इन्वेस्टिगेशन फेक न्यूज का उदाहरण हैं. यह कोई गॉसिप या अफवाह बेचने का मामला नहीं बल्कि जानबूझकर फेक न्यूज पैदा करने का केस है, जहां बड़ा विवाद पैदा करने के लिए झूठ गढ़ा गया.

संस्थाएं नेस्तनाबूद करने वाले
भारत की ज्यादातर अदालतों में ऐसे कई वकील हैं, जो जनहित से जुड़े मामले उठाते हैं और उनके पीछे लगे रहते हैं. यह पूरी तरह से मंजूर भी है. मगर पिछले कुछ सालों में जनहित के नाम पर काम करने वाले 'इंस्टीट्यूशन डिसरप्टर्स' यानी संस्थाओं को नुकसान पहुंचाने वाले पैदा हो गए हैं. वे कई बार झूठ पर आधारित मामले उठाते हैं और पूरी लगन के साथ उन्हें दायर करते हैं, डराने-धमकाने वाली वकालत करते हैं, अपने विरोधी सहकर्मियों से उलझते हैं और जजों से कठोर और असभ्य रहते हैं. उन्हें यकीन होता है कि वे जो झूठ पेश कर रहे हैं वही सत्य के तौर पर मान लिया जाए. इस काम में उनके दो साथी हैं. एक तो मीडिया का वह धड़ा जो उन्हें पब्लिसिटी देता है. इसी तरह हमने कांग्रेस को मुख्यधारा की पार्टी से किनारे पर जाते देखा है. पार्टी अपने वकीलों या दूसरों के ज़रिए इन ‘इंस्टीट्यूशन डिसरप्टर्स’ के साथ खुद को जोड़ने को तैयार है और इस तरह अदालतों को डराना धमकाना अब वकालत का नया तरीका बन गया है. धड़ों में बंटी अदालत इन डराने-धमकाने वाली तरकीबों से जूझने में खुद को असहाय पाती है. फैसला इशारा करता है कि इस केस में भी ऐसी कोशिशें की गईं. संस्थाएं नेस्तनाबूद करने वाले अब इस केस में झूठ के प्रवक्ता बन गए हैं.

महाभियोग का हथियार
सुप्रीम कोर्ट के एक जज के खिलाफ महाभियोग तभी चलाया जाता है जब वह या तो 'अयोग्य' साबित हुआ हो या फिर उसका 'आचरण खऱाब साबित' हो चुका है. कांग्रेस पार्टी और उसके मित्रों ने महाभियोग को राजनीतिक उपकरण के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है.

महाभियोग एक प्रक्रिया है जिसके तहत 'होल्डर ऑफ ऑफिस' को इसलिए हटाते हैं ताकि 'ऑफिस का सम्मान' सुरक्षित रहे. हमारे संविधान के तहत महाभियोग का प्रावधान अंतर-संस्थागत जिम्मेदारी बनाए रखने के लिए किया गया था. संसद के दोनों सदनों को महाभियोग जैसी न्यायिक शक्ति दी गई है. ऐसे में किसी एक सदन का हर सदस्य इस न्यायिक शक्ति का इस्तेमाल करता है. प्रत्येक सदस्य को स्वयं में एक जज की तरह ही सोचना और कदम उठाना होता है. उसे खुद स्वतंत्र रूप से तथ्यों और सबूतों की समीक्षा करनी होती है. ये फैसले किसी पार्टी लाइन या फिर व्हिप से निर्देशित होकर नहीं लिए जा सकते.


महाभियोग का इस्तेमाल 'साबित हो चुके दुराचार' के मामले में होता है. इससे कम किसी केस में महाभियोग का इस्तेमाल खतरनाक है. राज्यसभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर एकत्र करना या फिर लोकसभा के 100 सदस्यों के हस्ताक्षर पाना कोई मुश्किल काम नहीं और यह किसी भी छोटे-मोटे मसले पर हासिल किए जा सकते हैं. लेकिन, जब मामला न तो 'साबित हो चुके दुराचार' का हो और न आपके पक्ष में आंकड़े हों, तब इसे डराने के लिए इस्तेमाल करना, न्यायिक स्वतंत्रता के लिए खतरनाक है. आज के महाभियोग केस पर मेरी प्रारंभिक प्रतिक्रिया साफ है. जस्टिस लोया की मौत के मामले में फैसले के बाद कांग्रेस की ओर से बदले की भावना से यह पिटीशन दायर की गई. यह एक जज को डराने का मामला है और बाकी जजों को संदेश देता है कि यदि आप हमसे सहमत नहीं तो बदले की कार्रवाई के लिए 50 सांसद काफी हैं. लगाए गए आरोप पहले ही सुलझाए जा चुके हैं. कुछ मसले घिसे-पिटे और बेकार हैं और उनका न्यायिक प्रक्रिया से कोई लेना-देना नहीं.

बंटी हुई अदालत
यदि ‘इंस्टीट्यूशनल डिसरप्टर्स’ की ऐसी खौफनाक हरकतें और महाभियोग न्यायिक स्वतंत्रता के लिए खतरा है, तो अदालत में विभाजन भी एक बड़ा खतरा है. अब जबकि जज लोया के केस में झूठी साजिश का पर्दाफाश हो चुका है तो मेरे दिमाग में कुछ विचार आ रहे हैं. विवादास्पद प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले सुप्रीम कोर्ट के चारों जज अनुभवी न्यायाधीश हैं और मेरी नजर में वे बेहद ईमानदार और कर्तव्यनिष्ट भी हैं. क्या उन्होंने इस पर टिप्पणी से पहले जज लोया केस से जुड़े सभी तथ्यों की जांच की थी, चाहे वह केवल लिस्टिंग से जुड़ा मामला था तो भी...? क्या किसी को भी पेंडिंग केस पर टिप्पणी करनी चाहिए क्योंकि कई टिप्पणियां मिलकर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला माहौल तैयार करती हैं और बेबुनियाद झूठ भी सच जैसा लगने लगता है, जैसा इस केस में हुआ. क्या आज दर्ज हुआ महाभियोग प्रस्ताव भी इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस का नतीजा था? क्या यह महाभियोग भारत में राजनीतिक दलों के लिए ऐसा उदाहरण बन रहा है, जिसके जरिए विवादास्पद मामलों की सुनवाई कर रहे जजों को डराया जा सके?

आज जो हुआ है, वह ऐसी कीमत है जो भारतीय न्यायपालिका को कई लोगों के मिस-एडवेंचर के चलते चुकानी पड़ी है. आज का समय न्याय के शासन और राजनीतिक दूरदर्शिता के लिए अच्छा नहीं है.

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First published: April 20, 2018, 7:22 PM IST
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