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OPINION: देश की माली हालत को लेकर सरकार की सतर्कता के मायने

सरकार सतर्क मुद्रा में है.

सरकार सतर्क मुद्रा में है.

देश की माली हालत (Economy) को लेकर पिछले एक महीने से जताई जा रही चिंता वाजिब ही थी. ये अलग बात है कि सरकार (Modi Government) की तरफ से जो कुछ किया गया वह आगे कितना कारगर होगा?

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नई दिल्ली. देश की माली हालत (Economy) की चर्चा हमेशा ही होती रहती है. लेकिन इस समय कुछ ज्यादा है. सरकार सतर्क मुद्रा में है. सरकार ( Modi Government) को सरकारी खजाने से पैसे निकालकर बाजार में डालने पड़ रहे हैं. टैक्स (Tax) कम किए जा रहे है. पिछले पखवाड़े ही सरकार कॉरपोरेट टैक्स को डेढ़ लाख करोड़ तक घटा चुकी है. बैंकों में सरकारी पूंजी डालना, रियल एस्टेट (Real Estate) और वाहन उद्योग को राहत देने की कवायद यूं ही नहीं करनी पड़ी.

एक वाजिब चिंता
मौजूदा माली हालात के बारे में अब तक एक विवाद हो रहा था. वह ये कि देश में आर्थिक मंदी (Financial Crisis) का आलम है या इसे सिर्फ आर्थिक सुस्ती कहा जाना चाहिए. अर्थशास्त्रीय ज्ञान विज्ञान के मुताबिक वर्तमान आर्थिक परिस्थिति को सुस्ती के दायरे में ही रखा जा रहा था. खासतौर पर सरकारी अर्थशास्त्री (Economist) इसे आर्थिक वृद्धि की रफ्तार का धीमा पड़ना ही बता रहे थे. लेकिन हाल ही में अगस्त 2019 के औद्योगिक उत्पादन का नया आंकड़ा आया है. इसके मुताबिक पिछलें साल अगस्त में जितना उत्पादन हुआ था उसके मुकाबले इस साल अगस्त में उत्पादन घट गया. यह साबित कर रहा है कि  देश की माली हालत को लेकर पिछले एक महीने से जताई जा रही सरकार की चिंता वाजिब ही थी. ये अलग बात है कि जो कुछ किया गया वह आगे कितना कारगर होगा?

सवाल विशेषज्ञों की सुस्ती का भी
आर्थिक क्षेत्र की खबरों के विश्लेषण का चलन कम होता जा रहा है. आर्थिक मामलों के जानकार या विशेषज्ञ भी आजकल ज्यादा माथापच्ची करते नहीं दिखते. लेकिन ऐसे माहौल में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Finance Minister Nirmala Sitharaman) की एक अपील गौरतलब है. उन्होने कहा है कि विशेषज्ञ और टैक्स पेशेवर जीएसटी के बेहतर अनुपालन के लिए समाधान सुझाएं. गौरतलब है कि जीएसटी के जरिए राजस्व उगाही का आंकड़ा भी घटान पर है. और उद्योग जगत जीएसटी को लेकर फिर भी असंतोष जता रहा है. सुस्ती के दौर में उद्योग जगत का असंतोष वाजिब ही है. वैसे यह कोई जटिल विषय नहीं है. क्योंकि जब उत्पादन घटान पर हो तो उससे कर संग्रह और बेरोजगारी पर तो असर पड़ता ही पड़ता है. वैसे जब आर्थिक वृद्धि बढ़ाने के लिए सरकार ने खुद ही डेढ़ लाख करोड रुपए़़ की राहत काॅरपोरेट जगत को दी है तो कर संग्रह की कमी पर चिंता कोई बड़ी बात मानी नहीं जानी चाहिए.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण


बैंकों से कर्ज कम उठना
पिछले एक दो दिन की बड़ी खबरों में एक खबर बैकों से कर्ज दिए जाने में कमी को लेकर है. यह वृद्धिदर सितंबर 2019 के पहले पखवाड़े में दस फीसद से भी नीचे चली गई है. यह खबर बता रही है कि बैंकों के पास जमा ज्यादा है लेकिन कर्ज उठ नहीं रहा है. यह सीधा सीधा देश में औद्योगिक गतिविघि में सुस्ती का ही मामला है. अगर विशेषज्ञों से सुझाव लेना शुरू हुआ है तो इस बारे में भी विशेषज्ञों के अब तक दिए सुझावों पर नजर डाल लेनी चाहिए. आमतौर पर विशेषज्ञ यही बताते आए हैं कि देश में उत्पादों की खपत घट रही है और इसका कारण उपभोक्ताओं की क्रयशक्ति का घटना है. जाहिर है विशेषज्ञ यह बताते आए हैं कि उपभोक्ताओं की जेब तक पैसा पहुंचाने की जरूरत है. उद्योग और व्यापार जगत को भी मांग करते समय इस तथ्य पर गौर करना चाहिए कि अगर उनका माल आसानी से बिकेगा तभी उन्हें ज्यादा राहत मिलेगी.

कृषि कर्ज उठने में कमी
बैंकों से कर्ज उठने में कमी के आंकड़ों में सबसे ज्यादा गौरतलब बात यह है कि कृषि और संबद्ध क्षेत्र में कर्ज उठने में कमी सबसे ज्यादा आई है. यह वृद्धिदर पिछले साल अगस्त में 6.6 फीसद थी और इस साल अगस्त में सिर्फ 0.2 फीसद ही बढ़ पाई. वैसे कृषि क्षेत्र को आर्थिक वृद्धि के मामले में आजकल बड़ा योगदानकर्ता माना नहीं जाता लेकिन एक हकीकत यह भी है कि देश की आधी से ज्यादा आबादी खेती और उससे जुड़े काम में ही लगी है. यही वर्ग संख्या के लिहाल से देश में सबसे बड़ा वर्ग है. यानी सबसे बड़े उपभोक्ता वे ही हैं और उनकी क्रयशक्ति बढ़ाने का एक मतलब देश में उत्पादक गतिविधि बढ़ाने वाला माना जाना चाहिए.

बहरहाल, इस समय देश किताबी तौर पर आर्थिक मंदी की गिरफ्त में भले ही न आया हो लेकिन उस तरफ ले जाने वाली आर्थिक सुस्ती के बहुतेरे लक्षण दिख रहे हैं. और अगर वित्त मंत्रालय ने इन लक्षणों की मौजूदगी को स्वीकार करना शुरू कर दिया है तो यह सरकार की सतर्कता का परिचायक जरूर है.

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