हिंदी के लिए जरूरी है- फैसला करें कि फैसला नहीं लेंगे

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Updated: September 5, 2019, 6:44 PM IST
हिंदी के लिए जरूरी है- फैसला करें कि फैसला नहीं लेंगे
हिंदी के लिए जरूरी है

एक तो नेट पर हिंदी बेहद कम मिलती थी. गर मिलती भी थी तो उस वेबसाइट से उसके फोंट डाउनलोड कर अपने कंप्यूटर के फोंट फोल्डर में डालने पड़ते थे, तब उस वेबसाइट की सामग्री पढ़ी जा सकती थी.

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अनुराग अन्वेषी

सितंबर का महीना हिंदी के नाम हम करते रहे हैं. इसी सितंबर के महीने की तीन तारीख को खबर आई कि वॉलमार्ट के मालिकाना हक वाली ई-वाणिज्य कंपनी फ्लिपकार्ट अपनी सेवाएं हिंदी में शुरू कर रही है. क्या इसे उसका हिंदी प्रेम माना जाए? दरअसल, अक्तूबर में दुर्गापूजा के मद्देनजर सितंबर का महीना उसके लिए बिक्री का मौसम है. उसे उम्मीद है कि हिंदी से जुड़कर कंपनी को 20 करोड़ अतिरिक्त ग्राहक मिलेंगे. उद्योग से जुड़ा एक अध्ययन बताता है कि भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले 90 फीसदी नए उपयोक्ता मातृभाषा का इस्तेमाल करते हैं. उम्मीद जताई गई है कि नेट पर हिंदी का इस्तेमाल करनेवालों की संख्या 2021 तक अंग्रेजी से आगे निकल जाएगी.

इंटरनेट युग के शुरुआती दिनों में लौटें. एक तो नेट पर हिंदी बेहद कम मिलती थी. गर मिलती भी थी तो उस वेबसाइट से उसके फोंट डाउनलोड कर अपने कंप्यूटर के फोंट फोल्डर में डालने पड़ते थे, तब उस वेबसाइट की सामग्री पढ़ी जा सकती थी.

हिंदी को किस तरह ‘बाजार’ से जोड़ा गया

पर जब माइक्रोसॉफ्ट ने अपना ऑपरेटिंग सिस्टम विंडो 2000 बाजार में उतारा तो उसने यूनिकोड फोंट का इस्तेमाल कर उपभोक्ताओं को रीजनल लैंग्वेजेज की सुविधा दी. इस रीजनल लैंग्वेजेज में उस समय हिंदी के अलावा बांग्ला, गुजराती, पंजाबी, संस्कृत, तेलुगु, तमिल और उर्दू थीं. तो क्या यह माइक्रोसॉफ्ट वालों का भाषा प्रेम था?

यह माइक्रोसॉफ्ट का भाषा प्रेम नहीं, बल्कि अपने व्यवसाय के प्रति उनका प्रेम था. माइक्रोसॉफ्ट वाले जानते थे कि भारत में अंग्रेजी के मुकाबले वह बाजार ज्यादा बड़ा है जो हिंदी और अन्य भारतीय भाषा बोलता है. इस बाजार में कंप्यूटर की पहुंच और उसका प्रसार तभी बढ़ेगा, जब कंप्यूटर में उन्हें उनकी भाषा मिलेगी. यह अलग बात है कि माइक्रोसॉफ्ट ने अपने धंधे के विस्तार के लिए जिन भाषाओं की सुविधा अपने ऑपरेटिंग सिस्टम में दीं, उससे जाहिर तौर पर उन भाषाओं को नेट पर जीवन मिला.

मूल बात यह कि अधिकतर कंपनियां अपने व्यावसायिक हितों के लिए बड़ी तत्पर और सजग रहती हैं. मसलन, माइक्रोसॉफ्ट ने यूनिकोड फोंट तैयार कर जब अपने ऑपरेटिंग सिस्टम में डाला तो उसका प्रचार-प्रसार ऐसे किया कि हिंदी में काम करने वाले लगभग सभी लोग इससे परिचित हो गए और इसपर काम करने लगे. ...और अब जब फ्लिपकार्ट ने अपने व्यवसाय को हिंदी से जोड़ा तो उसके प्रचार में भी जुट गई.
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पर क्या सरकार ने जिस टीम को हिंदी के मानकीकरण का काम सौंपा, उस टीम ने सरकार को कोई ऐसा प्रस्ताव दिया या सरकार ने ऐसी कोई योजना बनाई कि मानक भाषा का प्रचार-प्रसार हो सके? दरअसल, हमारे पास वह व्यावसायिक प्रतिबद्धता नहीं है कि हम हिंदी के मानक रूप का प्रचार कर पाते या उसे सर्वसुलभ करा पाते.

हिंदी के मानकीकरण को लेकर हैं कई सवाल

यह सुनी-सुनाई बात है, मानकीकरण के दौरान तय किया गया कि जिन शब्दों के अंत में ‘या’ है, उसका स्त्रीलिंग रूप बनाने के लिए ‘यी’ के बदले ‘ई’ करेंगे. जैसे – नयी दिल्ली के बदले नई दिल्ली, बताया से बतायी नहीं, बताई. पर इस ‘या’ से खत्म हो रहे शब्दों से अगर कोई दूसरा रूप बनाना हो तो क्या किया जाए – यह बात चर्चा में नहीं आई (आयी). मुझे कहानी का शीर्षक लिखना हो – ईमानदार बनिये. अगर इसे हम – ईमानदार बनिए – लिखेंगे तो यहां बनिए शब्द क्रिया का अर्थ देने लगेगा, जातिसूचक अर्थ नहीं देगा. ऐसी स्थिति पर कोई विचार किया गया या नहीं – इसकी जानकारी नहीं.

दरअसल, ऐसे ही सवालों से घिरा हिंदी में काम करने वाला हर शख्स अपने-अपने तर्कों के साथ हिंदी लिख रहा है, नतीजतन भाषा की एकरूपता के लिए मानकीकरण पर की गई मेहनत बेकार होती नजर आती है. सशक्तीकरण, शुद्धीकरण, प्रस्तुतीकरण, तुष्टीकरण जैसे शब्द परंपरा के लिहाज से बिल्कुल शुद्ध लगते हैं. पर अखबार से लेकर पत्रिकाओं तक में अब ये सारे शब्द राजनीतिकरण की तर्ज पर सशक्तिकरण, शुद्धिकरण, प्रस्तुतिकरण और तुष्टिकरण लिखे जाने लगे हैं. दरअसल, राजनीतिकरण में मूल शब्द राजनीति है, इसलिए ‘करण’ जुड़ने के बाद भी उसके ‘त’ की ह्रस्व इ (छोटी इ) की मात्रा वही रह जाती है दीर्घ ई (बड़ी ई) नहीं होती. पर सशक्तीकरण में मूल शब्द शक्त है, जिससे शक्ति बना और उससे सशक्ति. इसीलिए जब उसमें ‘करण’ जुड़ता है तो उसकी ‘क्ति’ की मात्री ‘क्ती’ में बदल जाती है. यही बात शेष शब्दों के साथ भी है. शुद्धीकरण में मूल शब्द ‘शुद्ध’, प्रस्तुतीकरण में मूल शब्द ‘प्रस्तुत’, तुष्टीकरण में मूल शब्द ‘तुष्ट’ है. इसलिए ‘करण’ के जुड़ते ही हर्स्व इ की मात्रा दीर्घ में बदल जाती है.

गायब होती जा रही है चंद्रबिंदी

इसी तरह विश्वविद्यालयी हिंदी में चंद्रबिंदी यदाकदा दिख जाती है पर शेष जगहों से अब गायब होती दिख रही है. नतीजतन हँस और हंस का अंतर मिटता जा रहा है. अब वाक्यों के मुताबिक आपको तय करना होगा कि हंस का इस्तेमाल हंसने के भाव के लिए किया गया या पंछी के लिए. कमलोगों को ध्यान होगा कि बिंदी का इस्तेमाल हिंदी के पांच वर्णों के लिए किया जाता है. ये पांचों वर्ण अनुनासिक या पंचमाक्षर (पञ्चमाक्षर) कहलाते हैं.

ये पांच वर्ण हैं – ङ, ञ, ण, न और म. आपको ध्यान होगा, पुरानी किताबों में आपने गंगा को गङ्गा लिखा देखा होगा या वांगमय को वाङ्गमय. इस बिंदी का नियम यह है कि जिस वर्ण पर वह लगती है उसके बाद का वर्ण जिस वर्ग का होगा, उस बिंदी का उच्चारण उसके पंचमाक्षर का होगा. गंगा में पहले ‘ग’ पर बिंदी लगी है, संयोग से अगला वर्ण ‘ग’ ही है. यह ‘ग’ क-वर्ग का सदस्य है और इस वर्ग का पंचमाक्षर है ‘ङ’, इसलिए गंगा में पहले ‘ङ’ लिखा जाता था. पंचमाक्षर में बिंदी ‘प’ पर लगी है और अगला वर्ण ‘च’ है. इस च-वर्ग का पंचमाक्षर ‘ञ’ है, इसलिए इस बिंदी का उच्चारण ‘ञ’ होगा.

जब हम संबंध लिखते हैं तो गौर करें कि पहली बिंदी का उच्चारण ‘म’ हो रहा है जबकि बाद की बिंदी का उच्चारण ‘न’. ‘स’ पर लगी बिंदी के बाद का वर्ण ‘ब’ है. यह ‘ब’ प-वर्ग का सदस्य है और इस वर्ग का पंचमाक्षर ‘म’ है, इसलिए पहला उच्चारण ‘म’ हुआ. अगली बिंदी ‘ब’ पर लगी है और ‘ब’ के बाद का वर्ण ‘ध’ है. ‘ध’ त-वर्ग का सदस्य है और इसका पंचमाक्षर ‘न’ है. इसीलिए इस दूसरी बिंदी का उच्चारण ‘न’ हो रहा है.

वैसे सच है कि किसी भी भाषा का व्याकरण उस भाषा के बहाव को रोकता है. संस्कृत के व्याकरण के लिए कहा जाता है कि वह बहुत वैज्ञानिक है. पर इसी वैज्ञानिकता ने तो संस्कृत का फलक संकुचित कर दिया, इस भाषा का जितना फैलाव हो सकता था, वह किताबों में बंध कर रह गई, आम बोलचाल की भाषा नहीं बन पाई.

हिंदी का फैलाव और होने की चाह अगर है तो हमें इस भाषा के साथ और उदार होने की जरूरत है, दूसरी भाषाओं के साथ इसके मेलजोल को प्रेमभाव से देखना होगा और वहां से सहज रूप में आ रहे शब्द हमें आत्मसात करने होंगे. अपनी जरूरत के मुताबिक, अपनी भाषा की प्रकृति के मुताबिक उस शब्द का संस्कार करना होगा, तभी हिंदी का भला होगा. वरना अंग्रेजी के ‘टेक डिसिजन’ का हिंदी अनुवाद ‘फैसला लेना’ करते रहेंगे, हिंदी की प्रकृति के मुताबिक ‘फैसला करना’ कभी सीख ही नहीं पाएंगे. ‘अच्छी हिंदी’ सिखाने वाले एक प्रतिष्ठित अखबार ने हिंदी की इस प्रकृति को रेखांकित करते हुए कभी शीर्षक दिया था – फैसला करें कि फैसला नहीं लेंगे.

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First published: September 5, 2019, 6:44 PM IST
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