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सरकार बनाने के लिए यहां पर जरूरी है जीत, इसलिए बीजेपी-कांग्रेस लगा रही है पूरा ज़ोर

फाइल फोटो.

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लोकसभा चुनाव 2019 में हर छोटा-बड़ा सियासी दल यहां ज़ोर लगा रहा है. वैसे तो ये इलाका भी ठीक वैसा ही है जैसे देश के दूसरे हिस्से. लेकिन बिरादरियों में बंटा यहां का सियासी गठजोड़ हर दल को ललचाता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 18, 2019, 8:13 AM IST
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लोकसभा हों या फिर विधानसभा, लेकिन चुनावों की आहट पाते ही हर छोटे-बड़े सियासी दल के लिए यूपी का ये इलाका खास हो जाता है. ठीक वैसे ही जैसे लोकसभा चुनाव 2019 में हर छोटा-बड़ा सियासी दल यहां ज़ोर लगा रहा है. वैसे तो ये इलाका भी ठीक वैसा ही है जैसे देश के दूसरे हिस्से. लेकिन बिरादरियों में बंटा यहां का सियासी गठजोड़ हर दल को ललचाता है.

पश्चिमी यूपी के नाम से पहचान रखने वाले इस इलाके की एक खासियत ये भी है कि ये पूर्व प्रधानमंत्री और किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह की कर्म और जन्मस्थली भी है. वहीं गन्ने पर होने वाली सियासत के लिए भी ये इलाका याद किया जाता है. आज पश्चिम यूपी की 21 में से 8 सीट पर वोटिंग हो रही है. 8 सीट पर मतदान पहले चरण में हो चुका है. राजबब्बर, हेमामालिनी, अक्षय यादव और मशहूर शायर इमरान प्रतापगढ़ी की प्रतिष्ठा इस चरण में दांव पर लगी हुई है. 2014 में ये सभी सीटें बीजेपी ने जीती थी.

जाट-मुस्लिम और दलितों पर रहती है निगाह



पेशे से किसान और जाट महापंचायत से जुड़े जितेंद्र हुड्डा बताते हैं, ‘पश्चिमी उप्र में 15 जिले आते हैं. यहां 77 विधानसभा और 21 लोकसभा सीट हैं. एक अनुमानित आंकडे के अनुसार इन सीट पर 17 प्रतिशत जाट तो 33 प्रतिशत मुस्लिम हैं. वहीं 35 से 40 प्रतिशत दलित वोटर भी हैं. विधानसभा की 77 में से 60 सीट ऐसी हैं जहां 40 प्रतिशत जाटों की आबादी है.’
जाटों के हालात पर एक नज़र.


जाट-मुस्लिम और दलित-मुस्लिम बनाते-बिगाड़ते हैं समीकरण

मुजफ्फरनगर के रहने वाले और एक दैनिक अखबार से जुड़े पत्रकार शाहनवाज़ बताते हैं, ‘खासतौर से विधानसभा चुनावों में यहां जाट-मुस्लिम और दलित मुस्लिम समीकरण बहुत असर डालते हैं. 2007 में दलित-मुस्लिम गठजोड़ बैठने के बाद ही मायावती ने अपनी सरकार बनाई थी. गठजोड़ इतना कामयाब हुआ था कि आगरा की नौ विधानसभा सीटों में से सात सीटें बसपा के खाते में गईं थीं. जबकि इस इलाके से बसपा को कुल 32 सीट मिली थीं. जब सपा ने 2012 में अपनी सरकार बनाई थी तब भी बसपा इस इलाके से 23 सीट निकालने में कामयाब हुई थी.

इसी तरह से इस इलाके में जाट-मुस्लिम गठजोड़ के समीकरण को भी नहीं नकारा जा सकता है. जब 2012 के विधानसभा चुनावों में जाट-मुस्लिम वोटर एक तरफ गए तो सपा के खाते में इस इलाके से 24 सीट आ गईं. जबकि 2007 में इसी सपा को सिर्फ तीन सीट मिली थीं. ये समीकरण इतना कामयाब हुआ था कि 77 में से 26 सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार विधानसभा पहुंचे थे. मेरठ, आगरा और अलीगढ़ की सभी शहरी सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार जीते थे. इस इलाके में ग्रामीण क्षेत्रों से ज्यादा शहरी सीट पर मुस्लिम आबादी रहती है.’

देखें कहां-कहां मजबूत हैं मुस्लिम वोटर.


चुनावों में इसलिए आती है रालोद की याद 

बेशक यूपी विधानसभा में रालोद के पास एक सीट है. 2014 लोकसभा चुनावों में रालोद को यूपी से सिर्फ 00.44 प्रतिशत वोट ही मिले थे. जबकि 2009 के चुनावों में रालोद के पास लोकसभा में 5 सीट थीं. यही वजह है कि सपा-बसपा ने गठबंधन के लिए रालोद से किनारा नहीं किया, बल्कि तीन सीट रालोद को देते हुए जाटों पर निशाना साधने की कोशिश की है.

डॉ. बीआर आंबेडकर विश्वविद्वालय के प्रो. डॉ मोहम्मद अरशद बताते हैं, “पश्चिमी उप्र में रालोद को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. आज भी इस इलाके में चौधरी चरण सिंह का प्रभाव बाकी है. आज भी उनका अक्स रालोद परिवार में देखा जाता है. बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनका दिली लगाव इस परिवार के साथ है."

डॉ मोहम्मद अरशद कहते हैं, "हां, लेकिन ये बात भी सच है कि बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं जिनका लगाव तो इस परिवार यानी चौधरी अजित सिंह के साथ है, लेकिन कभी-कभी वोट इधर-उधर दे देते हैं. लेकिन जब बात फंसने लगती है तो ये ही जाट वोट एकजुट होने लगता है. जैसा कि इस वक्त है. आज लोकसभा में रालोद के पास एक सीट तक नहीं है. चौधरी खुद भी अपनी बागपत वाली सीट हार गए थे. ये बात जाटों को बहुत चुभी है.’

कहा जाता है कि इस क्षेत्र की 21 लोकसभा सीट में से 18 सीट ऐसी हैं जहां 50 हजार से लेकर 3 लाख तक जाट मतदाता है. सबसे अधिक जाट बागपत सीट पर हैं. इसके बाद मुजफ्फरनगर, मथुरा, फतेहपुर सीकरी, हाथरस आदि सीट हैं जहां सबसे ज्यादा जाट वोटर है.”

ये हैं दलितों की प्रमुख जातियां.


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खासतौर से पश्चिमी उप्र के समीकरण गठबंधन के लिए वोट में तब्दील होंगे या नहीं इस बारे में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अब्दुल रहीम का कहना है, “पश्चिमी उप्र ही नहीं पूरे यूपी में समीकरण वोट में तब्दील हुआ या नहीं ये तो 23 मई को ही पता चलेगा. लेकिन फूलपुर, गोरखपुर और कैराना के उदाहरण हमारे सामने हैं. वोटरों में नाराजगी भी है जिसे गठबंधन को कैश कराने में समय नहीं लगेगा.”

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