CBI विवाद: तबादले के बाद आलोक वर्मा के 72 घंटे कैसे गुजरे

CBI निदेशक आलोक कुमार वर्मा और ब्यूरो के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच छिड़ी जंग सामने आने के बाद सरकार ने पिछले साल 23 अक्टूबर को दोनों अधिकारियों को अवकाश पर भेजने का फैसला किया था.

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Updated: January 11, 2019, 6:00 PM IST
CBI विवाद: तबादले के बाद आलोक वर्मा के 72 घंटे कैसे गुजरे
(फाइल फोटो- आलोक वर्मा)
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Updated: January 11, 2019, 6:00 PM IST
पहले सरकार ने 77 दिन तक आलोक वर्मा को जबरन छुट्टी पर भेजा. फिर मंगलवार 8 जनवरी को आलोक वर्मा को सुप्रीम कोर्ट ने बहाल कर दिया था. आलोक वर्मा ने उसी दिन अपनी जिम्मेदारी भी संभाल ली थी. लेकिन, महज 36 घंटे बाद ही पीएम मोदी के नेतृत्व वाली सेलेक्शन कमेटी ने उनको पद से हटा दिया. वर्मा को कमेटी ने फायर सर्विसेज एंड होम गार्ड का डायरेक्टर जनरल नियुक्त किया है. 1979 बैच के आईपीएस अधिकारी आलोक वर्मा फायर सर्विसेज एंड होम गार्ड के पद से 31 जनवरी 2019 को रिटायर हो जाएंगे.

राकेश अस्थाना के साथ विवादों के बाद सरकार की ओर से पद से हटाए गए आलोक वर्मा का कहना है कि उन्हें राजनीति की वजह हटाया गया जिनका असर आगामी लोकसभा चुनावों में साफ देखने को मिल सकता है.

जाहिर तौर पर पिछले कुछ घंटे आलोक वर्मा के लिए बेहद तनाव भरे रहे. जानिए क्या-क्या हुआ?



8 जनवरी

77 दिन तक जबरन छुट्टी में रहने के बाद आलोक वर्मा को मंगलवार 8 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने बहाल कर दिया था. वर्मा ने उसी दिन अपनी जिम्मेदारी भी संभाल ली थी. लेकिन, महज 36 घंटे बाद ही पीएम मोदी के नेतृत्व वाली सेलेक्शन कमेटी ने उनको पद से हटा दिया.

9 जनवरी
आलोक वर्मा घर से पूजा करने के बाद 10:27 मिनट पर अपने दफ्तर चार्ज संभालने के लिए लौटे. इतने दिनों बाद जब उनकी दफ्तर में वापसी हुई तो वर्मा के स्टाफ ने मिठाई भी बांटी. सीबीआई हेडक्वार्टर में पहुंचने के 20 मिनट बाद वर्मा ने नागेश्वर राव ने मुलाकात की. राव को सीबीआई का कार्यकारी निदेशक नियुक्त किया गया था.
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इस मामले में सीबीआई के एक विशेष अधिकारी ने बताया कि आलोक वर्मा का स्वागत किसी पारंपरिक तौर पर नहीं किया गया. यह बिल्कुल सामान्य दिनों जैसा ही था.' वर्मा ने दिनभर अधिकारियों से मुलाकात की और मीटिंग ली.

मीटिंग के दौरान वे अधिकारी भी मौजूद रहे जिन्हें राव ने ट्रांसफर किया था. इस मीटिंग में डिप्टी सुप्रीटेंडेंट अजय बासी और अश्विनी गुप्ता भी मौजूद रहे. दोनों ने वर्मा से अनुरोध किया कि उनका ट्रांसफर रद्द किया जाए. बैठक के बाद 24 अक्टूबर से लेकर 8 जनवरी के बीच किए गए सभी तबादलों को रद्द कर दिया गया.

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बता दें कि मोदी और कमेटी के दूसरे सदस्य सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एके सीकरी वर्मा को हटाए जाने के पक्ष में थे. वहीं, समिति के तीसरे सदस्य और लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे सीबीआई चीफ को हटाए जाने के खिलाफ थे. खड़गे ने कमेटी को अपना विरोध पत्र (प्रोटेस्ट लेटर) भी सौंपा.

देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी CBI के चीफ आलोक वर्मा के खिलाफ सीवीसी से भ्रष्टाचार की शिकायत के बाद उन्हें पद से हटा दिया गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्‍यक्षता वाली सलेक्‍शन कमिटी ने उन्‍हें पद से हटाने का फैसला लिया.

कार्यकाल के दूसरे दिन आलोक वर्मा ने उनकी जगह अंतरिम चीफ नियुक्त किए के. नागेश्वर राव द्वारा जारी करीब सभी ट्रांसफर ऑर्डर कैंसिल कर दिए थे. नागेश्वर राव ने वर्मा की टीम के 10 अधिकारियों के ट्रांसफर ऑर्डर पर साइन किए थे.

CVC रिपोर्ट की तबादले में भूमिका
आलोक वर्मा पर रिश्वतखोरी से लेकर पशु तस्करों की मदद करने के आरोप हैं. केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) इन आरोपों की जांच कर रही थी. इसी को आधार बनाकर पीएम मोदी की अध्यक्षता में हाई पावर कमिटी ने 2:1 से वर्मा को हटाने का फैसला लिया. मोदी और कमिटी के दूसरे सदस्य सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एके सीकरी वर्मा को हटाए जाने के पक्ष में थे. वहीं, समिति के तीसरे सदस्य और लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे सीबीआई चीफ को हटाए जाने के खिलाफ थे. खड़गे ने कमिटी को अपना विरोध पत्र (प्रोटेस्ट लेटर) भी सौंपा.

सीवीसी को यह भी सबूत मिले कि मोइन कुरैशी के खिलाफ जांच को प्रभावित करने की कोशिश की गई थी. उनपर कुरैशी के करीबी सतीश बाबू सना के जरिये दो करोड़ रुपये की रिश्वत लिए जाने के भी सबूत थे. दावा किया गया कि सीबीआई टीम इस केस में हैदराबाद के कारोबारी सतीश बाबू सना को इस मामले में आरोपी बनाना चाहती थी, लेकिन वर्मा ने मंजूरी नहीं दी. इस पूरे मामले में वर्मा की भूमिका संदेहास्पद थी. पहली नज़र में उनके खिलाफ मामला बन रहा था.

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