जिसने साध लिए अल्पसंख्यक और ग्रामीण, सीमांचल में उसी की जमीन मजबूत

लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण के चुनाव में बिहार में पांच सीटों पर मतदान हो रहा है. यहां भाजपा और जेडीयू के गठबंधन के लिए चुनौती होगी क्योंकि कांग्रेस और आरजेडी का गठबंधन 5 में से 4 सीटों पर काबिज़ है.

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Updated: April 18, 2019, 3:12 PM IST
जिसने साध लिए अल्पसंख्यक और ग्रामीण, सीमांचल में उसी की जमीन मजबूत
नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार. फाइल फोटो.
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Updated: April 18, 2019, 3:12 PM IST
(अमितेश)
लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण के मतदान के दौर में बिहार की कुल 40 में से 5 सीटों पर गुरुवार को वोट डाले जा रहे हैं. हालांकि जुलाई 2017 से राज्य में भाजपा-जदयू गठबंधन की सरकार है लेकिन इन पांच सीटों पर कांग्रेस-राजद गठबंधन को एक खास बढ़त मिलती हुई दिखाई दे रही है.



किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया, भागलपुर और बांका, ये पांचों सीटें ग्रामीण आबादी बहुल हैं, जिन पर गुरुवार को मतदान हो रहा है. वर्तमान में इन पांच में से चार सीटों पर कांग्रेस-राजद के सांसद हैं और एक सीट पर जदयू का दबदबा है. इन पांच सीटों पर राष्ट्रीय, क्षेत्रीय पार्टियों के और निर्दलीय, कुल मिलाकर 68 उम्मीदवार भाग्य आज़मा रहे हैं.

इन सीटों पर भाजपा मैदान में नहीं है इसलिए उसकी साथी पार्टी जदयू और विरोधी गठबंधन यानी कांग्रेस-राजद के बीच सीधा मुकाबला है. सीट शेयरिंग के इस गणित की वजह ये है कि इन सीटों पर 2014 में हुए चुनाव में भाजपा के प्रत्याशियों को यहां हार का मुंह देखना पड़ा था. इन सीटों पर भाजपा का वोट शेयर भी संतोषजनक नहीं रहा था.

भाजपा-जेडीयू के सामने साख बचाने की चुनौती
पिछले लोकसभा चुनाव के लिहाज से भी देखें तो उस वक्त एक तरफ बीजेपी के नेतृत्व वाला एनडीए था तो दूसरी तरफ आरजेडी के नेतृत्व में कांग्रेस-एनसीपी के साथ गठबंधन था, वहीं मोदी विरोध के नाम पर बीजेपी से अलग होने के बाद जेडीयू अकेले मैदान में था. लेकिन, इस त्रिकोणीय लड़ाई में उस वक्त इन पांचों सीटों में से एक सीट पर भी बीजेपी और उसके सहयोगियों को जीत नहीं मिल सकी थी.

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यह हाल तब था, जब पूरे देश के साथ-साथ बिहार में भी मोदी लहर चरम पर थी. ये बात अलग है कि बिहार की 40 में से 31 सीटों पर एनडीए को ही जीत मिली थी, लेकिन, इन पांचों सीटों में से एनडीए का खाता तक नहीं खुल पाया था. उस वक्त अलग चुनाव लड़ रही जेडीयू को पूर्णिया की सीट पर जीत मिली थी, जहां से संतोष कुशवाहा चुने गए थे. कुशवाहा एक बार फिर जेडीयू के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं. दूसरी तरफ, भागलपुर और बांका से आरजेडी, जबकि, किशनगंज से कांग्रेस और कटिहार से एनसीपी के तारिक अनवर चुनाव जीतने में सफल रहे थे.

अब इन पांच सालों में कहानी बिल्कुल अलग हो गई है. नीतीश कुमार की अगुआई में जेडीयू वापस बीजेपी के साथ खड़ी है. एनडीए कुनबे में अब बीजेपी के साथ जेडीयू और एलजेपी भी खड़े हैं. ऐसे में जेडीयू उम्मीदवारों की जीत में बीजेपी के वोट के ट्रांसफर होने पर बहुत कुछ निर्भर करेगा. क्या बीजेपी के कैडर जेडीयू को उसी अंदाज में वोट कर पाएंगे? यह सबसे बड़ा सवाल है.

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भागलपुर में सीधा मुकाबला
सबसे पहले बात भागलपुर सीट की करें तो यहां आरजेडी के शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल का मुकाबला जेडीयू के अजय मंडल से है. दोनों ही उम्मीदवार प्रभावशाली गंगौता समुदाय से हैं. पिछली बार आरजेडी के बुलो मंडल ने बीजेपी के शाहनवाज हुसैन को हराया था. लेकिन, इस बार यह सीट जेडीयू के खाते में चली गई है. लंबे वक्त से बीजेपी के खाते में रही इस सीट के अचानक जेडीयू कोटे में जाने के बाद बीजेपी के कार्यकर्ताओं में काफी निराशा थी. हालाकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के बाद एनडीए के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश जेडीयू-बीजेपी दोनों की तरफ से की गई है.

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बांका में त्रिकोणीय मुकाबला, जेडीयू को नुकसान मुमकिन
वहीं बांका में बीजेपी की बागी पुतुल कुमारी के निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरने से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है. यहां आरजेडी के जयप्रकाश नारायण यादव और जेडीयू के गिरिधारी यादव चुनाव मैदान में हैं. लेकिन, जेडीयू के पूर्व सांसद स्व. दिग्विजय सिंह की पत्नी पुतुल कुमारी का इलाके में काफी प्रभाव है. उनका प्रभाग जेडीयू को नुकसान पहुंचा सकता है.

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पूर्णिया में पूर्व भाजपाई हैं जेडीयू के खिलाफ
पूर्णिया सीट पर जेडीयू की तरफ से मौजूदा सांसद संतोष कुशवाहा मैदान में हैं जबकि महागठबंधन की तरफ से यह सीट कांग्रेस के खाते में गई है. कांग्रेस ने यहां से उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह को टिकट दिया है. पप्पू सिंह दो बार बीजेपी के सांसद भी रह चुके हैं, लेकिन, पिछली बार वे संतोष कुशवाहा से चुनाव हार गए थे. इस बार टिकट कटने की संभावना के बाद उन्होंने अपना पाला बदलकर पहले ही कांग्रेस का दामन थाम लिया था.

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कटिहार में कांग्रेस और जेडीयू आमने-सामने
कटिहार में इस बार जेडीयू और कांग्रेस के बीच लड़ाई है. पिछली बार बीजेपी की तरफ से इस सीट पर पूर्व सांसद निखिल चौधरी मैदान में थे, लेकिन, उन्हें एनसीपी के तारिक अनवर के हाथों हार का सामना करना पड़ा था. लेकिन, इस बार तारिक अनवर ने कांग्रेस का दामन थाम लिया है. तारिक अनवर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि उनके सामने जेडीयू की तरफ से दुलालचंद्र गोस्वामी चुनाव मैदान में हैं.

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कांग्रेस के जीते किशनगंज में बनेगा त्रिकोण?
वहीं, किशनगंज सीट से जेडीयू के सैयद महमूद अशरफ और कांग्रेस के डॉ. जावेद आजाद के बीच मुकाबला है. यहां असद्दुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआइएमआइएम से अख्तरुल ईमान के मैदान में आने से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है. मुस्लिम बहुल इस इलाके में पिछली बार भी कांग्रेस की ही जीत हुई थी. इस बार भी जेडीयू के लिए लड़ाई कठिन है.

इन पांचों सीटों के सामाजिक समीकरण के हिसाब से ही बीजेपी ने इन्हें जेडीयू खाते में जाने दिया. किशनगंज लोकसभा क्षेत्र में मुस्लिम आबादी तो लगभग 70 प्रतिशत तक है. किशनगंज और कटिहार समेत सीमांचल के इलाके में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका काफी अहम रहती है. दूसरी तरफ, पिछड़े और अति पिछड़े समुदाय के मतदाताओं का रुझान इस पूरे इलाके में निर्णायक रहता है. ऐसे में जेडीयू के लिए इस इलाके में फिर पुराना वर्चस्व हासिल करना और लोकसभा चुनाव में महागठबंधन को पटखनी देना बड़ी चुनौती होगी.

2015 के नतीजे महागठबंधन के पक्ष में
इन पांच लोकसभा सीटों के अंतर्गत 30 विधानसभा सीटें शामिल हैं. आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि भाजपा और जेडीयू के खाते में 30 विधानसभाओं में जितना वोट शेयर है, कांग्रेस और आरजेडी के पास उससे ज़्यादा वोट हैं.

2015 के बिहार विधानसभा चुनावों में, कांग्रेस के खाते में नौ विधानसभा सीटें हैं, 42.1 फीसदी वोट शेयर के साथ. वहीं, कांग्रेस की साथी आरजेडी के खाते में पांच सीटें हैं और वोट शेयरिंग प्रतिशत 43.94 है. महागठबंधन के खिलाफ भाजपा के पास 5 और जदयू के पास सीमांचल में 10 सीटें हैं और क्रमश: 48.3 व 40.71 प्रतिशत वोट शेयर है. इसके अलावा सीपीआईएमएल सिर्फ एक सीट पर हावी रह सकी.

सीमांचल की इन पांचों सीटों पर मुस्लिम आबादी की बहुलता है. एनडीए के सामने ये आंकड़ा भी बड़ी चुनौती के रूप में है इसलिए यहां भाजपा और जदयू विकास के मुद्दों पर वोट मांगने की कवायद कर रहे हैं. इस बार चुनाव में एनडीए के लिए इस चुनौती से जूझना मुश्किल साबित हो सकता है.

(अतिरिक्त इनपुट्स: गज़नफर अब्बास)

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