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देश में कैसे मिल सकती है सस्ती दवाएं, क्या है जानकारों की राय

भारत में जेनरिक और ब्रांडेड दवाइयों में क्या फर्क है इसको मरीज समझते नहीं है

भारत में जेनरिक और ब्रांडेड दवाइयों में क्या फर्क है इसको मरीज समझते नहीं है

भारत में इस समय तीन प्रकार की दवाइयां बाजार में उपलब्ध हैं. ब्रांडेड, ब्राडेंड जेनरिक और जेनरिक. जो ब्राडेंड दवाई होती है वह रिसर्च मॉलिक्यूल होता है.

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देश में सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने को लेकर मोदी सरकार लगातार प्रयासरत है. पिछले कुछ सालों से मोदी सरकार ने सस्ती दवाओं को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए जेनरिक दवाओं पर विशेष ध्यान दिया है. साल 2014 में मोदी सरकार की पहली बार सत्ता में आने के बाद से ही जेनरिक दवाओं पर विशेष काम किया जा रहा है. इसके लिए भारत सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने देशभर में प्रधानमंत्री जनऔषधि केंद्र के तहद अब तक लगभग 5000 जनऔषधि केंद्र खोले हैं.

केंद्र सरकार प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP) के विस्तार पर लगातार काम कर रही है. सरकार ने लोगों से समय-समय पर जन औषधि केंद्र खोलने के लिए आवेदन भी मांगे हैं. सरकार की कोशिश है कि PMBJP के तहत भारत सरकार बेहतर गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवा आम लोगों के लिए सस्ती कीमत पर मुहैया कराए, लेकिन बहुत लोगों को अभी तक पता नहीं है कि वह जो दवा खरीदते हैं वह ब्रांडेड है या जेनरिक?

जेनरिक और ब्रांडेड दवाओं में क्या अंतर है

दिल्ली के लोक नायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल(एलएनजेपी) के डॉक्टर नरेश कुमार न्यूज 18 हिंदी से बातचीत में कहते हैं, ‘देखिए भारत में इस समय तीन प्रकार की दवाइयां बाजार में उपलब्ध हैं. ब्रांडेड, जेनरिक और ब्राडेंड जेनरिक. जो ब्राडेंड दवाई होती हैं वह किसी एक कंपनी का रिसर्च मॉलिक्यूल होता है. वह कंपनी सघन रिसर्च कर उस दवाई को पहली बार बनाई होती है और पेटेंट पीरियड तक ब्रांडेड के रूप में प्रमोट करती है. दूसरा, जेनरिक दवाइयां वह होती हैं जिसके पैकिंग पर सिर्फ कटेंट का नाम लिख कर ही मार्केट में बेचा जाता है. तीसरी कैटेगिरी, ‘ब्रांडेड जेनरिक’ दवाइयों की होती है जो हर कंपनी अपने-अपने नाम से मार्केट में प्रमोट करती है. 'ब्रांडेड जेनरिक' रिसर्च करने वाली कंपनी के पेटेंट पीरियड समाप्त होने के बाद बनाई जाती है. बता दें कि ये दवाइयां बाद में किसी भी ब्रांड से मार्केट में आती हैं, वह रिसर्च मॉलिक्यूल(साल्ट) नहीं होती हैं. इस कैटेगिरी की दवाइयों को 'ब्रांडेड जेनरिक' दवाई कहते हैं.'

डॉ नरेश के मुताबिक, 'भारत में दवाई का जो मार्केट है वह 90 से 95 प्रतिशत 'ब्रांडेड जेनरिक' दवाइयों का है. लोग 'ब्रांडेड जेनरिक' को ही ब्रांडेड समझ बैठते हैं. इस समय जेनरिक दवाई सिर्फ इंस्टीच्यूशनल सप्लाई के प्रयोग में आती है. इस देश में कोई भी डॉक्टर अगर दवाई लिखता है और आप केमिस्ट शॉप पर जाते हैं तो आपको केमिस्ट ज्यादातर 'ब्रांडेड जेनरिक' दवाई ही देता है. डॉक्टर अगर जेनरिक (केवल साल्ट के नाम) दवाई भी लिखता है तो भी केमिस्ट जेनरिक दवाई नहीं देता है. तब डॉक्टर की जेनरिक दवाई को लेकर निर्णय लेने की क्षमता खत्म हो जाती है. केमिस्ट अपना नफा के हिसाब से तय करता है कि मरीज को कौन सी दवा दी जाए.’



डॉक्टरों की राय में केमिस्ट और दवा कंपनियों की मिलीभगत का नतीजा मरीज भुगत रहे हैं


डॉ नरेश आगे कहते हैं, ‘सामान्य तौर पर किसी एक मॉलिक्यूल के लिए ब्रांडेड दवाइयां सबसे महंगी होती है. ब्रांडेड जेनरिक दवाइयों का दाम उनसे कम होता है और जेनरिक दवाइयों का दाम तो सबसे कम होता है. जेनरिक दवाओं की कीमत ब्रांडेड दवाओं की तुलना में कई गुणा कम होता है. ब्रांडेड और जेनरिक दवाओं में अंतर सिर्फ दाम का ही होता है. कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है कि एक कंपनी एक मॉलिक्यूल दो ब्रांड नेम से प्रमोट करती है. आखिर ब्रांडेड कंपनियों को ऐसी नौबत क्यों आती है? देश का मार्केट तो इस समय ब्रांडेड जेनरिक से भरा पड़ा है तो जेनरिक दवा कहां से मिलेगा? इसका एक ही समाधान है कि ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) को बोला जाए कि देश में ब्रांडेड जेनरिक दवाई की मेनुफेक्चरिंग बंद करा के जेनरिक दवा की मेनुफेक्चरिंग शुरू की जाए. साथ ही इसकी मॉनिटरिंग करने के लिए एक ठोस नियामक का भी गठन होना चाहिए.’

देश में जेनरिक दवाओं को बढ़ावा देने के लिए लगातार काम चल रहा है


जानकारों का मानना है कि भारत में दवा बेचने का लाइसेंस हासिल करना बहुत ही आसान है. दवा बनाने का लाइसेंस राजनेताओं या नौकरशाहों से संपर्क के बूते हासिल हो जाता है. भारत में दवा की क्वालिटी पर नियंत्रण रखने का ढांचा भी बड़ा ही लचर है. एक तो इस काम के लिए हुनरमंद लोग मौजूद नहीं हैं, दूसरी बड़ी बाधा टेक्नोलॉजी की है. हमारे देश में योग्य फार्मासिस्ट और दवा-दुकानदार भी पर्याप्त संख्या में मौजूद नहीं हैं. दवा-दुकानों पर हर जगह आपको बेरोजगार, अप्रशिक्षित नौजवान या फिर दुकान मालिक के परिवार जन चलाते हुए मिल जाते हैं.  ऐसे में सवाल है कि देश के डॉक्टरों पर जेनरिक दवा नहीं लिखने का दोष देना कितना सही है?

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