OPINION: बाल रोग विशेषज्ञों को वैक्सीन लगाने की अनुमति देना कोरोना के खिलाफ बनेगा गेम चेंजर!

बाल रोग विशेषज्ञों की अकादमी ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन को पत्र लिखकर टीकाकरण अभियान में सहयोग देने का प्रस्ताव रखा है. फाइल फोटो

बाल रोग विशेषज्ञों की अकादमी ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन को पत्र लिखकर टीकाकरण अभियान में सहयोग देने का प्रस्ताव रखा है. फाइल फोटो

COVID-19 Fight: भारत ने 16 जनवरी को स्वास्थ्य कर्मियों और फ्रंटलाइन कर्मचारियों का टीकाकरण शुरू किया था. स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक 26 मार्च तक कोरोना वायरस वैक्सीन की 5.55 करोड़ खुराक लोगों को दी गई है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 28, 2021, 9:18 PM IST
  • Share this:
(डॉ. श्रीनिवास जी. कासी/डॉ. समीर एच. दलवई)

ई दिल्ली. पिछले साल 11 मार्च को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कोरोना वायरस संक्रमण को महामारी घोषित किया था. वैश्विक स्तर पर 25 मार्च 2021 के दिन तक विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वायरस संक्रमण के 12,45,35,520 मामलों की पुष्टि की है, संक्रमण के चलते 27,38,876 लोगों की मौत हुई है. भारत की बात करें तो 1,17,38,534 मामले सामने आए हैं और संक्रमण के चलते 1,60,692 लोगों की मौत हुई है. कोरोना वायरस का कोई निश्चित इलाज होने के चलते अभी तक संक्रमण रोकने के लिए टेस्टिंग, ट्रीटिंग और नियंत्रण पर ही स्वास्थ्य एजेंसियों का फोकस रहा है. हालांकि वायरस की दूसरी और तीसरी लहर के प्रकोप को देखते हुए टीकाकरण ही महामारी को कंट्रोल करने का एकमात्र उपाय दिख रहा है.

कोरोना वायरस संक्रमण के प्रति मानव आबादी संवेदनशील है और बार-बार संक्रमित होने की दशा में मृत्यु दर का बढ़ना स्वीकार नहीं किया जा सकता और ना ही मूकदर्शक बनकर आर्थिक बर्बादी देखी जाएगी. सस्ती और सुलभ कोरोना वायरस वैक्सीन का रिकॉर्ड समय में विकसित होना और व्यापक पैमाने पर टीकाकरण अभियान चलाया जाना बेहद फायदेमंद है, जोकि सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकता है. वैश्विक स्तर पर सुचारू रूप से चलाया गया टीकाकरण अभियान ही कोरोना महामारी के खिलाफ लंबे समय तक प्रभावी समाधान है, जिसके सामाजिक और आर्थिक फायदे भी हैं.

महामारी के संकट को देखते हुए वैक्सीन शोधकर्ताओं और इंडस्ट्री ने चुनौतीपूर्ण मौके पर खुद को साबित किया है. 'महामारी की रफ्तार' की तरह वैक्सीन शोध ने भी विकास किया है. पिछले साल 11 जनवरी 2011 को चीन की सरकार ने कोरोना वायरस का जेनेटिक सीक्वेंस दुनिया के साथ साझा किया था और उसके बाद 11 दिसंबर 2020 को कोरोना महामारी के खिलाफ फाइजर और बायोएनटेक की पहली वैक्सीन विकसित कर ली गई. वैक्सीन को आपातकालीन इस्तेमाल की मंजूरी भी मिल गई. गहन वैक्सीन शोध संस्थान, जेनेटिक वैक्सीन और वायरल वेक्टर्ड वैक्सीन (viral-vectored vaccines) की बुनियाद के चलते टीके का तेजी से विकास हुआ.
बड़ी दूर है हर्ड इम्युनिटी

इसमें कोई शक नहीं कि कोरोना वायरस वैक्सीन की सीमित उपलब्धता के चलते टीकाकरण में प्राथमिकता बेहद जरूरी है. हालांकि प्राथमिकता में इस बात का ध्यान रखना होगा कि टीकाकरण का ज्यादा से ज्यादा फायदा लिया जाए जिससे टीका लगवाने वाले व्यक्ति के साथ एक बड़ी आबादी को भी लाभ पहुंचे. हालिया दिनों तक टीकाकरण का कार्यक्रम पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में था, जिसमें प्राइवेट सेक्टर की कोई भूमिका नहीं थी. भारत ने 16 जनवरी को स्वास्थ्य कर्मियों और फ्रंटलाइन कर्मचारियों का टीकाकरण शुरू किया था. स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक 26 मार्च तक कोरोना वायरस वैक्सीन की 5.55 करोड़ खुराक लोगों को दी गई है. ये भारत की आबादी का सिर्फ 4 फीसदी है.

अगर इस रफ्तार को तेजी से नहीं बढ़ाया गया तो भारत में हर्ड इम्युनिटी हासिल करने का सफर बेहद लंबा है, जोकि टीकाकरण अभियान का लक्ष्य है. स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपनी ऑपरेशनल गाइडलाइंस में इस बात को माना है कि टीकाकरण अभियान में प्राइवेट सेक्टर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. केंद्र ने यह भी कहा है कि राज्य और जिला प्रशासन को प्राइवेट सेक्टर के साथ मिलकर सक्रियता के साथ काम करने की जरूरत है. प्राइवेट स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं में बच्चों के डॉक्टरों की भूमिका खासतौर पर टीकाकर्मी से बेहद साम्य दर्शाती है.



निर्णायक हो सकते हैं बच्चों के डॉक्टर

बच्चों के डॉक्टर वैक्सीन के समर्थक होते हैं, जो वैक्सीन के बारे में जानते हैं, उस पर विश्वास करते हैं और उसका सम्मान करते हैं. उन्हें वैक्सीन भंडारण की आवश्यकताओं के बारे में पता होता है और क्लिनिक में उनके पास ये सुविधा भी होती है. टीकाकरण के बाद साइड इफेक्ट की पहचान के साथ उसे मैनेज करने की ट्रेनिंग भी उनके पास होती है. एक बाल रोग विशेषज्ञ को दो से तीन पीढ़ियों का विश्वास हासिल होता है और वैक्सीन पर उनके विचार लोग सुनते हैं और स्वीकार भी करते हैं. बाल रोग विशेषज्ञ टीकाकरण के प्रयासों को कई तरीकों से बढ़ा सकते हैं, वे क्लीनिक में टीकाकरण सेवाएं दे सकते हैं.

साथ ही प्राथमिक या माध्यमिक टीकाकर्मी के रूप में उच्च टीकाकरण लक्ष्यों को पूरा करने में सरकार के प्रयासों को गति दे सकते हैं. बाल रोग विशेषज्ञों का ये काम प्रतिदिन का है और वे वैक्सीन के सबसे बड़े समर्थक हो सकते हैं, इसलिए वैक्सीन लगवाने में लोगों की हिचक को प्रभावी तरीके से दूर कर सकते हैं. बाल रोग विशेषज्ञ 'प्राइम इम्यूनाइजर' हैं, जो टीकों के बारे में मरीजों की किसी भी चिंता को दूर करने के तरीकों से अच्छी तरह वाकिफ हैं.

बाल रोग विशेषज्ञों का प्रस्ताव

बाल रोग विशेषज्ञों की अकादमी ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन को पत्र लिखकर टीकाकरण अभियान में सहयोग देने का प्रस्ताव रखा है. ये मामला लोकसभा में भी उठा और पूरे देश में इस पर चर्चा हो रही है. 30 राज्यों, 337 शहरों और जिला स्थित शाखाओं में 30 हजार से ज्यादा बाल रोग विशेषज्ञ अकादमी के सदस्य हैं, जो देश के हर कोने में अपनी पहुंच रखते हैं. समर्पित और प्रशिक्षित बाल रोग विशेषज्ञों की जनशक्ति का उपयोग कोरोना वायरस टीकों के लिए जनसंख्या कवरेज को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है. जैसे हर बाल रोग विशेषज्ञ को वैक्सीन की एक हजार खुराक आवंटित की जाए और उन्हें अपनी सेवाओं से जुड़े लोगों का टीकाकरण करने को कहा जाए. इसमें बच्चों के माता-पिता हो सकते हैं, जो चिकित्सक की सेवाएं ले रहे होंगे. जोकि रातों रात कोरोना वायरस टीकाकरण में गेमचेंजर हो सकता है. इसमें किसी तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर और ट्रेनिंग की भी जरूरत नहीं है.

भरोसे का दूसरा नामः बाल रोग विशेषज्ञ

छोटे बच्चों के माता-पिता टीकाकरण के लिए बाल रोग विशेषज्ञ पर भरोसा करते हैं, ऐसे में एक और वैक्सीन लगवाने में उन्हें ज्यादा सोचना नहीं पड़ेगा. दरअसल टीकाकरण में हिचक रहे लोगों को भरोसा दिलाने के लिए बाल रोग विशेषज्ञ शब्द ही काफी हो सकता है. महामारी को रोकने के लिए सुरक्षित वैक्सीन की बड़ी संख्या काफी मददगार हो सकता है. कोरोना वायरस संक्रमण के खिलाफ लड़ाई में संतुलन हासिल करने के लिए भारत कई चुनौतियों का सामना कर रहा है, लेकिन एक बड़ी आबादी का तेजी से टीकाकरण करके महामारी को काबू में किया जा सकता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज