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OPINION: JNU के बहाने उच्च शिक्षा का प्रश्न

News18Hindi
Updated: November 19, 2019, 6:00 PM IST
OPINION: JNU के बहाने उच्च शिक्षा का प्रश्न

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  • Last Updated: November 19, 2019, 6:00 PM IST
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(रामानंद)

JNU में पिछले कई दिनों से विरोध प्रदर्शन चल रहा है. प्रमुखता से यह विरोध प्रदर्शन हॉस्टल के शुल्क को लेकर है. विश्वविद्यालय प्रशासन फीस में जो बढ़ोतरी की है वह वहां के छात्रों को को स्वीकार्य नहीं और वह इसको लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहें हैं. विश्वविद्यालय प्रशासन ने गतिरोध खत्म करने के लिए आशिंक राहत दी मगर वह छात्रों को स्वीकार नहीं हुई. इस विरोध प्रदर्शन के दौरान कई लोगों से दुर्व्यवहार की घटना भी सामने आई, जिसमें वहां की एक महिला प्राध्यापक को बंधक बनाया गया तथा स्वामी विवेकानंद की मूर्ति को नुकसान पहुचाने की कोशिश हुई.

इस पूरी घटना को शिक्षा की सुलभता से जोड़ने की कोशिश हुई है. छात्रों का कहना है कि शिक्षा लोगों को सुलभ होनी चाहिए जिससे आम छात्र शिक्षा ग्रहण कर सकें. इस आलोक में देखा जाए तो एक रूम की फीस में 10 रुपये से 300 रुपये की बढ़ोतरी एक बड़ी बढ़ोतरी है. लगभग 30 फीसदी की वृद्धि मगर इसको अलग दृष्टि से देखें तो यह 290 रुपये की बढ़ोतरी ही है. यह विरोध प्रदर्शन और यह प्रकरण एक गंभीर सवाल खड़ा करता है कि भारत जैसे देश में जहां शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का एक बड़ा माध्यम हैं वहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलने में लगातार बाधाएं क्यों आ रही हैं? अगर शिक्षा से सामाजिक गतिशीलता आ रही है तो क्यों नहीं सरकारें सबसे ज्यादा ध्यान इस क्षेत्र पर लगा रही हैं? क्या इसको न करने के पीछे कोई दबाव हैं या कोई और बात?


एक बात यह भी ध्यान में आती हैं की अगर बात शिक्षा की सर्वसुलभता को लेकर है तो JNU को ही क्यों विशेष लाभ मिले? क्यों न यह लाभ सुदूर क्षेत्र के विश्वविद्यालयों को मिले जिनमें ग्रामीण क्षेत्र और आदिवासी और वंचित समाज से लोग पढ़ने आते हैं. JNU को मीडिया में ज्यादा तवज्जो मिलने का कारण इसका राजधानी में होना और इसके छात्रों का विभिन्न पार्टियों और प्रसासनिक सेवाओं में होने के कारण है. मगर इन सब कारणों के बावजूद यह विरोध प्रदर्शन कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न अवश्य उठाता है.

JNU में फीस बढ़ाने को लेकर प्रदर्स चल रहा है.


शिक्षा फ्री होने और सबको सुलभ होने के लिए जब भी हम तर्क देते हैं तो हमारे तर्क तुलनात्मक होते हैं. वह यूरोपीय और अमेरिका के शिक्षा व्यवस्था से तुलना कर रहे होते हैं. आजादी के बाद से ही हमारी शिक्षा व्यवस्था के सुधार की दिशा तुलना के आधार पर तय होती रही है. हमारी चर्चाओं में अक्सर स्वीडन, नॉर्वे और जापान की शिक्षा व्यवस्था की बात होती है. मगर यह तुलना करते समय हम भारत की जनसंख्या और संसाधन दोनों की चर्चा नहीं करते है. जिन देशों जैसी हम अपनी शिक्षा व्यवस्था बनाना चाहते हैं उन देशों की जनसंख्या हमारे देश के एक शहर की जनसंख्या के लगभग बराबर ही है. जबकि उनके संसाधन हमारे देश के कई गुना. इसलिए अगर हमें सबको शिक्षा और अच्छी शिक्षा देनी है तो हमें अपनी प्राथमिकता तय करनी होंगी कि हमें किस स्तर की शिक्षा पर ज्यादा ध्यान है?

भारत जहां 30% लोग गरीबी रेखा से नीचे और बुनियादी संसाधनों से वंचित हैं वहां हमें अपने संशाधनो को मितव्ययिता से ही खर्चा करना होगा. इसलिए हमें शिक्षा में स्कूली शिक्षा पर ज्याद खर्च करना है या उच्च शिक्षा पर इस पर चर्चा करनी होगी. देश में सरकारी स्कूलों की उपलब्धता सभी जगहों पर हैं मगर गुणवत्ता के आभाव में उनमे छात्रों की संख्या में लगातार कमी हो रही हैं. गुणवत्ता पर काम करते हुए हम स्कूली शिक्षा को आगे बढ़ा सकते हैं. देश में 2009 के शिक्षा के अधिकार कानून के तहत पहले से ही आठवीं तक मुफ्त शिक्षा का प्रावधान है, उसको 12वीं तक करना चाहिए.
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भारत में अभी तक लगभग 799 विश्वविद्यालय (AISHE-2015) हैं, जिनमें सरकारी और निजी दोनों शामिल हैं. भारत में 39,071 महाविद्यालय हैं जिनमें निजी और सरकारी दोनों शामिल हैं. इन सबके बावजूद भारत की बहुत बड़ी आबादी उच्च शिक्षा से महरूम है जिसका कारण उच्च संस्थानों का अभाव और गुणवत्त दोनों हैं. भारत ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन के अनुसार भारत को अभी 700 और विश्वविद्यालय तथा 35000 और महाविद्यालयों की आवश्यकता हैं, जो वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार पूरी कर पाना अत्यंत मुश्किल है. भारत सरकार ने पहले ही आई आई टी और आई आई एम जैसे संस्थानों में निजी क्षेत्रों से मदद लेना प्रारंभ कर दिया हैं जो भारत की संसाधनगत समस्याओं के बारें हमें बताता है.


विश्व के अन्य देशों जिनकी आबादी हमारे देशों से तुलना के लायक हैं वहां उच्च शिक्षा मुफ्त नहीं हैं. उच्च शिक्षा की सुलभता आवश्यक है. उसकी गुणवता भी आवश्यक है. मगर भारत जैसे देश में जहां लोग अभी भी बुनियादी आवश्यकताओं के आभाव में मर रहे हों वहां उच्च शिक्षा को पूर्णतः मुफ्त करना तर्कसंगत नहीं है. ऐसे संस्थान जिसमें राष्ट्रीय सरोकार के विषयों का अध्यन हो रहा हैं या उन पर शोध हो रहा हो वह सरकारी होने चाहिए इसके अलावा सभी संस्थाओं में तर्कसंगत शुल्क होना चाहिए. शुल्क लगाते समय गरीबी रेखा से नीचे का मापदंड या अन्य संवैधानिक प्रावधानों का भी पालन हो. और नियमों का पालन सभी संस्थान करें इसका प्रयास हो. कोई संस्थान केवल विरासत के कारण ही लाभ न पायें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए.

(रामानंद, नई शिक्षा नीति में सलाहकार रहे हैं, अभी यह दिल्ली विश्वविद्यालय, शिक्षा संकाय में में रिसर्च स्कॉलर हैं तथा सेंटर ऑफ पॉलिसी रिसर्च एंड गवर्नंस के निदेशक हैं. यह लेखक के निजी विचार हैं.)

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First published: November 19, 2019, 5:48 PM IST
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