OPINION: अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर ट्विटर भारत के खिलाफ जंग छेड़ रहा है

सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि बड़े-बड़े डाटा तक पहुंच और उसे खंगालने के जरिए यह गैर निर्वाचित, गैर जिम्मेदार संस्थाएं आसानी यह पता लगा सकती हैं कि लोग क्या सोच रहे हैं. (सांकेतिक तस्वीर: Shutterstock)

सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि बड़े-बड़े डाटा तक पहुंच और उसे खंगालने के जरिए यह गैर निर्वाचित, गैर जिम्मेदार संस्थाएं आसानी यह पता लगा सकती हैं कि लोग क्या सोच रहे हैं. (सांकेतिक तस्वीर: Shutterstock)

Twitter-Government Row: इसे आप टेक-सामंतवाद नहीं कहेंगे, अंधकार युग में लौटना नहीं कहेंगे, तो क्या कहेंगे. इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो जब निजी कंपनियां या व्यवसायी किसी देश या कानूनी संस्था से ज्यादा ताकतवर हो जाएं.

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(अभिजीत अय्यर-मित्रा)

नई दिल्ली. माग्नाकार्टा (Magna Carta) के बारे में जानते हैं? इंग्लैंड का एक कानूनी परिपत्र जिसे आज़ादी का दस्तावेज़ माना जाता था. एथेंस और महाजनपद की लोकतांत्रिक व्यवस्था के ढह जाने के 1500 साल बाद आए माग्नाकार्टा द्वारा ब्रिटिश संविधानवाद और आज़ादी का दावा किया गया और लोगों में उम्मीद जगाई. लेकिन सब बकवास – दरअसल माग्नाकार्टा के बहाने अंग्रेज जनता का और ज्यादा शोषण होने लगा, रसूखदारों की लूट बढ़ गई, सामंतवाद बढ़ गया और नतीजा – दो गृहयुद्ध और विदेशी ताकत का ब्रिटेन पर बड़ा आक्रमण जिसने सब कुछ बर्बाद कर दिया, लाखों लोग मारे गए, नरसंहार हुआ और यह सब कुछ आज़ादी और लोकतंत्र के नाम पर हुआ.

आज भारत भी ऐसे ही हालात से गुज़र रहा है. आज़ादी के नाम पर एक पक्षपाती, बिकाऊ और लालची विदेशी कंपनी ने भारत सरकार (Indian Government) के खिलाफ एक तरह की जंग छेड़ दी है और यह काम हो रहा है – अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर. यह कंपनी है ट्विटर जिसका इतिहास ही अस्पष्टता, पक्षपात, गुटबाज़ी और उन विचारों को दबाने का रहा है जो उसके अनुकूल नहीं होते. इसके बावजूद हमें बताया जा रहा है कि भारत सरकार से ज्यादा अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में स्थित यह छोटी सी कंपनी, 90 करोड़ वोटरों की भलाई चाहती है. दिलचस्प यह है कि हमारी अभिव्यक्ति की आज़ादी को 12 हज़ार किलोमीटर दूर बैठी इस कंपनी से कहीं ज्यादा खतरा एक चुनी हुई सरकार से है. जबकि खुद इस कंपनी के भारत स्थित दफ्तर में शायद ही कोई ऐसा सशक्त कर्मचारी हो जो अपनी बात खुलकर रख सके.

इसे आप टेक-सामंतवाद नहीं कहेंगे, अंधकार युग में लौटना नहीं कहेंगे, तो क्या कहेंगे. इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो जब निजी कंपनियां या व्यवसायी किसी देश या कानूनी संस्था से ज्यादा ताकतवर हो जाएं. यह सामंतवाद तो अपने मध्यकालीन दौर के रूप से कहीं ज्यादा खतरनाक है जहां किसी एक के हाथ में जरूरत से ज्यादा ताकत है, जो निजी स्वतंत्रता के लिए खतरा है और बेहद घातक है. ज़रा सोचिए, आज की टेक कंपनियों की आय कई देशों की जीडीपी के जोड़ से भी कहीं ज्यादा है. पहले एक या दो बड़ी कंपनियां हुआ करती थीं लेकिन टेक बूम के बाद से तो कुछ कंपनियों की लिस्टिंग 2 लाख करोड़ डॉलर से ऊपर है, कम से कम 10 की लिस्टिंग 1 लाख करोड़ से ऊपर और करीब 100 से कहीं ज्यादा कंपनियों की लिस्टिंग 10 हज़ार करोड़ डॉलर से ऊपर है. कुल मिलाकर इतिहास में आज तक किसी गैर सरकारी या गैर निर्वाचित हाथों में इतना अकूत धन नहीं आया है.
सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि बड़े-बड़े डाटा तक पहुंच और उसे खंगालने के जरिए यह गैर निर्वाचित, गैर जिम्मेदार संस्थाएं आसानी यह पता लगा सकती हैं कि लोग क्या सोच रहे हैं – यह जानकारी लोगों के रवैये पर नज़र रखने के तो काम आती ही है, साथ ही ऐसे जटिल और गूढ़ मनोविज्ञान में बड़े स्तर पर निवेश करने में मदद करती है जिससे आप लोगों की सोच को प्रभावित कर सकते हैं या एक विशेष तरह के रवैये के लिए उन्हें उकसा सकते हैं. डाटा की इस हद तक पहुंच सुनने में डरावनी नहीं लगती लेकिन जब आप इसे तकनीक पर हमारी निर्भरता, डाटा एकत्रीकरण और भीड़ के मनोविज्ञान के साथ जोड़कर देखते हैं तो नतीजे भयावह हो सकते हैं.

टर्मिनेटर जैसी फिल्में 'singularity' यानी विशिष्टता की बात करती हैं जिसका मतलब है एक वक्त जब मशीन जागरूक होकर पूरी दुनिया को अपने कब्ज़े में ले लेंगी. असलियत यह है कि कंपनियों और निजी हितों ने इस 'singularity' को हासिल कर लिया है – जहां दौलत, डाटा, ताकत और मनोविज्ञान पर उनकी पकड़ इस हद तक है कि वह धीरे धीरे सरकार जैसी प्रणाली के लिए खतरा बनती जा रही हैं. खैर, कोई नहीं जानता कि हमारे हिस्से कैसा आतंकी भविष्य है लेकिन इतना सब जानते हैं कि ऐसा भविष्य हमें कई सदी पीछे ले जाएगा, जहां क्षेत्रीय लड़ाई, सामाजिक विवाद, नरसंहार होगा, जहां हिंसा पर सरकार के एकाधिकार और हर तरह की कानूनी सुरक्षा के लिए कोई जगह नहीं होगी.

आपको मेरी बात पर यकीन नहीं है तो बताइए किस तरह ब्लैकबेरी का बीबीएम, 2011 के लंदन दंगों के लिए अप्रमाणिक तौर पर जिम्मेदार रहा? क्या उसी साल तहरीर चौराहे पर हुई घटनाओं और उसके बाद गिरी सरकार के लिए ट्विटर अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार नहीं था. ट्विटर तो इस बात को खुशी-खुशी स्वीकार भी करता है. सोचिए कि किस तरह सोशल मीडिया पर गुटबाज़ी की वजह से ऐसी विचारधारा को बढ़ावा मिला जिसके बाद ब्लैक लाइव्स मैटर और अंटिफा जैसे हिंसक आंदोलन खड़े हुए. ऐसा कैसे होता है कि इन समूहों की आलोचना करने वालों को तमाम मंचों पर सेंसर कर दिया जाता है.



कई लोग 1994 के नरंसहार के लिए रेडियो रवांडा को जिम्मेदार तो बता देते हैं लेकिन कितनी आसानी से सोशल मीडिया द्वारा पैदा की जा रही सामाजिक दरार को नजरअंदाज कर देते हैं. ऐसा क्यों होता है कि जो लोग निजी आज़ादी के हनन पर चीखोपुकार करते हैं, वही लोग सोशल मीडिया के जज, ज्यूरी बन जाने, उसके द्वारा खुद को भारतीय कानून से ऊपर समझने और कई बार तो भारतीय कानूनी संस्थानों के साथ सहयोग न करने पर खुश होते हैं, सोशल मीडिया की पीठ थपथपाते हैं.

सोशल मीडिया की बढ़ती पहुंच और उसकी वजह से सामाजिक दरार के बढ़ने का सीधा संबंध और सीधे सबूत होने के बावजूद हम कमायत के लिए जिम्मेदार इस जरिए पर लगाम नहीं कस पा रहे हैं. आखिर यह कब होगा, कब समाज को अपने इशारों पर नचाने और प्रभावित करने वाली इनकी क्षमता पर नकेल कसी जाएगी.

ऐसा नहीं है कि सरकारें दोषमुक्त हैं और भारत जैसे देश में जहां शासन-व्यवस्था लचर हैं, वहां कानूनी संस्थानों पर लोगों का भरोसा कम ही है. लेकिन इसके बावजूद लोगों को इन पाखंडी विदेशी कंपनियों से ज्यादा भरोसा अपनी शासन प्रणाली पर है, फिर वो कमज़ोर ही सही. ट्विटर और सरकार के बीच के इस विवाद को महज़ कानूनी लड़ाई समझने की गलती न करें, यह उससे कहीं बड़ी लड़ाई का हिस्सा भर है जिसका असर लंबे दौर में मानवजाति पर पड़ता दिखाई देगा. इस लड़ाई में एक तरफ है अंधकार से भरा भविष्य और दूसरी तरफ है नियंत्रण और संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी कदम. अगर हमने इन कदमों को उठने से रोका तो हम भारत को खींचकर ब्रिटेन की उस 13वीं शताब्दी वाली हालत में ले जाएंगे जहां आज़ादी और लोकतंत्र का झांसा देकर लोगों को नरक में ढकेल दिया गया.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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