ANALYSIS: आंध्र में नायडू दोहराएंगे इतिहास या होगी जगन की जीत?

आंध्र प्रदेश में कुछ ही दिनों बाद चुनाव के लिए नामांकन की समयसीमा समाप्त होने वाली है और दोनों ही पार्टियों के नेता राज्य में चुनाव लड़ने वाले नेताओं की सूची को अंतिम रूप देने में लगे हैं.

News18Hindi
Updated: March 16, 2019, 7:56 AM IST
ANALYSIS: आंध्र में नायडू दोहराएंगे इतिहास या होगी जगन की जीत?
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू
News18Hindi
Updated: March 16, 2019, 7:56 AM IST
(पीवी रमन कुमार)

विधानसभा और संसदीय चुनाव से पहले आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा), वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी) दोनों के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति है. राज्य में कुछ ही दिनों में चुनाव के लिए नामांकन की समय सीमा समाप्त होने वाली है और दोनों ही पार्टियों के नेता राज्य में चुनाव लड़ने वाले नेताओं की सूची को अंतिम रूप देने में लगे हैं.

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू राज्य में सत्ता में लौटने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं. आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद तेदेपा सत्ता में आई और चंद्रबाबू नायडू विभाजन के बाद आंध्र प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने. साल 2014 में लोगों के बीच उनकी छवि एक अनुभवी नेता की थी और संयुक्त आंध्र प्रदेश के नौ साल तक मुख्यमंत्री रहने के दौरान उन्होंने राज्य में विकास की कई योजनाओं को पूरा किया. हैदराबाद को आईटी हब बनाने में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई.



लोगों ने सोचा कि उनका यह अनुभव आंध्र के विकास में मदद देगा और उसकी राजधानी को वे विश्वस्तरीय शहर बनाएंगे. चंद्रबाबू नायडू कहते हैं, “मैंने आपके लिए काम किया. मुझे अपना वोट देकर सत्ता में वापस कीजिए’. वे पार्टी के संस्थापक एनटी रामाराव की तरह स्वाभिमान की भावना को भुनाना चाहते हैं. 29 मार्च 1982 को दिग्गज अभिनेता एनटी रामाराव ने आंध्र के लोगों के स्वाभिमान की सुरक्षा के लिए एक नई पार्टी का गठन किया था. पार्टी की घोषणा हैदराबाद के न्यू एमएलए क्वार्टर्स में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में की गई. पार्टी की स्थापना की घोषणा करने के तुरंत बाद उन्होंने विशेष रूप से बनाए गए ‘चैतन्य रथ’ पर सवार होकर पूरे आंध्र प्रदेश का दौरा शुरू कर दिया. अपनी इस वैन पर उन्होंने लिख रखा था ‘तेलुगु देसम पिलुस्टोंडी…रा…कदाली रा’ जिसका अर्थ हुआ ‘आओ, तेलुगु देशम आपको बुला रहा है’.

इसे भी पढ़ें :- पीसी चाको की शीला दीक्षित को दो टूक, कहा- कई नेता AAP से गठबंधन के पक्ष में

तेलुगु स्वाभिमान और लोगों की समस्याएं एनटी रामाराव के मुख्य चुनावी एजेंडा थे. एनटीआर के भाषणों ने लोगों को मंत्रमुग्ध किया. ये वही एनटीआर थे जिन्हें आंध्र के लोगों ने भक्ति फ़िल्मों जैसे राम, कृष्ण और दुर्योधन आदि में देखा था. लोगों को लगा कि एनटीआर के रूप में भगवान ख़ुद उनसे मुख़ातिब हैं और उनसे बात कर रहे हैं. ‘लोग देवता हैं और समाज मंदिर है’, ‘तेलुगु स्वाभिमान’ जैसे नारे उनके भाषणों के नारे होते थे. वे जहां भी जाते, लोगों की भीड़ उनका पीछा करती पहुंच जाती. लोग कई-कई दिनों तक एनटीआर के आने की प्रतीक्षा करते.

एनटीआर ने अपना सारा समय जनता के बीच बिताया. खाना, सोना, नहाना, वे सब कुछ जनता के बीच करते. उन्होंने आंध्र परदेश के चप्पे-चप्पे की यात्रा की और रिकॉर्ड नौ महीने के अंदर सरकार बनाने में सफल रहे. एनटीआर 9 जनवरी 1983 को मुख्यमंत्री बने जो कि राज्य की पहली ग़ैर-कोंग्रेसी सरकार थी. तेदेपा को विधानसभा की कुल 294 सीटों में से 199 सीटें मिलीं. कांग्रेस को 60, सीपीआई को 4, सीपीएम को 5 और बीजेपी को तीन सीटें मिली.
Loading...

'निस्सन्देह, मामला स्वाभिमान का है. कांग्रेस पार्टी ने पांच सालों में चार मुख्यमंत्री बदले. अज्नैया जैसे मुख्यमंत्री को हवाई अड्डे पर अपमानित किया गया. आंध्र की जनता कांग्रेस नेतृत्व के व्यवहार के बारे में गंभीरता से विचार कर रही है. एनटीआर ने नई पार्टी बनाई और वे सफल रहे'
, प्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक इनगंती वेंकट राव ने न्यूज़ 18 से बातचीत में यह कहा.

इसे भी पढ़ें :- पीअलका लांबा ने कांग्रेस में वापसी की जताई थी इच्छा, पीसी चाको बोले- स्वागत है आपका

उन्होंने यह भी कहा कि 1980 के दशक में पहली बार बीजेपी का एक उम्मीदवार विशाखपत्तनम का मेयर बना और राज्य में हुए उपचुनावों में जनता पार्टी के चार विधायक चुनाव जीतने में सफल रहे. यह स्पष्ट था कि राज्य की जनता कांग्रेस के ख़िलाफ़ सोच रही है. कुछ ही समय में एनटीआर ने अपने प्रशासन की एक विशेष शैली विकसित की. पारदर्शिता, भ्रष्टाचार से मुक्ति, लोक कल्याण आदि को वरीयता दी गई. 10 बेटे होने के बावजूद उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को कभी भी प्रशासन में हस्तक्षेप की अनुमति नहीं दी. उन्होंने किसी भी तरह की खेमेबंदी को स्वीकार नहीं किया.

विपक्ष उनकी यह कहकर आलोचना करता था, “वह राजनीतिक के बारे में जानते क्या हैं, उनका पूरा समय तो मेकअप और अभिनय में जाता है”.जन कल्याण के क्षेत्र में उन्होंने अपनी छाप छोड़ी. वे हमेशा ही ग़रीबों की चिंता करते थे. हर योजना में आम लोगों का कल्याण उनका अंतिम ध्येय था. इन्हीं कारणों से वे एक महान नेता बन सके. एनटीआर ने कई तरह के लोकप्रिय योजनाओं की शुरुआत की - जैसे दो रुपए किलो चावल, जनता कपड़ा आदि. उन्होंने इन योजनाओं को नहीं छोड़ा और अपने तीनों कार्यकाल तक इनको चलाया.

एनटीआर ने पिछड़ी जाति को आरक्षण देने की शुरुआत की. ग़रीबों के लिए पक्का घर बनवाया, बस स्टैंड बनवाए, पटेल और पटवारी की व्यवस्था और तालुक़ा की व्यवस्था को समाप्त किया. उन्होंने मंडल परिषदों और ज़िला परिषदों की व्यवस्था को सरल बनाया. उन्होंने चेन्नई को पेय जल मुहैया कराने के लिए ‘तेलुगु गंगा परियोजना’ शुरू की. कृषि क्षेत्र को मदद पहुंचाने के लिए किसानों को कम दर पर बिजली उपलब्ध कराई गई और बाज़ार का निर्माण किया गया.

कल्याणकारी योजनाओं के अलावा, एनटीआर ने सिंचाई परियोजनाओं के निर्माण को प्राथमिकता दी, प्रशासन में तेलुगु भाषा को वरीयता दिया और सांस्कृतिक स्मारकों के संरक्षण को बढ़ावा दिया. उनकी वेशभूषा विशुद्ध रूप से तेलुगु शैली का धोती और कंडुवा था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी आंध्र प्रदेश में क्षेत्रीय पार्टी की जीत को पचा नहीं पाईं. उन्होंने नादेला भास्कर राव को शह दिया. राजनीतिक जोड़तोड़ के कारण एनटीआर की सरकार अल्पमत में आ गई और आंध्र प्रदेश के राज्यपाल ने नादेला भास्कर राव को 1984 में राज्य का नया मुख्यमंत्री बना दिया.

कांग्रेस पार्टी के षड्यंत्र का मुक़ाबला करने के लिए एनटीआर ने लोकतंत्र अभियान को मज़बूत करने के लिए आंदोलन चलाया. वे 1985 में दुबारा सत्ता में लौटे. तेदेपा को राज्य विधानसभा में 202 सीटें मिली. एनटीआर ने 1985 से 1989 तक अपने दम पर इस शो को चलाया पर 1989 में उनको कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ा और सत्ता उनके हाथ से निकल गई. तेदेपा ने केंद्र की राजनीति में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. 1984 के चुनावों में कांग्रेस 404 सीट जीतकर सत्ता में वापसी की, लेकिन आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की लहर नहीं चली और तेदेपा को 30 संसदीय सीटों पर विजय मिली. तेदेपा संसद में पांच सालों तक मुख्य विपक्षी पार्टी की भूमिका में रही.

राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मुख्य भूमिका का निर्वाह करते हुए एनटीआर ने सभी ग़ैर-कांग्रेसी पार्टियों को साथ लाने सफल रहे और ‘राष्ट्रीय मोर्चा’ नामक नया राष्ट्रीय गठबंधन बनाने में महत्तवपूर्ण भूमिका निभाई. तेलुगु राज्यों की वर्तमान राजनीति में सक्रिय कई नेताओं ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत एनटीआर के अधीन ही की थी. साल 1991 में कांग्रेस पार्टी ने तेलुगु क्षेत्र के नेता पीवी नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री बनाया और उन्होंने राज्य के नांदयाल संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा, लेकिन तेदेपा ने इस चुनाव में अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं किया और राव बिना किसी विरोध के चुने गए.

एनटीआर ने 1993 में लक्ष्मी पार्वती नामक एक महिला से शादी की जो उनकी जीवनी लिख रही हैं. अपनी दूसरी शादी के कारण एनटीआर का उनके परिवार में काफ़ी विरोध हुआ. वर्ष 1994 के चुनावों में एनटीआर ने अपनी दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती के साथ मिलकर चुनाव प्रचार किया और राज्य विधानसभा का 213 सीट जीतकर वे सत्ता में वापस आए. इस चुनाव में कांग्रेस सिर्फ़ 26 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी थी.

चुनाव में अपने वादे के मुताबिक़ उन्होंने राज्य में शराबबंदी लागू की पर उनके परिवार में कलह शुरू हो गया था और उनका छोटा दामाद नर चंद्रबाबू नायडू तेदेपा के अध्यक्ष बने और बाद में तेदेपा विधायकों को अपने पक्ष में तोड़ लिया और वे 1 सितम्बर 1995 को आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए. चंद्रबाबू 1978 में कांग्रेस के टिकट पर पहली बार विधायक बने और 1980 में वे राज्य में मंत्री बने. इसके बाद उन्होंने एनटीआर की बेटी भुवनेश्वरी से शादी की .

“दो महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं - परिवार और पार्टी. पूरा परिवार दूसरी शादी और सत्ता के संकट के कारण एनटीआर के ख़िलाफ़ था. यही कारण था कि सभी विधायक चंद्रबाबू के साथ हो लिए,” ऐसा कहना है इनगंती वेंकट राव का. काफ़ी समय से बीमार एनटीआर की 18 जनवरी 1996 को मृत्यु हो गई. तेदेपा ने चंद्रबाबू के नेतृत्व में 1996 में संसदीय चुनाव जीते पर 2004 और 2009 के आम चुनावों में उसे सफलता नहीं मिली. पर 2014 में चंद्रबाबू चुनाव जीतने में सफल रहे और राज्य के विभाजन के बाद वे पहली बार राज्य का मुख्यमंत्री बने.  नायडू ने 1996 में सेक्यूलर फ़्रंट बनाकर देव गौड़ा को प्रधानमंत्री बनवाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इसके बाद वे बीजेपी से साथ चले गए और फिर अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री बनने में मदद की.

तेदेपा चंद्रबाबू के नेतृत्व में 1999 में भी बीजेपी के साथ मिलकर राज्य में सत्ता में आई पर 2004 में वह चुनाव हार गई. बाद में बीजेपी के साथ होने के बावजूद वे चुनाव जीतने में सफल नहीं हुए और फिर उन्होंने बीजेपी से अपना नाता तोड़ लिया. उन्होंने टीआरएस, भाकपा और माकपा से महागठबंधन के बावजूद चुनाव नहीं जीत पाए और फिर 2009 में और बीजेपी के साथ गठबंधन किया. 2014 में भी तेदेपा प्रमुख ने बीजेपी के साथ गठबंधन किया और सत्ता में उनकी वापसी हुई पर आंध्र को विशेष राज्य का दर्जा नहीं देने के कारण उन्होंने बीजेपी से नाता तोड़ लिया.

वर्ष 2002 में नायडू चाहते थे कि नरेंद्र मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री के पद से हटा दिया जाए जबकि 2014 में उन्होंने केंद्र में उनकी सरकार के साथ गठबंधन किया था. वर्ष 2014 में नायडू ने आंध्र प्रदेश के विभाजन के लिए कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराया पर अब सारे मतभेद भुलाकर वे 2019 के चुनावों के लिए मोदी सरकार के ख़िलाफ़ कांग्रेस के साथ गठबंधन कर रहे हैं. अब देखना होगा कि आगामी चुनावों में नायडू जीत का इतिहास दोहराएंगे या फिर वाईएसआरसीपी के जगनमोहन रेड्डी उन्हें इतिहास बना देंगे.

एक क्लिक और खबरें खुद चलकर आएंगी आपके पास, सब्सक्राइब करें न्यूज़18 हिंदी  WhatsApp अपडेट्स
Loading...

और भी देखें

पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...