बुखार होने पर यहां कोई नहीं खाता दवा, शरीर पर दांत काट कर होता है इलाज

मलकानगिरी (Malkangiri) जिले के हज़ारों कोया आदिवासियों (Koya Tribe) के लिए इस तरह का इलाज कराना कोई नई बात नहीं है क्योंकि उन्हें आधुनिक इलाज की सुविधा उपलब्ध नहीं है.

News18Hindi
Updated: August 14, 2019, 3:54 PM IST
बुखार होने पर यहां कोई नहीं खाता दवा, शरीर पर दांत काट कर होता है इलाज
इलाज कराती महिला
News18Hindi
Updated: August 14, 2019, 3:54 PM IST
(आनंद एसटी दास)

ओडिशा (Odisha) के मलकानगिरी (Malkangiri) की आदिवासी महिला दुले बेती का बुखार तीन दिन से नहीं उतर रहा था. लेकिन इलाज के लिए किसी अस्पताल (Hospital) में जाने की बजाय वह झाड़-फूंक करने वाले ओझा-गुनी के पास गई. इसने दुले के बुखार का इलाज करने के लिए कुछ झाड़-फूंक के बाद इस महिला के पूरे बदन पर अपने दांतों से काटा. जिसके निशान उसके पूरे बदन पर देखे जा सकते थे. पर 55 साल की इस महिला को इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा कि इस पुरुष गुनी कासा बेती ने बुखार का इलाज करने के लिए अपने दांत से उसकी पीठ, गर्दन, छाती, पेट और कंधे और अन्य हिस्सों पर काटा.

इलाज का वीडियो वायरल
मलकानगिरी जिले के हज़ारों कोया आदिवासियों (Koya Tribe) के लिए इस तरह इलाज कराना कोई नई बात नहीं है क्योंकि उन्हें आधुनिक इलाज की सुविधा उपलब्ध नहीं है. झाड़-फूंक वाले इस गुनी का इस आदिवासी महिला के बुखार का दांत काटकर इलाज करने के वीडियो में इस व्यक्ति ने दावा किया है कि उसने उसके बुखार का सफलता से इलाज किया है. लेकिन मंगलवार को लोगों में प्रचारित हुए इस वीडियो ने ओडिशा के लोगों को इसके ख़िलाफ़ आंदोलित कर दिया है.

क्या है इस वीडियो में 
दुले बेती मलकानगिरी जिले के आदिवासी बहुल उरमागुडा गांव की रहने वाली आदिवासी महिला है. उसका गांव मलकानगिरी के कालीमेला ब्लॉक में है. इस वीडियो में बेती अपने घर के बरामदे में अपनी झोपड़ी के सामने पांव पसारे बैठी हुई दिखाई देती है. यह गुनी अपने हाथ में मोर का पंख और चावल लिए हुए है और वह उस पर इलाज के परम्परागत तरीक़े का प्रयोग कर रहा है. एक अन्य महिला दुले की गर्दन को अपने हाथ से सीधी रखी हुई है और वह गुनी अपनी दांत से उसके शरीर पर काट रहा है जबकि एक अन्य व्यक्ति जो वहीं बैठा है यह सब चुपचाप देख रहा है.

परंपरागत इलाज
Loading...

“इस परंपरागत इलाज को तीन बार आज़माने से किसी का भी बुखार निश्चित रूप से ठीक हो जाएगा,” यह कहना था कासा बेती का जो दशकों से इस तरह का पारंपरिक इलाज करता आया है. स्थानीय आदिवासी उसे आदर से 'देसी डॉक्टर' या 'देसिया गुनिया' बुलाते हैं.

असरदार है इलाज!
दुले का पति डेबा बेती एक ग़रीब किसान है. उसने कहा कि गुनी के यहां ले जाने से उसकी पत्नी को बुखार से काफ़ी राहत मिली. डेबा बेती ने कहा, “मेरी पत्नी अब काफ़ी बेहतर महसूस कर रही है. मैं उसे कालीमेला के अस्पताल में किसी भी तरह नहीं ले जा सकता था. हम गांव वालों के पास पैसा नहीं है. डॉक्टर हमारे इलाक़े में नहीं आते हैं. सड़क भी अच्छी नहीं है.”

सरकार एक्शन ले
“इस तरह की झाड़-फूंक का मेडिकल चिकित्सा में कोई महत्व नहीं है. सरकार को चाहिए कि वो इस तरह की परिपाटी को समाप्त करने के लिए सख़्ती से काम ले क्योंकि यह उनकी जहालत से पैदा हुआ है. इस दूर-दराज़ के इलाक़े में रहने वाले आदिवासियों को विश्वसनीय स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराई जानी चाहिए,” यह कहना था रेशनलिस्ट प्रताप रथ का.

बेहद पिछड़ा इलाका
दक्षिण ओडिशा का मलकानगिरी ज़िला माओवादी गतिविधियों से ग्रस्त है. इस जिले के अधिकांश आदिवासी गांवों में ऐसी सड़कें नहीं हैं जो हर मौसम में उपयोग लायक हों. कोया आदिवासी मलकानगिरी जिले के कालीमेला, मोतू, पोड़िया, मलकानगिरी, कोरकोंडा और मथिली ब्लॉक में बड़ी संख्या में रहते हैं. पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ के सुकमा और बस्तर जिलों में और आंध्र प्रदेश के गोदावरी जिले में भी इनकी अच्छी ख़ासी संख्या है. कोया आदिवासी जो भाषा बोलते हैं उसमें तेलुगु भाषा के शब्द काफ़ी अधिक होते हैं.

ये भी पढ़ें:

टारगेट पूरा नहीं हुआ तो कर्मचारियों को मुर्गे का पिलाया खून!

अभिनंदन को वीर चक्र, मिंटी अग्रवाल को मिलेगा युद्ध सेवा मेडल
First published: August 14, 2019, 2:44 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...