भारत में मधुमेह की दवाओं और इंसुलिन की अत्यधिक बिक्री पर चिंता

मधुमेह रोगियों की ओर से ली जाने वाली दवाओं और इंसुलिन पर कराए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि नौ साल की अवधि में इंसुलिन की बिक्री में पांच गुना से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज़ की गयी.

भाषा
Updated: November 13, 2017, 6:47 PM IST
भारत में मधुमेह की दवाओं और इंसुलिन की अत्यधिक बिक्री पर चिंता
World Diabetes Day 2017 causes, symptoms and Treatment. (Image Source: Getty Images)
भाषा
Updated: November 13, 2017, 6:47 PM IST
मधुमेह रोगियों की ओर से ली जाने वाली दवाओं और इंसुलिन पर कराए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि नौ साल की अवधि में इंसुलिन की बिक्री में पांच गुना से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज़ की गयी. वहीं डायबिटीज की ओरल दवाओं में चार साल की अवधि में ढाई गुना की वृद्धि दर्ज़ की गयी. इनमें ख़ासतौर पर नयी दवाओं और इंसुलिन की बिक्री तेज़ी से बढ़ी है जिस पर चिंता जताई गयी है.

जानेमाने मधुमेह रोग विशेषज्ञ और नेशनल डायबिटीज ओबेसिटी एंड कॉलेस्ट्रॉल फाउंडेशन (एन-डॉक) के अध्यक्ष डॉ प्रो अनूप मिश्रा के नेतृत्व में देशभर में मधुमेह-रोधी ओरल दवाओं और इंसुलिन की बिक्री का अध्ययन किया गया और इस रोग की नयी दवाओं और इंसुलिन तथा पुरानी दवाओं के पैटर्न में बदलाव का आकलन किया गया.

14 नवंबर को विश्व मधुमेह दिवस के अवसर पर जारी अध्ययन की रिपोर्ट में ये बात सामने आई कि 2008 से 2012 के बीच इंसुलिन की बिक्री 151.2 करोड़ रुपए से 218.7 करोड़ रुपए हो गयी. 2012 से बढ़ते हुए 2016 में ये बिक्री 842 करोड़ रुपए के स्तर पर पहुंच गयी. यानी नौ साल में इसमें पांच गुना से अधिक वृद्धि दर्ज़ की गयी. इसकी मुख्य वजह रोगियों और डॉक्टरों में इंसुलिन के इस्तेमाल के प्रति निष्क्रियता में कमी आना रही. इसके साथ ही रोगियों की संख्या बढ़ना और कंपनियों का बढ़-चढ़कर किया जाने वाला प्रचार भी मुख्य कारणों में हैं.

इसी तरह गोलियों या कैप्सूल के रूप में ली जाने वाली मधुमेह-रोधी दवाओं की बिक्री भी तेज़ी से बढ़ी है. 2013 में ये बिक्री 278 करोड़ रुपए दर्ज़ की गयी जो 2016 में 700 करोड़ रुपए के स्तर पर पहुंच गयी.

अध्ययन में ये बात भी सामने आई कि डायबिटीज की वजह से किडनी की पुरानी बीमारियां भारतीयों में अधिक देखी जाती हैं और ऐसे मामलों की पहचान भी तेज़ी से हो रही है. इस वजह से भी इंसुलिन की उपयोगिता बढ़ती जा रही है.

अध्ययन में ऑल इंडियन ऑरिजिन केमिस्ट्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स लिमिटेड (एआईओसीडी) से आंकड़े लिए गए. फोर्टिस सी-डॉक हॉस्पिटल फॉर डायबिटीज एंड अलायड स्पेशलिटीज के चेयरमैन डॉ मिश्रा ने कहा कि ये आंकड़े इसलिए चिंताजनक हैं क्योंकि अधिकतर भारतीयों को डायबिटीज के इलाज के लिए बहुत ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है.

उन्होंने कहा कि भारत में चिकित्सकों को ध्यान रखना चाहिए कि केवल अधिक महंगी और नयी इंसुलिन तथा दवाएं हमेशा बेहतर नहीं होती और पुरानी दवाएं तथा इंसुलिन भी सही तरीके से इस्तेमाल में लाए जाएं तो प्रभावी हो सकते हैं. जिनके पास धन की कमी है, उनके लिए इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए.
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डॉ मिश्रा ने अपने अध्ययन के आधार पर नयी दवाओं की बिक्री और विपणन के नियमों के संदर्भ में दवाओं के दामों पर नियंत्रण, डॉक्टरों में जागरुकता और फार्मास्टयुटिकल कंपनियों के लिए सख्त नियमों का सुझाव दिया है.

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First published: November 13, 2017, 6:47 PM IST
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