आज़ादी स्पेशल: मेवात के लोगों को किस से चाहिए देशभक्ति का सर्टिफिकेट ?

इतिहास में ज़रा पीछे जाएं तो पता चलता है कि मेवात के 10 हजार बहादुरों ने अंग्रेजों के खिलाफ 1857 की आजादी की लड़ाई में अपनी जान हंसते-हंसते देश पर लुटा दी थी. शहीद होने वालों में से ज्यादातर मेव मुसलमान ही थे जिनसे आज देशभक्ति का 'सबूत' मांगा जा रहा है...

Ankit Francis | News18Hindi
Updated: August 14, 2018, 6:01 PM IST
आज़ादी स्पेशल: मेवात के लोगों को किस से चाहिए देशभक्ति का सर्टिफिकेट ?
(प्रतीकात्मक तस्वीर)
Ankit Francis | News18Hindi
Updated: August 14, 2018, 6:01 PM IST
पिछले कुछ सालों में हरियाणा के मेवात का नाम आपने किन वजहों से सुना था? देश के सबसे कम साक्षरता वाले इलाके के बतौर जहां रहने वाले पहलू खान, उमर मोहम्मद, तालिम और अकबर उर्फ रकबर को 'कथित गौरक्षा' के नाम पर पीट-पीट कर मार दिया गया. जिस इलाके को कुछ राइट विंग संगठन 'छोटा पाकिस्तान' कहकर भी प्रचारित करने लगे हैं.

हालांकि इतिहास में ज़रा पीछे जाएं तो पता चलता है कि यही वो इलाका है जहां अंग्रेजों के खिलाफ 1857 की आजादी की लड़ाई में मेवात के करीब 10 हजार बहादुरों ने अपनी जान हंसते-हंसते देश पर लुटा दी थी. शहीद होने वालों में से ज्यादातर मेव मुसलमान ही थे जिनसे आज उनकी देशभक्ति का 'सबूत' मांगा जा रहा है.

मेवात से क्यों नाराज़ रहे अंग्रेज ?
गुड़गांव गजेटियर के मुताबिक में मेव मुसलमानों ने साल 1800 के शुरूआती सालों से ही अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था. 1803 में अंग्रेज-मराठों के बीच हुए लसवाड़ी के युद्ध में मेव छापामारों ने दोनों ही सेनाओं को नुकसान पहुंचाया और लूटपाट की थी. अंग्रेज इससे काफी नाराज़ थे और तभी से मेवातियों को सबक सिखाने का मौका ढूंढ रहे थे.

साल 1806 में नगीना के नौटकी गांव के रहने वाले मेवातियों ने मौलवी ऐवज खां के नेतृत्व में अंग्रेज सेना को काफी नुकसान पहुंचाया. इस हार से अंग्रेज घबरा गए और दिल्ली के रेजीडेंट मिस्टर सेक्टन को सन 1807 में अपने अधिकारियों को एक ख़त के जरिए समझाया कि मेवातियों के साथ समझौता कर लेना चाहिए. हालांकि ये अंग्रेजों की चाल थी और वो सही वक़्त का इंतज़ार कर रहे थे, जो मौका उन्हें नवंबर 1857 में मिल गया.



1857 का स्वतंत्रता संग्राम और मेवात
भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े इतिहास के पन्नों को पलटे तो पता चलता है कि मेवात से ज्यादा खून शायद ही कहीं और बहाया गया हो. 1806 की लड़ाई के बाद से ही मेवात के किसानों पर अंग्रेजो के ज़ुल्म बढ़ने लगे थे. इतिहासकार एवं अखिल भारतीय शहीद सभा के राष्ट्रीय चेयरमैन सरफूद्दीन खान मेवाती बताते हैं कि 1842 में मेवात क्षेत्र का राजस्व 11 लाख 14 हजार रुपये आंका गया जो कि फसल उत्पादन के मुकाबले काफी ज्यादा था और खुद लार्ड कनींघम ने भी ये बात मानी थी. बताया जाता है कि 10 मई 1857 को चांद खान नामक मेवाती सैनिक ने अंग्रेजों पर गोलियां बरसा दी थीं. बाद में विरोध की यह आग पूरे देश में फैल गई.

महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी रोहतक से मेवात विद्रोह पर शोध कर चुकीं शर्मिला यादव का मानना है कि 20 सितंबर 1857 को अंग्रेजों ने दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया था और उनकी नज़र हरियाणा में मौजूत मेव विद्रोही खटक रहे थे. उनकी इस शोध के मुताबिक दिल्ली पर कब्जे के बाद पूरे एक साल तक अंग्रेजी सेना ने हरियाणा में दमन किया. 8 नवंबर 1857 को अंग्रेजों ने मेवात के सोहना, तावडू, घासेडा, राईसीना और नूंह सहित सैकड़ों गांवों में कहर बरसाया था.अंग्रेजों की कुमाऊं बटालियन का नेतृत्व लेफ्टिनेंट एच ग्रांट कर रहे थे, यह दस्ता कई गांवों को तबाह करता हुआ गांव घासेड़ा पहुंचा, जहां 8 नवंबर को घासेडा के खेतों में अंग्रेज और मेवातियों के बीच जबरदस्त लड़ाई हुई.



गांव घासेडा के 157 लोग शहीद हुए लेकिन जवाबी कार्रवाई में उन्होंने अंग्रेज अफसर मेकफर्सन का कत्ल कर दिया. 19 नवंबर 1857 को मेवात के बहादुरों को कुचलने के लिये बिग्रेडियर जनरल स्वराज, गुडग़ांव रेंज के सह उपायुक्त कली फोर्ड और कैप्टन डूमंड के नेतृत्व में टोहाना, जींद प्लाटूनों के अलावा भारी तोपखाना सैनिकों के साथ मेवात के रूपडाका, कोट, चिल्ली, मालपुरी पर जबरदस्त हमला बोल दिया. इस दिन अकेले गांव घासेड़ा के 425 मेवाती बहादुरों को बेरहमी से कत्ल कर दिया गया. इस दौरान अंग्रेजों ने मेवात के सैकड़ों गांवों में आग भी लगा दी. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस दौरान अंग्रेजों ने 3000 लोगों को फांसी या फिर गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया. हालांकि इतिहासकारों का मानना है कि इस दौरान 10000 से ज्यादा लोग शहीद हुए थे.

शहीदों के लिए मीनारें भी बनवाई गई हैं
1857 के गदर के इन शहीदों की याद में ही मेवात विकास प्राधिकरण ने 2007 में 12 गांवों में शहीद मीनारें भी बनवाने का काम शुरू किया था जिससे लोग अपने गौरवशाली अतीत को याद रख सके. हालांकि इन 13 स्मारकों में से सिर्फ 9 ही अभी तक बनकर तैयार हो सके हैं. इनमें से नगीना, फिरोजपुर झिरका, महूं-चौपड़ा, नूंह, दोहा-रावली, तावड़ू, उटावड़ में बन चुके हैं जबकि आकेड़ा, इंदाना, पिनगवां, पुन्हाना में अभी तक काम शुरू नहीं हुआ है. इतिहासकार मोहम्मद अरशद ने बताया कि रूपड़ाका गांव के 425 शहीदों की याद में साल 1983 के दौरान तत्कालीन सीएम भजन लाल, तत्कालीन सांसद चौधरी रहीम खां और तत्कालीन विधायक अजमत खान ने शहीद स्मारक बनवाया था.

देश का सबसे पिछड़ा जिला है मेवात
मार्च के आखिरी हफ्ते में नीति आयोग ने देश के सबसे पिछड़े 101 जिलों की सूची जारी की थी. इस लिस्ट के मुताबिक देश का सबसे पिछड़ा जिला मेवात है. बिहार के अररिया, छत्तीसगढ़ के सुकमा, उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती और तेलंगाना के असिफाबाद जैसे जिलों से भी पिछड़ा जिला है-मेवात. गौरतलब है कि हरियाणा का कोई और जिला इस 101 की सूची में कहीं नहीं है. अपनी इस सूची में हर जिले को शामिल करते वक्त नीति आयोग ने शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, बैंकिंग तथा वित्तीय सेवाओं और बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर के तमाम आंकड़ों को शामिल किया है. इस सबकी दृष्टि से मेवात को 26 प्रतिशत अंक मिले हैं. यानी कि अगर देश के सबसे विकसित जिलों से मेवात की तुलना की जाए तो वह विकास की तराजू में उनसे एक-चौथाई ही है.



शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों में मेवात की हालत दयनीय है. आज भी इस जिले में कुल साक्षरता सिर्फ 56 प्रतिशत है और महिलाओं में तो महज 36 प्रतिशत ही है. जिले के लगभग 70 प्रतिशत बच्चे एनीमिया यानी खून की कमी के शिकार हैं. सिर्फ 27 प्रतिशत बच्चों का टीकाकरण हुआ है. यहां का किसान मुश्किल से एक फसल ले पाता है और उसका भी दाम सही नहीं मिलता, मवेशी-पालन यहां के ग्रामीण जीवन का आधार रहा है. हरियाणा के किसी भी जिले की तुलना में यहां गौपालन ज्यादा होता है लेकिन लिंचिंग की घटनाओं के बाद वो भी ठप होने कि कगार पर है.

नाम बदलते रहे पर नहीं मिला रेलवे स्टेशन
गुड़गांव से अलग होकर हरियाणा का 21वां जिला बना था मेवात जिसे सरकारी फाइलों में अब नूहं के नाम से भी जाना जाता है. 2004 में इसका नाम बदलकर चौटाला सरकार ने सत्यमेवपुरम कर दिया था फिर साल 2005 में ही हुड्डा सरकार ने फिर से मेवात कर दिया लेकिन 2016 में खट्टर सरकार ने इसका नाम नूहं कर दिया. हरियाणा सरकार में मंत्री रहे आफताब अहमद बताते हैं कि इलाके के लोग सतलुज-यमुना लिंक नहर जिसे मेवात कैनाल और रेलवे स्टेशन का दशकों से इंतज़ार कर रहे हैं लेकिन किसी भी सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया.

स्थानीय लोगों का कहना है कि इलाके में बुनियादी चीजों जैसे पानी, बिजली और यातायात का भारी आभाव है. मेव समाज के अलावा मेवात जिले में अन्य 36 बिरादरियां भी हैं. लिंचिंग की घटनाओं से पहले तक इस इलाके में हिंदू-मुस्लिमों के आपसी संबंध काफी अच्छे रहे हैं और लोग रोजगार के अवसरों को लेकर ज्यादा चितिंत हैं. आफताब का मानना है कि मेव समुदाव स्वभाव से बगावती हैं और अक्सर किसी के भी वोट बैंक में फिट नहीं होते जिसके चलते सरकारें इनके विकास पर भी ध्यान नहीं देती.



गाय पालते हैं मेव मुसलमान
मेव समुदाय धार्मिक रूप से मुसलमान है लेकिन सांस्कृतिक रूप से हिंदू परंपराओं को भी मानते हैं. इनका गाय पालने से पुराना नाता है और इलाके में कई ऐसे परिवार हैं, जिनके पास 500 से हज़ार गायें अब भी हैं. यहां तक कि बेटियों की शादी में भी गाय देने का रिवाज है. 1 अप्रैल, 2017 गोतस्करी के आरोप में मेवात के मुस्लिम पशुपालक पहलू खान की पीट पीटकर हत्या कर दी गई, 12 नवंबर 2017 को मेवात के डेयरी किसान उमर मोहम्मद जबकि 6 दिसंबर 2017 को मेवात के गोव्यापारी तालिम हुसैन की मौत पुलिसिया कार्रवाई में हुई. 21 जुलाई 2018 को मेवात के ही रहने वाले गोपालक अकबर खान की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई जिसके बाद से यहां के लोगों में दहशत का माहौल है. बता दें कि मेवात के नगीना, झिमरावट, चादन, पाटखोरी जैसे कई मुस्लिम बहुल गांव हैं जहां परिवारों के पास 500 से हजार गायें हैं और वही उनके जीने का आधार है.

महात्मा गांधी ने मेवों को नहीं जाने दिया पाकिस्तान
इतिहासकारों के मुताबिक बंटवारे के दौरान खुद महात्मा गांधी ने मेवों को पाकिस्तान जाने से रोक लिया था. आजादी के बाद मेवातियों के साथ हो रहे अत्याचार और जबरदस्ती पाकिस्तान भेजने के मामले को लेकर यासीन खान खुद गांधी जी से मिले जिसके बाद वो खुद मेवों से मिलने 19 दिसंबर 1947 को मेवात के गांव घासेड़ा पहुंचे और सुरक्षा का आश्वासन दिया जिसके बाद यहां से पलायन नहीं हुआ.

मेव पंचायत के नेता शेर मोहम्मद बताते हैं कि राजनीतिक मकसद से कुछ ख़ास लोग मेव समाज को निशाना बना रहे हैं. हर मेव के घर में गाय है लेकिन हालात ऐसे बना दिए गए हैं कि बेचना तो छोड़ो कोई उनका इलाज कराने के लिए भी उन्हें घर से बाहर नहीं ले जा सकता. इससे अच्छा तो सरकार मुसलमानों के गाय पालने पर कानून बनाकर रोक लगा दे. हालांकि वो खुद भी मानते हैं कि इलाके में गाय तस्कर सक्रिय है और उन पर रोकथाम लगनी चाहिए.



मेवाती संगीत घराना
मेवात का अपना एक संगीत घराना भी है जिसकी पहचान दुनिया भर में है. सरफूद्दीन खान मेवाती बताते हैं कि मेवाती मुसलमान भी वहाबी धारा की जगह सूफी इसल्मी परंपरा के करीब है लेकिन बीते कई सालों में यहां बदलाव देखने को मिल रहा है. मेवाती संगीत घराने की नींव घग्गे नज़ीर खान ने डाली थी. मुस्लिम बहुल इलाके में पनपे इस संगीत घराने की गायकी में वैष्णव भक्ति का प्रभाव भी है इसके गायक आज भी गायकी की शुरुआत भजनों से ही करते हैं. बता दें कि पंडित जसराज इस घराने के मौजूदा सबसे बड़े कलाकार हैं. उनके आलावा पंडित संजीव अभ्यंकर भी इसी घराने से आते हैं.
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