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व्यापार पर चीन का प्रभुत्व खत्म करने के लिए भारत-ऑस्ट्रेलिया-जापान में हुए सप्लाई चेन समझौते से क्या होगा

वित्त वर्ष 2019 में जापान से भारत में आयात 12 साल में दोगुना से अधिक बढ़कर 12.8 बिलियन डॉलर हो गया है (सांकेतिक फोटो)

वित्त वर्ष 2019 में जापान से भारत में आयात 12 साल में दोगुना से अधिक बढ़कर 12.8 बिलियन डॉलर हो गया है (सांकेतिक फोटो)

संयुक्त मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (Joint Ministerial Conference) वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आयोजित किया गया था और इसमें ऑस्ट्रेलिया (Australia) के व्यापार, पर्यटन और निवेश मंत्री, भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल (Minister of Commerce and Industry Piyush Goyal) और जापान (Japan) के अर्थव्यवस्था, व्यापार और उद्योग मंत्री शामिल थे.

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    स्टीफन मनालेक

    नई दिल्ली. जापान (Japan) की ओर से भारत और ऑस्ट्रेलिया (Australia) को मिलाकर तीनों का एक फास्ट ट्रैकिंग सप्लाई चेन कॉपोरेशन (fast-tracking supply chain cooperation) बनाने का महत्वपूर्ण कदम 1 सितंबर, दिन मंगलवार को फलीभूत हुआ. इसकी बारीकियों को तय करने के लिए इन देशों ने अपने-अपने नौकरशाहों (bureaucrats) को कुछ ही महीने का समय दिया है. हालांकि जापान इस सौदे का नेतृत्व कर रहा है और हाल के दिनों में सप्लाई चेन (supply chain) के लिए भारत की चीन पर निर्भरता और चीन सीमा (Chinese Border) पर दिख रही चीनी आक्रामकता ने संयुक्त रूप से देश की चिंताएं बढ़ा दी हैं, जबकि वहीं ऑस्ट्रेलिया चीनी व्यापार प्रतिबंधों (Chinese trade restriction) से प्रभावित हो रहा है. ऐसे में ये तीनों ही देश बहुत ज्यादा "चीन पर व्यापार के लिए निर्भर" हैं. स्थिर हिंद महासागर (Indian Ocean) और प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में भी इनकी सीधी रुचि है.

    संयुक्त मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (Joint Ministerial Conference) वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आयोजित किया गया था और इसमें ऑस्ट्रेलिया (Australia) के व्यापार, पर्यटन और निवेश मंत्री, सीनेटर साइमन बर्मिंघम, भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल (Minister of Commerce and Industry Piyush Goyal) और जापान (Japan) के अर्थव्यवस्था, व्यापार और उद्योग मंत्री, काजीयामा हिरोशी शामिल थे.

    आपूर्ति श्रृंखला के लचीलेपन का क्या मलतब है?
    अंतरराष्ट्रीय व्यापार के संदर्भ में, आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन एक दृष्टिकोण है जो किसी देश को यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि उसने अपने आपूर्ति जोखिम को आपूर्ति करने वाले कई देशों को शामिल कर विविध बना दिया है, बजाय कि सिर्फ एक या कुछ देशों पर निर्भर होने के. जैसे इस मामले में, चीन पर निर्भर होने की बात है.

    भारत इससे क्या चाहता है?
    जबकि अमेरिका हाल ही में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन गया है. और अब भी चीन थोड़ा ही पीछे है- दोनों अर्थव्यवस्थाएं करीब हैं - शायद भारत की पसंद के करीब भी. फरवरी 2020 में भारतीय उद्योग परिसंघ द्वारा एक प्रभाव विश्लेषण के अनुसार, 2018 में भारत में आयात में चीन की हिस्सेदारी (चीन द्वारा आपूर्ति की जाने वाली शीर्ष 20 वस्तुओं पर) 14.5% थी. विश्लेषण से पता चला है, पैरासिटामोल जैसी दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं के लिए भारत पूरी तरह से चीन पर निर्भर है. इलेक्ट्रॉनिक्स में, चीन भारत के आयात का 45 प्रतिशत हिस्सा भेजता है.

    यह भी पढ़ें:- चीनियों को खदेड़ कर सेना ने पेंगोंग झील की सभी पहाड़ियों पर किया कब्जा- सूत्र

    चीनी आपूर्ति भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों पर हावी है. महामारी से उत्पन्न आपूर्ति श्रृंखला की समस्याओं से प्रभावित होने वाले क्षेत्रों में फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोटिव पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, शिपिंग, रसायन और वस्त्र शामिल हैं.

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