सीमा विवाद: भारत-चीन के लिए क्यों अहम है गलवान घाटी, जहां सैनिकों की हुई झड़प

सवाल उठ रहे हैं कि आखिर क्यों भारतीय सैनिकों ने गलवान घाटी में गोली नहीं चलाई (प्रतीकात्मक तस्वीर)
सवाल उठ रहे हैं कि आखिर क्यों भारतीय सैनिकों ने गलवान घाटी में गोली नहीं चलाई (प्रतीकात्मक तस्वीर)

चीन (CHINA) गलवान नदी घाटी के पूरे हिस्से को नियंत्रित नहीं करता तो भारत (india) नदी घाटी का इस्तेमाल अक्साई चिन पठार पर उभरने के लिए कर सकता था, इससे वहां चीनी पोजीशन्स के लिए खतरा पैदा होता.

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नई दिल्ली. भारत (India) और चीन (China) के बीच लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर एक बार फिर तनाव बढ़ गया है. लद्दाख सीमा (Ladakh Border) पर गलवान घाटी (Galvan Valley face off) के पास भारतीय सैनिक और चीनी सैनिकों के बीच सोमवार देर रात झड़प हो गई, जिसमें भारतीय सेना के एक अधिकारी और दो जवान शहीद हो गए. गौरतलब है कि पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी ऐसे सेक्टर्स में से एक है जो हाल में भारत और चीन की सेनाओं के बीच गतिरोध होने की वजह से सुर्खियों में हैं.

पैंगोंग सो में फिंगर क्षेत्र में सड़क को भारतीय जवानों के गश्त करने के लिहाज से अहम माना जाता है. भारत ने पहले ही तय कर लिया है कि चीनी विरोध की वजह से वह पूर्वी लद्दाख में अपनी किसी सीमावर्ती आधारभूत परियोजना को नहीं रोकेगा. दोनों देशों के सैनिक गत पांच और छह मई को पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग सो क्षेत्र में आपस में भिड़ गए थे. इस घटना में दोनों पक्षों के सैनिक घायल हुए थे. इस झड़प में भारत और चीन के करीब 250 सैनिक शामिल थे.

भारत और चीन के बीच 1950 से चल रहा विवाद



दरअसल, इस क्षेत्र को लेकर भारत और चीन के बीच 1950 से ही विवाद चल रहा है. सबसे अहम बात यह है कि 1962 के बाद पहली बार इस क्षेत्र में तनाव पैदा हुआ है, और वह भी तब जब एलएसी को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है और दोनों देशों की ओर से स्वीकार किया गया है. 1962 में चीन ने भारत पर अपनी पूर्वी और उत्तरी सीमाओं पर हमला किया था. अन्य फैक्टर्स के इस युद्ध के लिए बड़ी वजह शिनजिंयाग और तिब्बत के बीच सड़क का निर्माण था. यह राजमार्ग आज जी-219 के रूप में जाना जाता है. इस सड़क का लगभग 179 किलोमीटर हिस्सा अक्साई चिन से होकर गुजरता है, जो एक भारतीय क्षेत्र है. भारतीय सहमति के बिना सड़क निर्माण करने के बाद, चीन दावा करने लगा कि ये क्षेत्र उसका है.
कहां है ये इलाका और कब से है विवाद

चीन लगातार भारत के इलाके पर अपना अधिकार जताता रहा है. अक्साई चिन का ये इलाका तिब्बती पठार के उत्तर-पश्चिम में है. ये कुनलुन पर्वतों के ठीक नीचे का इलाका है. अगर ऐतिहासिकता में देखा जाए तो ये इलाका भारत को मध्य एशिया से जोड़ने वाले सिल्क रूप का हिस्सा था. सैंकड़ों सालों तक ये मध्य एशिया और भारत के बीच संस्कृति, बिजनेस और भाषा को जोड़ने का माध्यम रहा है. अक्साई चिन लगभग 5,000 मीटर ऊंचाई पर स्थित एक नमक का मरुस्थल है. इसका क्षेत्रफल 42,685 वर्ग किलोमीटर है. ये इलाका निर्जन है यहां स्थाई बस्तियां नहीं हैं.

1959 तक चीन का जो दावा था, उसकी तुलना में सितंबर 1962 (युद्ध से एक महीने पहले) में वह पूर्वी लद्दाख में और अधिक क्षेत्र पर दावा दिखाने लगा. नवंबर 1962 में युद्ध समाप्त होने के बाद चीनियों ने अपने सितंबर 1962 के दावे लाइन की तुलना में भी अधिक क्षेत्र पर कब्जा कर लिया. चीन अपने शिनजियांग-तिब्बत राजमार्ग से भारत को यथासंभव दूर रखना चाहता था. यही कारण है कि चीन ने अपनी दावा लाइन को इस तरह तैयार किया कि सभी प्रमुख पहाड़ी दर्रों और क्रेस्टलाइन्स पर उसका कब्जा दिखे.

पर्वत श्रृंखलाओं के बीच आने-जाने के लिए पहाड़ी दर्रों की जरूरत होती है, उन्हें कब्जा करके चीन चाहता था कि भारतीय सेना पश्चिम से पूर्व की ओर कोई बड़ा मूवमेंट न हो सके. गलवान नदी के मामले में उच्चतम रिजलाइन अपेक्षाकृत नदी (River) के पास से गुजरती है, जो श्योर रूट के दर्रों पर चीन (China) को हावी होने देती है. इसके अलावा, अगर चीनी गलवान नदी घाटी के पूरे हिस्से को नियंत्रित नहीं करता तो भारत नदी घाटी का इस्तेमाल अक्साई चिन पठार पर उभरने के लिए कर सकता था, इससे वहां चीनी पोजीशन्स के लिए खतरा पैदा होता.



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