LAC पर निगरानी के लिए इज़रायली ड्रोन का इस्तेमाल करेगी सेना, मिली मंजूरी

LAC पर निगरानी के लिए इज़रायली ड्रोन का इस्तेमाल करेगी सेना, मिली मंजूरी
इजराइली ड्रोन को तकनीकी रूप से काफी मददगार माना जाता है. तस्वीर- https://www.iai.co.il/p/heron-tp

केंद्र की मोदी सरकार ने एलएसी (LAC) पर चीनी सेना पीएलए (PLA) की किसी भी गलत हरकत का माकूल जवाब देने के अधिकार के साथ सैन्य और राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन (NTRO) को क्षेत्र में अधिक निगरानी ड्रोन तैनात करने के लिए कहा है.

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नई दिल्ली. भारत-चीन सीमा (India China Rift) पर हुए हालिया विवाद के बाद भारत की ओर से सीमा पर चौकसी पहले से भी ज्यादा कड़े करने के कदम उठाए जा रहे हैं. पूर्वी लद्दाख  (East Ladakh) में विवाद के बीच भारत ने इस क्षेत्र में ड्रोन निगरानी बढ़ा दी है. इसके साथ ही भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) ने इस क्षेत्र में और बटालियन्स को बुलाया है. 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर सेना की मदद के लिए यह कदम उठाए गए हैं. सरकार और सैन्य अधिकारियों ने इस मामले की जानकारी दी.

सेना की मदद के लिए ITBP की कुछ अतिरिक्त बटालियन्स की मौके पर मौजूदगी का निर्णय 20 जून को लिया गया था. जब DGMO लेफ्टिनेंट जनरल परमजीत सिंह और ITBP और BSF के महानिदेशक एसएस देसवाल ने जमीनी हालात के बारे में जानकारी दी. भारत सरकार के शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों को XIV कॉर्प्स कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह ने पीएलए (PLA) के साथ तनातनी की जानकारी दी थी.

IAI Heron Drone कर रहा सीमा पर निगरानी
मोदी सरकार ने एलएसी पर चीनी सेना पीएलए की किसी भी गलत हरकत का माकूल जवाब देने के अधिकार के साथ सैन्य और राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन (NTRO) को इलाके में अधिक निगरानी ड्रोन तैनात करने के लिए कहा है, ताकि स्थिति और ज्यादा स्पष्ट हो सके. सेना को अधिक ड्रोन हासिल करने के लिए मंजूरी मिलने के बाद फिलहाल एनटीआरओ द्वारा इस्तेमाल में लाए जा रहे इजरायल के हेरोन (IAI Heron Drone)मीडियम ऐल्टिटूड वाले लंबे ड्रोन क्षेत्र की तकनीकी निगरानी कर रहे हैं.
अधिकारियों ने कहा कि सीमा के पश्चिमी, मध्य या पूर्वी क्षेत्र में किसी भी प्रकार के अतिक्रमण को रोकने के लिए भारत ने एलएसी पर अपने स्पेशल हाई ऐल्टिटूड फोर्सेज को तैनात किया है. इसके साथ आईटीबीपी के साथ-साथ उत्तरी मोर्चे पर लड़ने के लि प्रशिक्षित स्पेशल फोर्सेज की मौजूदगी को सीमा पर बढ़ा दिया गया है. चीनी सेना पीएलए के ठीक उलट भारतीय के माउंटेन ट्रूप्स और सैनिकों को गुरिल्ला युद्ध और ज्यादा ऊंचाई वाले जगह पर युद्ध के लिए ट्रेनिंग दी जाती है. जिसका अच्छा उदाहरण साल 1999 में कारगिल वॉर है. चीन की सेना मुख्यतः पैदल सेना है जो अपने बख्तरबंद गाड़ियों और टैंक्स के साथ चलती है.



पहाड़ पर लड़ना सबसे कठिन है- पूर्व सेना प्रमुख
हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार
पूर्व सेना प्रमुख ने कहा, 'पहाड़ पर लड़ना सबसे कठिन है, क्योंकि ऊंचाई पर बैठे प्रतिद्वंदी के मुकाबले मैदान पर मौजूद सेना के बीच सैनिकों के मारे जाने का अनुपात 1 के मुकाबले 10 है. उत्तराखंड, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में तैनात सेनाओं ने लंबे समय से ऊंचाईयों पर काम किया है और इसलिए उनकी करीब से लड़ने की क्षमता यानी क्लोज कॉम्बैट की ट्रेनिंग का कोई जोड़ नहीं है. उन्होंने कहा कि तोपों और मिसाइलों के निशाने में एक्यूरेसी होनी चाहिए अन्यथा निशाना पहाड़ों के बीच कहीं और जा लगते हैं.'

तिब्बती पठार चीन की ओर से सपाट है, जबकि भारतीय पक्ष काराकोरम में K2 शिखर से शुरू होता है. उत्तराखंड में नंदा देवी, सिक्किम में कंचनजंगा, और अरुणाचल प्रदेश की सीमा के नामचे बरवा तक पहाड़ी इलाका है. साउथ ब्लॉक के एक चीन विशेषज्ञ ने कहा, 'पहाड़ों में केवल क्षेत्र पर कब्जा करना मुश्किल है, बल्कि इस पर पकड़ बनाए रखना भी आसान नहीं है.'

'भारत लंबा खेल खेलने के लिए तैयार'
अधिकारियों ने बताया कि भारत लंबा खेल खेलने के लिए तैयार है. रिपोर्ट के अनुसार एक वरिष्ठ मंत्री ने नाम ना छापने की शर्त पर कहा- 'हमारी बटालियन्स बख़्तरबंद सैनिकों और आर्टिलरी के साथ मौजूद है. भारत किसी को उकसाएगा नहीं लेकिन भी किसी गलत हरकत का जवाब जरूर देगी. LAC को अपने (चीन) आहार की इस्तेमाल करने के दिन खत्म हो गए हैं. भारत इंतजार करने के लिए तैयार है.'

अधिकारियों ने कहा कि यह ऐतिहासिक विवाद को दूर करने के प्रयास में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वुहान और ममल्लापुरम शिखर सम्मेलन शुरू किया ताकि दोनों नेता 2017 में 73 दिनों के डोकलाम के बाद द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ावा दे सकें.
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