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लॉकडाउन ने लॉक कर दी मछुआरों की किस्मत

लॉकडाउन की मछुआरों पर मार

लॉकडाउन की मछुआरों पर मार

लॉकडाउन से केवल मछुआरे ही नहीं, बल्कि मछली पकड़ने, बेचने, बीज प्रसंस्करण, पैकेजिंग, सप्लाई, एक्वेरियम मार्केट के काम से ...अधिक पढ़ें

"जैसे बिन पानी मछली तड़पती है, वैसे ही बिन मछली हमारी जिंदगी तड़प रही है. तालाब में पानी है, मछलियों की भरमार है, इन्हीं मछलियों के सहारे हमारी अजीविका चलती है, परिवार पलते हैं. कोरोना की महामारी और लॉकडाउन ने हमारी किस्मत भी लॉक कर दी है. रोजी-रोटी छिन गई है, दाने-दाने को मोहताज हो गए हैं. कहां जाएं-किससे गुहार करें, कुछ समझ नहीं आ रहा है." यह दर्द है मछुआरे दीपक रायकवार का, जो भोपाल के बड़े तालाब के किनारे रहते हैं. परमार वंश के राजा भोज द्वारा सन् 1010-1055 में बनवाया गया यह बड़ा तालाब एशिया के सबसे बड़े तालाब में शुमार किया जाता है.

दीपक ही नहीं, महेश नाविक, किशनलाल मांझी, ओंकार राखी, राहुल कीर जैसे प्रदेश के हजारों मछुआरों की यही व्यथा है, जिनकी आजीविका मछली पालन व्यवसाय पर निर्भर है. यह कारोबार पिछले 2 महीने से ठप है. न कहीं मछली बेचने वाले दिखते हैं, न मछली मारने वाले, न खरीदने वाले. सरकार से लॉकडाउन में मिली छूट के बावजूद और हिदायतों के बाद भी वे मछली पकड़ने तालाब में जा नहीं सकते, बेच नहीं सकते, क्योंकि ऐसा करने पर पुलिस दौड़ा-दौड़ा कर पीटती है, सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर भगा दिया जाता है.

मुश्किल में प्रदेश के मछुआरे
पड़ताल में हमने पाया कि मध्यप्रदेश में कोरोना महामारी और लॉकडाउन के चलते सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पंजीकृत 80 हजार से अधिक मछुआरों की रोजी-रोटी छिन जाने से उनके परिवारों के लाखों सदस्यों के सामने भोजन का संकट खड़ा हो गया है. केवल मछुआरे ही नहीं, बल्कि मछली पकड़ने, बेचने, बीज प्रसंस्करण, पैकेजिंग, सप्लाई, एक्वेरियम मार्केट के काम से जुड़े करीब 15 लाख लोगों का रोजगार भी छिन गया है. मछली का धंधा काफी मेहनत का है. यह सामुदायिकता की बुनियाद पर खड़ा है. सरदार सरोवर, बरगी, तवा, बाणसागर, हलाली, बारना जैसे बांधों, तालाबों तथा नर्मदा, बेतवा, क्षिप्रा जैसे दर्जनों छोटी-बड़ी नदियों सहित अन्य स्थानों में मछुआरे मत्स्य पालन करते हैं. भोपाल के बड़े तालाब को छोड़ यह काम बांधों में सरकारी टेंडरों के बाद ठेकेदारों के माध्यम से किया जाता है. जब मछलियां तैयार हो जाती हैं तो उन्हें बाजारों में बेचा जाता है. मछलियों की भरमार होने के बावजूद मछुआरों के चेहरे मुरझा गए हैं. मप्र में मछुआरों की बड़ी आबादी ऐसी है, जो स्वतंत्र रूप से मछली मारती, बेचती और अपने परिवारों का भरण-पोषण करती है.

भोपाल के हाल
अकेले भोपाल के बड़े तालाब के 3500 वर्ग हेक्टेयर के दायरे में 800 से 1000 मछुआरे और मांझी समुदाय के 22 हजार परिवार मछली पालन, उन्हें पकड़ने, सिंघाड़े, कमलगट्टे, कालिंदे की खेती एवं विक्रय के कारोबार से अपनी आजीविका चलाते हैं, सभी इन दिनों संकट में हैं. बड़े तालाब के चारों ओर सूरजनगर, गोरागांव, बेटागांव, पचामा, फंदा, बोरबन, शहीद नगर, हलालपुर, जहांगीराबाद आदि इलाकों में यह मछुआरे रहते हैं. किशन मांझी ने बताया कि "बीपीएल कार्ड से इन मछुआरों को 5 किलो चावल, एक किलो दाल के रूप मिला राशन अपर्याप्त है, जो अप्रैल में मिला था, अब खत्म हो चुका है. कई मछुआरों को समग्र आईडी नहीं होने के कारण राशन नहीं दिया गया, जबकि सरकार का कहना है कि इस दौर में हर गरीब को राशन मिलना ही चाहिए."अभी हालात यह है कि लॉकडाउन में कई मछुआ परिवार अपना पुश्तैनी मछली पालन का काम छोड़कर पेट पालने के लिए सब्जी बेचने पर मजबूर हो गए हैं.

मुसीबत से मुक्ति नहीं
भोजपाल मत्स्य सहकारी समिति, भोपाल के अध्यक्ष दीपक रायकवार कहते हैं कि "बड़े तालाब के मछुआरे सरकार को लायसेंस फीस देते हैं, लेकिन सरकार की घोषणा के बावजूद न कर्ज मिलता है, न अनुदान. समिति के सदस्य खुद की नाव तालाब में उतारते हैं. आपस में पैसा जमा कर कोलकाता से मछली पालन के लिए हर साल 10 से 12 क्विंटल मछली सीड डालते हैं. इस बार तो हम मछुआरों पर लगातार आपदा का पहाड़ टूटा पड़ रहा है." बीती बारिश में तालाब में जितना सीड डाला था, वह भदभदा बांध के गेट खुलने के कारण बह गया, मछुआरे मछली की अच्छी पैदावार पाने से वंचित रह गए. अभी कोरोना के चलते लॉकडाउन से काम बंद है. लॉकडाउन खुल भी गया तो 15 जून से 15 अगस्त तक मछली का ब्रीडिंग सीजन होने के कारण मछली मारने पर प्रतिबंध रहेगा. मांझी समाज के लोग ही बोट क्लब में आने वाले पर्यटकों को बड़े तालाब की सैर कराते है. अब कोरोना के खौफ से लंबे समय तक पर्यटक वैसे ही सैर से कतराएंगे, वहीं सोशल डिस्टेंसिंग की सख्त गाइडलाइंस के चलते कमाई बहुत घट जाएगी. एक तरह से हम मछुआरों की तो कमर ही टूट गई है. सभी मछुआरे कामकाज बंद होने से घर पर बैठे हैं. हेचरी में भी काम बंद पड़ा है.

बर्ड फ्लू की अफवाह से भी कारोबार प्रभावित
सूत्रों के अनुसार 15 फरवरी के बाद बर्ड फ्लू के संक्रमण की अफवाह से भी मछलियों का कारोबार प्रभावित हुआ. हालांकि सरकार ने अपनी ओर से विज्ञापनों के माध्यम से पूरी जानकारी लोगों को दी, जागरूकता भी फैलाई गई, लेकिन बात नहीं बन पाई, फिर कोरोना महामारी का संकट आ गया.

सरकार से उम्मीद
बता दें कि 10 अप्रैल को केन्द्र सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी कर मछली पकड़ने, मछली उत्पाद, झींगा और मछली के बीज के काम को भी लॉकडाउन से मुक्त किया गया था. मत्स्य समिति के प्रबंधक महेश नाविक का कहना है कि सरकार भी मछली को खाने-पीने की जरूरी चीजों में मानती है, इसलिए तो इसे लॉकडाउन से मुक्त रखा गया. मप्र के भोपाल, जबलपुर, खंडवा, सीहोर, रायसेन समेत अधिकांश जिलों में भी कलेक्टरों ने छूट के आर्डर दिए हैं, लेकिन जब मछली मारने के लिए तालाब में उतरने ही न दिया जाए, मछली पकड़कर भी लाएं, तो उसे बेचने न दिया जाए, आने-जाने का पास होने के बावजूद सड़क पर निकलने पर पीटा जाए, तो ऐसे आदेश या अधिसूचना का क्या मतलब है? उम्मीद है सरकार हमारी भी सुनेगी.

उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रधानमंत्री मत्स्य संवर्धन योजना के तहत 20 हजार करोड़ रुपए के पैकेज का ऐलान किया है. देखना यह है कि इस पैकेज का कितना हिस्सा मछुआरों को मिलेगा और उनकी जिंदगी और कारोबार को गति दे पाएगा?

पोषण के लिए मछली महत्वपूर्ण
शरीर के पोषण तथा निर्माण में मछली, मांस, अण्डे, दूध आदि का उपयोग संतुलित आहार में प्रमुख रूप से किया जा सकता है. मछलियों में लगभग 70 से 80 फीसदी पानी, 13 से 22 फीसदी प्रोटीन, 1 से 3.5 फीसदी खनिज पदार्थ और 0.5 से 20 तक चर्बी पाई जाती है. कैल्शियम, पोटेशियम, फास्फोरस, लोहा, सल्फर, तांबा जैसे खनिज मछलियों में पाए जाते हैं. इसके अलावा मछली में राइबोफ्लोविन, नियासिन, पेंटोथेनिक एसिड, बायोटीन, थाइमिन, विटामिन बी-12, बी-6 आदि भी पाए जाते हैं, इसीलिए मछली खाना सेहत के लिए बहुत लाभकारी माना जाता है.

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Tags: Coronavirus in India, Lockdown, Lockdown-4.0

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