मैदान से पहाड़ तक 'जल तांडव': लाखों की आबादी प्रभावित, बारिश-बाढ़ ने मचाई तबाही

मैदान से पहाड़ तक 'जल तांडव': लाखों की आबादी प्रभावित, बारिश-बाढ़ ने मचाई तबाही
(AP Photo/Anupam Nath)

मैदानी इलाकों से लेकर पहाड़ों तक बारिश (Flood In India) क़हर बनकर टूट रही है. नदी नाले उफान मार रहे हैं और लोगों का जीना मुहाल हो गया है. बादलों की हुंकार से भारत में हाहाकार मचा है.

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  • Last Updated: July 28, 2020, 12:23 PM IST
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नई दिल्ली/ देहरादून/ पटना. मैदानी इलाकों से लेकर पहाड़ों तक बारिश (Flood In India) क़हर बनकर टूट रही है. नदी नाले उफान मार रहे हैं और लोगों का जीना मुहाल हो गया है. बादलों की हुंकार से भारत में हाहाकार मचा है. सबसे बुरा हाल तो पहाड़ों का है जहां मूसलाधार बारिश, उफनते नदी-नाले और भूस्खलन ने तबाही मचा रखी है. उत्तराखंड में अगले कुछ दिन भारी बारिश की आशंका जताई जा रही है जिससे यहां के लोगों में खौफ पसर गया है.

बारिश के मौसम में उत्तराखंड के लोगों पर लगातार मुसीबतों का पहाड़ टूट रहा है. यहां ना तो मूसलाधार बारिश का दौर थम रहा है और ना ही भूस्खलन का. पिथौरागढ़ से चमोली तक हाइवे और गांव, पहाड़ से पानी के साथ गिरते मलबे में दफन होते जा रहे हैं. कई जगह पहाड़ की मिट्टी और चट्टानों ने पहाड़ी नदियों के बहाव का रास्ता तक बदल दिया है. कुदरत की मार से लोगों को बचाने के लिए मदद पहुंचाना भी मुश्किल है, क्योंकि उत्तराखंड के कई रास्ते या तो भूस्खलन से बंद हो चुके हैं, या फिर बारिश में बह गए हैं.

उत्तराखंड में कुदरत की मार लगातार बढ़ रही
हिमालय की वादियों में बसे उत्तराखंड में कुदरत की ये मार लगातार बढ़ रही है और 22 साल से इस पर चिंता जताने के अलावा कोई कुछ कर नहीं पाया है. 1998 में उत्तराखंड के माल्पा में 11 से 17 अगस्त के बीच भयानक भूस्खलन हुआ था, जिसमें कैलाश मानसरोवर के 60 यात्रियों समेत 380 लोग मलबे के साथ बह गए थे. वहां ऐसा क्यों होता है, इसके बारे में हिमाचल प्रदेश सरकार की वेबसाइट पर एक रिपोर्ट है, जिसमें बताया गया है कि हिमालय दुनिया का सबसे युवा पहाड़ है, जो अभी पूरी तरह स्थिर नहीं हो पाया है. उसी वजह से हिमालय क्षेत्र में लगातार भूकंप के झटके आते हैं, जिनकी वजह से मिट्टी और चट्टानों की जड़ें मजबूत नहीं हो पाई हैं. ऊपर से खनन, सड़कें और सुरंग बनाने के नाम पर पहाड़ तोड़े जा रहे हैं. ऐसे में जब भी भारी बारिश होती है, तब पानी अपने साथ मिट्टी और चट्टानों को बहाते हुए ढलान से नीचे आता है और लोगों के लिए काल बन जाता है.
इसके साथ ही बारिश मैदानी इलाक़ों में भी बर्बादी का सबब बन रही है. उत्तर प्रदेश से लेकर असम और असम से लेकर बिहार तक क़ुदरत विनाशलीला कर रही है. जल तांडव से बिहार के 10 जिलों में त्राहिमाम मचा है. बिहार की 12 लाख से ज़्यादा आबादी सैलाब का सितम झेलने को मजबूर है. जबकि असम में ब्रह्मपुत्र और सहायक नदियां सब कुछ लील जाने पर आमादा हैं. यहां के तीस जिलों की 15 लाख से ज़्यादा आबादी पानी के प्रहार से पनाह मांग रही है. ख़तरे का सबब ये कि आने वाले दिनों में भी बादलों का बरसना ऐसे ही जारी रहेगा.





 बिहार और असम तक मैदानी इलाक़ों में भी बाढ़ से ज़िंदगी बेहाल
यूपी से बिहार और असम तक मैदानी इलाक़ों में भी बाढ़ से ज़िंदगी बेहाल है. नदियां तटबंध तोड़कर गांवों को डुबोने के बाद अब नेशनल हाइवे पर हाहाकार मचाने में जुटी हैं. असम में ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों का उफान 30 ज़िलों के 56 लाख से ज़्यादा लोगों को तबाह कर चुका है. बाढ़ से मरने वालों का आंकड़ा भी सौ के पार चला गया है. भारी बारिश की वजह से झारखंड और उत्तर प्रदेश भी बाढ़ की चपेट में आ चुके हैं. उत्तराखंड से निकलने वाली गंगा यूपी से बिहार तक लोगों को डरा रही है, तो यमुना में पानी का स्तर बढ़ने के बाद दिल्ली में भी बाढ़ के ख़तरे ने दस्तक देनी शुरू कर दी है.

फिलहाल सबसे बुरा हाल बिहार का है, जहां कोसी, गंडक, बागमती, कमला बलान के बाद अब गंगा नदी ने भी कहर बरपाना शुरू कर दिया है. जो गांव नदी के किनारे थे, वहां पहले ही लोगों के घर डूब चुके थे, अब उफनाई नदियों ने दूर-दराज के गांवों में भी लोगों को बेघर कर दिया है. गोपालगंज से लेकर मुज़फ़्फ़रपुर तक सैकड़ों परिवार या तो सड़कों पर शरण लिए हुए हैं या फिर नदियों के किनारे बने तटबंधों पर पॉलीथिन के नीचे दिन काट रहे हैं.

बिहार में बाढ़ प्रबंधन के इतिहास और अर्थशास्त्र पर समस्तीपुर के कृषि विश्वविद्यालय के डीन और कृषि अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर के.एम. सिंह ने सात साल पहले शोध किया था. उन्होंने अपनी शोध रिपोर्ट में बताया कि बिहार की बाढ़ की बुनियाद तो तभी रख दी गई, जब नदियों का रास्ता रोककर रेल और सड़कों का जाल बिछाया जाने लगा. उसके बाद नदियों के दोनों किनारे तटबंध बनाकर बाढ़ रोकने की कवायद शुरू हुई, जिसके बारे में 1937 में ही ब्रिटिश इंजीनियर ब्रॉड शॉ स्मिथ ने चेतावनी दी थी कि इससे नदियां विनाशकारी हो जाएंगी.

रणनीति बन नहीं पाती, क्योंकि उससे पहले ही बाढ़ आ जाती है...
प्रोफ़ेसर के.एम. सिंह के मुताबिक, 1951 से 1998 तक बिहार को बाढ़ से बचाने के नाम पर 53 हज़ार करोड़ से ज़्यादा ख़र्च किए गए. इस रकम का बड़ा हिस्सा तटबंध बनाने में फूंका गया, लेकिन हर साल नदियां कच्चे तटबंधों को तोड़कर तबाही ही मचाती रहीं. तटबंध से बाढ़ रोकने में कामयाबी इसलिए भी नहीं मिली, क्योंकि बिहार का शोक कही जाने वाली कोसी जैसी नदियां लगातार अपना रास्ता बदलती रहती हैं, इसलिए बाढ़ की रोकथाम के लिए नदियों की फितरत समझकर लंबे समय के लिए रणनीति बनाना ज़रूरी है. ये बात सरकार भी मानती है, लेकिन रणनीति बन नहीं पाती, क्योंकि उससे पहले ही बाढ़ आ जाती है.
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