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सुपरपावर बनने की राह पर भारत, अफ्रीका में चीन के लिए बना चुनौती, रिकॉर्ड टाइम में लगा दी केन्या में फैक्ट्री

News18Hindi
Updated: July 1, 2019, 7:27 PM IST
सुपरपावर बनने की राह पर भारत, अफ्रीका में चीन के लिए बना चुनौती, रिकॉर्ड टाइम में लगा दी केन्या में फैक्ट्री
मात्र तीन साल में भारत ने केन्या की कपड़ा फैक्ट्री को बनाकर तैयार कर दिया है (फाइल फोटो)

भारत तेजी से अपने सहयोगी देशों में मूलभूत सुविधाएं देने वाले प्रोजेक्ट्स को पूरा कर रहा है. ऐसे में कई अफ्रीकी देश चीन के बजाए भारत को अपनी मूलभूत सुविधाओं के विकास की योजनाओं में सहयोगी बनाना चाहते हैं.

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भारत ने जो वादा किया, वो पूरा करके दिखाया. भारत ने केन्या से उसकी एक कपड़ा फैक्ट्री का कायापलट करने का वादा किया था और भारत ने यह काम रिकॉर्ड टाइम में पूरा किया है. केन्या से भारत ने यह वादा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की 2016 की केन्या यात्रा के दौरान किया था.

माना जा रहा है कि वे दिन अब गुजर चुके हैं जब भारत को ऐसे दोस्ताना डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स को पूरा करने में काफी वक्त लगता था. खासकर अपने प्रतिद्वंदी चीन की गति के मुकाबले अब भारत भी तेजतर्राक नज़र आ रहा है.

मात्र 3 साल में केन्या की बड़ी कपड़ा फैक्ट्री का कर दिया कायापलट
भारत और केन्या के बीच डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के लिए की गई यह पार्टनरशिप तब और महत्वपूर्ण हो जाती है, जब अफ्रीका के कई देशों में मूलभूत सुविधाओं के प्रोजेक्ट्स में चीन के बढ़ते लोन का विरोध हो रहा हो.

केन्या की 'रिफ्ट वैली टेक्सटाइल्स' नाम की फैक्ट्री करीब सन् 2000 से बंद थी. भारत ने इसके कायापलट के लिए 29.95 मिलियन डॉलर यानि करीब 207 करोड़ रुपये की रकम तय की थी. इस फैक्ट्री की कायापलट का काम भारत की एक प्राइवेट कंपनी लक्ष्मी मशीन वर्क्स लिमिटेड (LMV) को सौंपा गया था. यह काम जून में पूरा हो गया.

10 गुना बढ़ी फैक्टी की क्षमता, केन्या के राष्ट्रपति हुए खुश
बिल्कुल नई हो चुकी इस फैक्ट्री का जून के तीसरे हफ्ते में केन्या के राष्ट्रपति उहुरू केन्याटा ने किया. इस दौरान केन्या में भारत के राजदूत राहुल छाबड़ा भी वहीं पर मौजूद थे. ये दोनों ही व्यक्ति केन्या की इस फैक्टी के कायापलट के साक्षी रहे हैं.इन्होंने बताया कि इस समय फैक्ट्री की कपास की प्रॉसेसिंग करने की क्षमता बढ़कर 83 गांठ हो चुकी है. जो पहले मात्र 8 गांठ हुआ करती थी. इसके अलावा इसकी उत्पादन क्षमता में भी करीब 10 गुना की बढ़ोत्तरी हुई है. अब यह हर साल 1.5 करोड़ मीटर कपड़े का उत्पादन कर रही है. जबकि कभी यह मात्र 1.7 मिलियन मीटर कपड़े का हर साल उत्पादन किया करती थी.

सिर्फ फैक्ट्री ही नहीं बनाई बल्कि इंजीनियरों और कर्मचारियों को ट्रेनिंग भी दी
LMW फैक्ट्री ने कपड़ा कंपनी के टेक्नीशियंस, ऑपरेटर्स और ट्रेनर्स को भारत में और उनके घर (केन्या में फैक्ट्री) में भी ट्रेनिंग दी. फैक्ट्री का आधुनिकीकरण केन्या की कपड़ा इंडस्ट्री को फिर से खड़ा करने के लिए किया गया है. और जब यह फैक्ट्री पूरी तरह से चालू हो जाएगी तो बड़े स्तर पर इसका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव केन्या पर देखने को मिलेगा. केन्या की 22 काउंटियों यानि कुल 47 में से 22 राज्यों में लोग कपास की खेती करते हैं. इन्हें भारत के इस कदम इन लोगों की कमाई में सीधा फायदा होने की उम्मीद है.

केन्या में फैक्ट्री के उद्घाटन पर बोलते केन्याई राष्ट्रपति उहुरू केन्याटा और पीछे बैठे केन्या में भारत के राजदूत राहुल छाबड़ा (फाइल फोटो)


केन्या के लोगों की जिंदगी में बदलाव ला रही भारत की योजनाएं
भारत ने केन्या की यूनिवर्सिटी ऑफ नैरोबी में स्थित महात्मा गांधी ग्रेजुएट लाइब्रेरी की कायापलट का वादा भी किया है. इसके लिए भारत ने एक मिलियन यानि करीब 7 करोड़ की ग्रांट भी जारी की थी. सरकारी अधिकारियों ने कहा है कि इस लाइब्रेरी का काम भी बिल्कुल वक्त से पूरा कर लिया गया है. भारतीय विदेश मंत्रालय के आर्थिक संबंध विभाग के सेक्रेटरी टीएस त्रिमूर्ति का कहना है, 'ये प्रोजेक्ट इस बात का उदाहरण हैं कि किस तरह से भारतीय सहायता अफ्रीकी देशों की अर्थव्यवस्था और वहां के लोगों की जिंदगी में बदलाव ला रही है. इन प्रोजेक्ट्स को पूरा करने की हमारी स्पीड की भी तारीफ हो रही है.'

भारत अफ्रीका में कई डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स पर कर रहा है काम
हाल में अफ्रीका में भारत ने कई सारे ऐसे प्रोजक्ट्स पूरे किए हैं. इसमें से कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स में घाना में राष्ट्रपति ऑफिस का निर्माण, गाम्बिया में नेशनल असेंबली की बिल्डिंग का निर्माण और सूडान में कोस्ती पावर प्लांट का निर्माण किया जाना शामिल है. पिछले कुछ सालों में अफ्रीका भारत का बेहतरीन डेवलपमेंट पार्टनर बन चुका है और इसने भारत के साथ अपने संबंधों को 2018-19 तक 2 लाख करोड़ रुपये के सहयोग तक बढ़ा लिया है.

भारत साफ कर चुका है प्राथमिकता, तेजी से डिलीवर करेगा प्रोजेक्ट्स
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मई में अपना पदभार संभालने के तुरंत बाद कहा था कि इन प्रोजेक्ट्स को पूरा किया जाना भारत की प्राथमिकताओं में शामिल होगा.

नई दिल्ली में एक कार्यक्रम में बोलते हुए जयशंकर ने कहा था कि वे हर महीने भारत के जरिए चलाए जा रहे इन विकास से जुड़े प्रोजेक्ट्स की समीक्षा करेंगे और सुनिश्चित करेंगे कि इन प्रोजेक्ट्स को वक्त से पूरा किया जाए. पहले भारत के ऐसे प्रोजेक्ट्स को लेकर देरी और तयशुदा खर्च से ज्यादा खर्च होने की ख़बरें सामने आती रहती थीं. ऐसे में भारत को ऐसे मूलभूत विकास से जुड़े प्रोजेक्ट्स पूरे करने में कमजोर माना जाने लगा था. साथ ही देश की क्षमताओं पर भी सवाल खड़े होने शुरू हो गए थे.

अफ्रीका के लिए आफत बनता जा रहा था चीन
फिर से भारत ने इस क्षेत्र में अपनी प्रतिष्ठा को वापस पाया है और अफ्रीका के देशों में सबसे बड़े फाइनेंसर चीन के सामने एक चुनौती बनकर खड़ा हुआ है. डेलॉइट अफ्रीका नाम के एक अख़बार की मार्च, 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन अफ्रीका में चल रही विकास से जुड़ी हर पांच में से एक योजना को फाइनेंस कर रहा है और हर तीन में से एक योजना को खुद बना रहा है.

डेलॉइट अफ्रीका की इस रिपोर्ट में कहा गया था कि अभी तक चीन ने अफ्रीका महाद्वीप के 200 से ज्यादा प्रोजेक्ट्स में भाग लिया है. चीनी कंपनियां वे ये प्रोजेक्ट्स डिजाइन कर रही हैं और इन्हें तेजी से पूरा भी कर रही हैं. चीन ने यहां पर अभी तक करीब 30 हज़ार किमी हाईवे को अपग्रेड किया है, 2 हजार किमी रेलवे, 8.5 करोड़ टन हर साल के हिसाब से बंदरगाहों की क्षमता में बढ़ोत्तरी की है, 20 हज़ार मेगावॉट बिजली का उत्पादन किया है और 30 हजार किमी से ज्यादा ट्रांसमिशन लाइन और ट्रांसफॉर्मेशन लाइन का विकास किया है.

अफ्रीका में होने लगा है चीन की आक्रामक प्रवृत्तियों का विरोध
हालांकि अब अफ्रीकी देशों में चीन की गतिविधियों का विरोध शुरू हो चुका है. ब्रिटेन के टेलिग्राफ अख़बार ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि तंजानिया ने चीन की मदद से बनाए जा रहे एक पोर्ट प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया था. वहीं केन्या ने अपने ऐसे ही एक कोयले के पावर प्लांट का निर्माण रोक दिया था.

तंजानिया के शहर बागामोयो में 10 बिलियन डॉलर की लागत से बनने वाले बंदरगाह को बनाने का प्रस्ताव भी चीन ने रखा था. यह बनने के बाद पूर्वी अफ्रीका का सबसे बड़ा बंदरगाह होगा. लेकिन तंजानिया के राष्ट्रपति जॉन मागुफूली ने चीन के प्रस्ताव को नहीं स्वीकारा. इसके बारे में टेलीग्राफ अख़बार से बात करते हुए उन्होंने इस बंदगाह के निर्माण के लिए ऑफर की गई चीनी मदद को 'शोषण का कारक और अजीब तरह से दिया गया प्रस्ताव' कहा था.

विनम्र भारत ले सकता है आक्रामक चीन की जगह
विश्लेषकों का कहना है कि भारत ने चीन के साथ इस मामले में बराबरी करने के लिए बहुत मेहनत की है. भारत ने बड़ी कोशिशों के बाद बड़े मूलभूत सुविधाओं का विकास करने वाले प्रोजेक्ट्स को हासिल किया है. अफ्रीका को इस दौरान यह महसूस होना शुरू हुआ है कि बीजिंग के साथ काम करने की शर्तें उसकी इच्छा के अनुसार नहीं हैं और यह भारत के लिए यह एक ऐसा अवसर है कि वह अफ्रीका में मूलभूत सुविधाओं के विकास से जुड़े और अवसरों को भुनाने की ओर बढ़ सकता है.

यह भी पढ़ें: सैकड़ों साल पुरानी तकनीक से हो रही चीन की दीवार की मरम्मत

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First published: July 1, 2019, 7:27 PM IST
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