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कश्मीर के इस 'पेंसिल वाले गांव' के लोगों पर रोजगार संकट, कोरोना के कारण बंद स्कूल बनें वजह!

कश्मीर के इस 'पेंसिल वाले गांव' के लोगों पर रोजगार संकट, कोरोना के कारण बंद स्कूल बनें वजह!

बाजार में पेंसिल की मांग कम होने से लोग परेशान हैं.

बाजार में पेंसिल की मांग कम होने से लोग परेशान हैं.

India pencil village in Kashmir: कश्मीर के पुलवामा जिले से लगभग 10 मील दक्षिण में पेड़ों की बहुतायत वाला यह गाव, भारत के पेंसिल निर्माताओं द्वारा उपयोग की जाने वाली 90% से अधिक लकड़ी की आपूर्ति करता है. पेंसिल में इस्तेमाल होने वाली यह लकड़ी 150 से ज्यादा देशों में निर्यात की जाती है.

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    पुलवामा. बचपन के उन दिनों को कौन भूल सकता है जब हमने पढ़ाई के दौरान हाथों में पेंसिल पकड़कर कॉपी पर पहला अक्षर लिखा था. पेंसिल के साथ हर किसी की बचपन की यादें जुड़ी हुईं हैं. लेकिन इस पेंसिल (Pencil village of Kashmir) को बनाने वाले लोग इन दिनों बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं. कोरोना के कारण देश के ज्यादातर स्कूल ऑनलाइन (Online School) चल रहे हैं. ऐसे में पेंसिल की डिमांड मार्केट में काफी कम हो गई है. बहु ही कम ही लोग इस बात को जानते हैं कि कश्मीर के पुलवामा जिले में एक गांव ऊखू है, जिसे पेंसिल वाले गांव के नाम से जाना जाता है. इस गांव में पेंसिल उद्योग से जुड़े लोग काफी परेशान हैं.

    गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, कश्मीर के पुलवामा जिले से लगभग 10 मील दक्षिण में पेड़ों की बहुतायत वाला यह गाव, भारत के पेंसिल निर्माताओं द्वारा उपयोग की जाने वाली 90% से अधिक लकड़ी की आपूर्ति करता है. पेंसिल में इस्तेमाल होने वाली यह लकड़ी 150 से ज्यादा देशों में निर्यात की जाती है. कोरोना से पहले गांव की 17 पेंसिल फैक्ट्रियों में 2,500 से अधिक लोग काम करते थे और उद्योग ने लगभग 250 परिवारों का समर्थन किया था. लेकिन, लगभग दो साल से स्कूल बंद होने और गांव के उत्पादों की मांग में गिरावट के बाद कारखाने के मालिकों ने अपने कर्मचारियों की संख्या आधे से अधिक कम कर दी है. फैक्ट्रियों में कर्मचारियों की संख्या कम होने से गांव के लोगों के सामने रोजगार का संकट पैदा हो गया है.

    जो कर्मचारी फैक्ट्री में काम भी कर रहे हैं वो भी काफी तनख्वाह में. वहीं, ज्यादातर लोग नौकरी की तलाश में देश के दूसरे हिस्सों में चले गए हैं. बिहार के रहने वाले 26 वर्षीय राजेश कुमार ने सात साल तक ऊखू में काम किया है. अन्य प्रवासी कामगारों की तरह, वह कारखाने के परिसर के एक कमरे में रहते हैं और 10 से 12 घंटे की शिफ्ट में काम करते हैं.

    पिछले साल लॉकडाउन के दौरान करीब तीन महीने तक उत्पादन बंद रहने पर फैक्ट्री मालिक ने खाना और रहने की व्यवस्था की थी. वह खुद को भाग्यशाली मानते हैं कि लॉकडाउन के बाद भी ऊखू में उनके पास काम है. कुमार कहते हैं, “मुझे उम्मीद है कि पेंसिल की मांग बढ़ेगी और ये कारखाने फिर से कामगारों से भरे हुए होंगे, क्योंकि हमारे कई दोस्त और हमारे गांवों के लोग काम खोज रहे हैं.

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    जम्मू शहर के 27 वर्षीय फारूक अहमद वानी पिछले पांच वर्षों से ऊखू में मशीन ऑपरेटर के रूप में काम कर रहे हैं.

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    उनका कहना है, “हम उम्मीद कर रहे हैं कि स्कूल जल्द से जल्द खुलें ताकि बाजार में पेंसिल की मांग बढ़ जाए. उन्होंने कहा कि जब तक स्कूल नहीं खुलेंगे तब तक पेंसिल की मांग नहीं बढ़ेगी और कामगारों को काम नहीं मिलेगा.

    Tags: Coronavirus Case in India, Jammu kashmir, Jammu kashmir news

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