गलवान हिंसा के बाद और मजबूत हुई भारतीय सेना, नए हथियारों ने ताकत को बढ़ाया

लद्दाख की गलवान घाटी में 14-15 जून, 2020 की दरम्यानी रात पीएलए के सैनिकों के साथ हिंसक झड़प में 20 भारतीय जवान शहीद हो गए. (पीटीआई फाइल फोटो)

India-China Standoff: भारतीय एजेंसियों को इस बात का एहसास हो गया था कि चीन लंबी लड़ाई के लिए अपनी तैनाती को बढ़ा रहा है. हालातों को देखते हुए दिल्ली में एक बड़ी बैठक हुई और तय हुआ कि भारतीय वायुसेना को शामिल कर के ग्राउंड फोर्स को और मज़बूत किया गया.

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नई दिल्ली. भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख (Eastern Ladakh) के गलवान में हुए ख़ूनी संघर्ष (Galwan Valley Clash) को एक साल पूरा हो गया है. भारतीय सेना पहले से ही मज़बूत थी और पिछले एक साल में भारतीय सेना को उन्नत हथियारों और बाकी जरूरी सामानों से लैस कर दिया. पिछले साल 15 जून के गलवान में जो हुआ उसने एलएसी पर जारी विवाद को फिर से हवा दे दी है. एलएसी पर 7 सितंबर 2020 को फायरिंग की घटना ने 45 साल से जारी शांति को खत्म कर दिया. पिछले एक साल में भारत ने लद्दाख में चीन की हेकड़ी को खत्म करने के लिए अपनी सेना को इस क़दर तैयार कर दिया कि अब चीन को भारत पर दादागिरी दिखाने के लिए शायद कोई और ही उपाय सोचना होगा क्योंकि सामरिक और कूटनीतिक स्तर पर भारत ने चीन की कमर तोड़ दी. मजबूरन चीन को अपनी हेकड़ी छोड़कर बातचीत की मेज पर आना पड़ा.

वैसे तो तकरीबन 4000 किलोमीटर की वास्तविक नियंत्रण रेखा पर छुटपुट फेसऑफ की घटनाओं का होना आम था लेकिन इस बार चीन कुछ और ही मंशा के साथ तिब्बत के इलाके में अपने सैनिक को इकट्ठा कर रहा था. दरअसल हर साल सर्दियां खत्म होने के साथ भारत और चीन अपने अपने इलाके में युद्धाभ्यास करते हैं. पिछले साल भी ऐसा ही हो रहा था लेकिन एक चीज़ जो सबसे चौंकाने वाली थी कि अभ्यास के खत्म होने के बाद भी उसकी सेना लद्दाख के दूसरी और तिब्बत में मौजूद थी. भारतीय सेना लगातार चीनी सेना की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए थी. पांच मई 2020 को पैंगॉन्ग झील के क़रीब दोनों देशों की सेनाओं के बीच झड़प की ख़बरें आईं. सिक्किम के नाकुला में भी दोनों देशों की सेना पेट्रोलिंग के दौरान आमने सामने आ गई. नौबत धक्का-मुक्की तक आ पहुंची. तनाव लगातार बढ़ रहा था और सौनिकों की तादाद भी बढ़ने लगी.

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भारतीय एजेंसियों को इस बात का एहसास हो गया था कि चीन लंबी लड़ाई के लिए अपनी तैनाती को बढ़ा रहा है. हालातों को देखते हुए दिल्ली में एक बड़ी बैठक हुई और तय हुआ कि भारतीय वायुसेना को शामिल कर के ग्राउंड फोर्स को और मज़बूत किया गया. पहले चरण में पहली प्राथमिकता थी कि सैनिकों को कॉम्बैट सपोर्ट मुहैया कराना. मई के दूसरे हफ्ते से ही भारतीय वायुसेना के सभी ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ़्ट जिसमें C-130 j , c-17 , IL 76 , AN-32 देश के अलग-अलग बेस से सैन्य साजो सामान को लद्दाख और एलएसी के पास बने एडवांसड लैंडिंग ग्राउंड तक पहुंचाना शुरू किया गया. ऊंचे इलाकों में MI-17 और चिनूक हेलीकॉप्टरों के जरिए सैनिकों की तैनाती को भी तेज कर दिया गया था. दूसरे चरण में निगरानी के लिए रडार और अन्य उपकरणों तो भी तैनात किया गया हालांकि पहले से ही ये उपकरण और रडार उन इलाकों में मौजूद थे लेकिन अतिरिक्त उपकरण भी ले जाए गए. जिसका मक़सद था कि चीन के हर एक चाल पर पैनी नजर बनाए रखना. जिसके लिए लो लेवल लाइट वेट रडार सिस्टम और माउंटेन रडार सिस्टम का इस्तेमाल किया गया.

महज़ कुछ दिन के भीतर भारतीय सेना की मौजूदगी को चीनी सेना की तैनाती के बराबर कर दिया गया. यानी की मिरर डेप्लॉयमेंट. वैसे को लद्दाख में भारतीय सेना की टैंक रेजिमेंट काफी पहले से ही मौजूद है लेकिन चीनी टैंकों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए T-90 और T-72 की अतिरिक्त रेजिमेंट, आर्टलरी गन, एयर डिफेंस सिस्टम, गोला बारूद, रसद, स्पेशल टैंट आदी को पूर्वी लद्दाख में पहुंचा दिया. सामरिक के अलावा कूटनीतिक तौर पर भी भारत ने चीन को बैकफुट में डाल दिया. दोनों देशों के बीच एलएसी पर किसी भी तरह का विवाद सुलझाने के लिए सेना के स्थानीय कमांडरों के बीच बातचीत होती थी लेकिन जिस तरह से विवाद बड़ा हो चुका था पहली बार कोर कमॉडर स्तर यानी लेफ्टिनेंट जनरल स्तर के अधिकारियों को बैठना पड़ा.

पहली बैठक में दोनों देशों ने आम सहमति बनाते हुए गलवान, पैंगॉन्ग, गोगरा, हॉटस्प्रिंग से आंशिक तौर डिसएंगेजमट की प्रक्रिया शुरू भी की लेकिन 15-16 जून की रात को गलवान में इसकी तरह की जारी प्रक्रिया की तस्दीक़ करने पहुंचे. भारतीय सेना के अधिकारी कर्नल संतोष बाबू पर चीनी सौनिकों ने जानलेवा हमला कर दिया. उसके बाद पूरी रात भर दोनों देशों के सैनिकों के बीच मारपीट होती रही लेकिन एक राउंड भी फायर नहीं हुआ. चीन के सैनिक तेज धार वाले हथियार, लोहे की छड़ें, डंडे जिन पर तार बंधा हुआ था उनका इस्तेमाल करना शुरू किया. भारतीय सेना भी पीछे नहीं हटी और चीनी सैनिकों तो जमकर पीटा. नतीजा ये हुआ की इस ख़ूनी संघर्ष में भारतीय सेना के बीस सैनिक शहीद हो गए जबकि चीनी सेना के 40 से 45 सैनिकों को भारतीय सेना ने मार गिराया. गलवान की हिंसा के बाद से रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना को कुछ विशेष अधिकार दिए. जिनमें सबसे महत्वपूर्ण था लोकल कमांडरों को स्थिति को साधते हुए खुद फैसला लेना. इससे पहले एलएसी पर किसी भी तनाव या झड़प पर अगर भारतीय सेना को कार्रवाई करनी होती तो उसके लिए ब्रिगेड हेडक्वार्टर, कोर हेडक्वार्टर, कमांड हेडक्वार्टर और दिल्ली में सेना के मुख्यालय से अनुमति लेनी पड़ती थी.

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रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने ये फ़रमान जारी किया था कि सेना के लोकल कमांडर अपने लिहाज से ग्रांउड पर फैसला ले सकते हैं. चूंकि दोनों देशो में ये सहमति थी भले ही विवाद कितना बड़ा क्यों न हो जाए गोली नहीं चलेगी. लेकिन पैंगाग के दक्षिण छोर पर भारतीय सेना ने 29-30 अगस्त की रात तो जब ऑफेंसिव एक्ट करते हुए कई चोटियों को पर अपने को क़ाबिज़ किया था उसी दिन से चीन बैकफ़ुट में आ गया था. 7 सितंबर 2020 को भारतीय चौकियों पर क़ब्ज़े के मक़सद से चीनी सेना जब उन चोटियों की तरफ बढ़ रही थी तो भारतीय सेना की तरफ से वॉर्निग शॉट्स चलाए गए जो कि 45 साल में पहली बार था एलएसी पर फायरिंग हुई. भारतीय सेना ने चीन के मंसूबे को देखते हुए अपने सैनिकों के पूरे सर्दियों में तैनात रहने और उनकी ताक़त का इज़ाफ़ा करना शुरू कर दिया.

स्पेशल हाई आल्टेट्यूड टैंट 
भारतीय सेना पिछले साल भर माइनस 40 से 50 डिग्री के तापमान में एलएसी पर डटी रही. हालातों को पहले से ही भांप कर रक्षा मंत्रालय की तरफ से तैयारियां भी तेज कर दी गई थी जिसके लिए खास तौर पर रहने का इंतजाम किया गया.

जिसमें तमाम सुविधाओं से लैस परंपरागत स्मार्ट कैंप के अलावा बिजली, पानी, जगह को गर्म रखने की सुविधा, स्वास्थ्य और स्वच्छता सुविधाओं से युक्त अत्याधुनिक आवासीय सुविधा के इंतज़ाम किए गए हैं. लद्दाख की ऊंची चोटियों पर तैनात सैनिकों के लिए विशेष तीन लेयर वाले टेंट दिए गए. जो कि बाहर से बर्फ और तेज हवाओं से सुरक्षित रखते है साथ ही अंदर से गर्म रखने का भी बंदोबस्त किया गया.

एलएसी पर भारती सैनिक एंटी रायट गियर से लैस
एलएसी पर भारतीय सैनिकों से छिटपुट लड़ाई और संघर्ष के दौरान चीन की पीएलए सेना डंडे, भाले, पत्थर और दूसरे गैर-घातक हथियारों का इस्तेमाल करती है, इसलिए अब भारतीय सैनिक भी खास राइट-गिएर, हेलमेट, ग्लास-शिल्ड और बैटन लेकर एलएसी पर तैनात हैं. पहली बार सिक्किम से सटी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) की तस्वीरें सामने आई है जिसमें भारतीय सैनिक खास बैटन यानि डंडे लेकर दिखाई पड़ रहे हैं. हालांकि साथ में नाइटविजन इक्यूपमेंट से सुसज्जित हथियारबंद सैनिक भी दिखाई पड़ रहे हैं. पिछले साल गलवान घाटी की हिंसा के बात भारतीय सेना ने इस तरह के स्पेशल रायट-गिएर का ऑर्डर दिया था.

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अमेरिकी असॉल्ट रायफल सिगसौर एलएसी पर तैनात
भारतीय सेना के पास पुराने हो चले इनसास रायफलों को पूरी तरह से बदलने का काम तेज है. एलएसी पर जारी विवाद के बीच ही वहीं पर तैनात चीन को सबक़ सिखाने के लिए भारतीय सेना को दुनिया कि सबसे ख़तरनाक असॉल्ट रायफल दी गई. 14 महीने से लगातार भारतीय सेना हीथो में सिगसौर रायफल के साथ चीनी सेना के सामने डटी है. डेढ़ लाख सिगसौर रायफल फास्ट ट्रैक प्रोसिजर के तहत अमेरिका से ली गई है. इसके पहले 72500 रायफल को भारतीय सेना को जम्मू-कश्मीर में आतंकी विरोधी अभियान के लिए दिया गया है तो 72500 रायफल की दूसरी खेप को चीन के मोर्चे पर तैनात सैनिकों को दिया गया. ये वज़न में काफी हल्की है इस रायफल की सबसे खास बात है वो है इसकी सटीक मारक क्षमता. इस रायफल की रेंज 400 मीटर की है और सटीक निशाना लगाती है. हालांकि एके 47 की रेंज 800 मीटर तक है लेकिन उसकी सटीकता इस सिगसौर जैसी नहीं है.

पुरानी लाइट मशीन गन को बदला जा रहा इज़रायल की नेगेव NG-7 से
पहले सैनिकों को अमेरिका की बनी असॉल्ट रायफल सिगसौर दी गई तो अब इजरायल की बनी लाइट मशीन गन नेगेव NG-7 देने की तैयारी है. सेना के सूत्रों की मानें तो इस महीने के आखिर तक इन लाइट मशीन गन का डेप्लॉयमेंट शुरू हो गया है. 6000 मशीन गन की पहली खेप भारत आ चुकी है. इस मशीन गन का सौदा 19 मार्च 2020 को इजरायल की कंपनी से हुआ था. कुल 16476 गन की खरीद का करार हुआ था. मार्च 2022 तक बाकी गन भारत को मिल जाएगी.

इस LMG की खास बात ये है कि इसकी मारक क्षमता जितनी सटीक है उतनी ही घातक भी. NG-7 गन की रेंज 800 मीटर है और इससे 700 गोलियां प्रति मिनट दागी जा सकती हैं. इस मशीन गन में एक बार में 150 से 200 गोलियां आती हैं और इस LMG की खास बात ये है कि एक बार राउंड खत्म होने के बाद महज कुछ ही सेकेंड में नया राउंड लगाया जा सकता है.

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पैंगॉन्ग में चीनी बोट को तोड़ के लिए तैयार भारतीय स्टील बोट
पूर्वी लद्दाख के पैंगॉन्ग त्सो झील में चीन हमेशा से पेट्रोलिंग के दौरान अपनी बोट के जरिए भारतीय बोट को टक्कर मारकर नुकसान पहुंचाने और डुबोने की कोशिश में रहता था. अब उन बोट को टक्कर देने के लिए नई स्टील बोट तैयार की गई है. जिनकी तैनाती शुरू भी हो चुकी है. ये बोट्स नई तकनीक से लैस है जिसे स्पेशल स्टील और स्पेशल धातु से बनाया गया है और अत्याधुनिक सर्विलांस और कम्युनिकेशन लगाए गए है. नई बोट में जवानों के बैठने की भी ज़्यादा जगह है बोट में क़रीब 25-30 जवान एक साथ बैठ सकते हैं. सुरक्षित रहकर जवान दुश्‍मन पर फायरिंग कर सकेंगे. साथ ही फायरिंग के लिए इनमें नाव के सामने हल्की मशीनगन लगाने के लिए सुरक्षित जगह भी है इन सभी बोट को फास्ट ट्रैक प्रोक्योरमेंट के तहत बनाया गया है.

भारतीय सेना एलएसी के लिए नए लाइट टैंक लेने की तैयारी में 
भारतीय सेना की टैंक रेजिमेंट इस वक़्त लद्दाख और उत्तर पूर्व से सटे एलएसी के इलाके में तैनात है. लद्दाख में तो वायुसेना के बड़े विमानों के जरिए अतिरिक्त टैंक रेजिमेंट को पहुंचाया गया. चूंकि चीन अपने क़ब्ज़े वाले तिब्बत में अपने हल्के वज़न वाले टैंकों के साथ मौजूद है जो कि उस इलाके में मूवमेंट के लिए तो आसान है लेकिन भारतीय टैंक टी-90 और टी-72 के सामने वो कहीं नहीं टिकते. लिहाजा लंबे समय तक आई ऑल्टेट्यूड के पठारी इलाकों में टैंकों की तैनाती के लिए भारतीय सेना हल्के टैंक लेने की सोच रही है. दुनिया में सिर्फ चीन के पास ही लाइट टैंक है जबकि अमेरिका अभी प्रोटोटाइप टैंक पर काम जारी है तो वही रूस का लाइट टैंक प्रोजेक्ट एडवांस स्टेज पर है. स्पार्ट एसडीएम-1 का वज़न 18 टन है और इसमें जो बैरल लगा है वो टी-90 टैंक के बैरल जैसा ही मज़बूत है और तरह से वो गोली दागता है. सूत्रों की मानें तो रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के रूस दौरे पर रूस मे इस हलके टैंक के देने की पेशकश की थी और उसकी ख़ूबियों के बारे में भी बताया था.

चीनी सेना के ठिकानों के निशाना बनाने के लिए आर्टेलरी गन एलएसी पर तैनात
पहाड़ी इलाकों में आर्टेलरी गन यानी की तोपें जमीनी लड़ाई के लिए सबसे ज्यादा मुफ़ीद मानी जाती है हाल ही में अमेरिकी से ली गई लाइट हॉवितसर गन M-777 को लद्दाख में तैनात किया गया है. साथ ही हाल ही में कोरिया से ली गई के-9 वज्र को भी लद्दाख में भेज दिया है. के-9 एक सेल्फ प्रोपेल्ड गन है और ये प्लाटू में आसानी से अपने काम को अंजाम दे सकती है. इसके अलावा बोफोर्स, पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर BM-21 ग्रेड एलएसी पर तैनात है. ये लॉन्चर एक साथ एक बार में 40 रॉकेट दाग सकता है. चीन ने भी पूर्वी लद्दाख में मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर PHL-11 122 mm तैनात किए हैं. ये एक सेल्फ प्रोपेल्ड रॉकेट लॉन्चर है.

भारतीय थल सेना लगातार अपने ताक़त को तेज धार देने में जुटी है. विटंर स्टॉकिंग इतनी कर ली गई कि अलग 6 महीनों तक भी अगर रसद लद्दाख नहीं पहुंचती है तो भी आसानी से 50000 सैनिक वहां टन सकते हैं. कोरोना के मद्देनजर सबसे पहले भारतीय सेना के उन जवानों तो कोविड वैक्सीन की दोनों टीके दे दिए गए हैं ताकि वो आसानी से बिना कोरोना संक्रमण के वो वहां तैनात रह सके. सूत्रों की मानें तो भारतीय सेना फिलहाल अपनी सेना की तादाद को लद्दाख से कम करने नहीं जा रहा है. पिछले एक साल में एलएसी के रहने के बंदोबस्त को और बेहतर किया गया. बीआरओ की तरफ से सड़कें बनाने का काम लगातार जारी रही ताकि कम समय में अंदर सेना के भारी भरकम साजो सामान तो मोबलाइज करना हो तो किसी भी तरह की कोई दिक्कत पेश न हो.

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