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Lockdown Diary: अमेरिका में फंसे इस भारतीय परिवार से डॉक्टर ने मांगी 37 हज़ार फीस और दवाई के 1.5 लाख रुपये

अपने बड़े भाई के परिवार संग अमेरिका में फंसे महशूर नदी एवं पर्यावरणविद् डॉ. दिनेश मिश्रा.

दिनेश मिश्रा और उनके भाई के परिवार के हाथ में देश वापसी के लिए एयर लाइंस (Airlines) का टिकट है, लेकिन मालूम नहीं फ्लाइट (Flight) कब से उड़ान भरेंगी.

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नई दिल्ली. कोरोना वायरस (Corona Virus) हो या लॉकडाउन (Lockdown), उसके अनुभवों से हर कोई रूबरु हो रहा है. शख्स कोई भी हो, सभी ने इन्हें महसूस किया है. ऐसे कड़वे अनुभवों से गुजर रहे हैं देश के महशूर विशेषज्ञ नदी एवं पर्यावरणविद् डॉ. दिनेश मिश्रा और उनके बड़े भाई का परिवार. यह लोग अमेरिका (America) में कैलिफोर्निया के डबलिन में फंसे हुए हैं. यह कुल चार लोग हैं और सभी किसी न किसी मर्ज की रेग्यूलर दवाई खाते हैं. लेकिन बीते तीन महीने दवाई के लिए तरस गए.

जब दवाई के लिए अमेरिका में डॉक्टर से संपर्क किया तो उसने अपनी फीस के 37 हज़ार रुपये मांगे. और उसी भारतीय (Indian) दवा के जो कुछ हज़ार रुपये की मिल जाती है का 1.5 लाख रुपये का बिल बना दिया. परिवार के हाथ में देश वापसी के लिए एयर लाइंस (Airlines) का टिकट है, लेकिन मालूम नहीं फ्लाइट कब से उड़ान भरेंगी. न्यूज18 हिंदी से हुई बातचीत में दिनेश मिश्रा ने खुद साझा किए अपने अनुभव.

27 मार्च की वापसी थी 24 से फ्लाइट पर रोक लग गई
हम चार लोग 22 फरवरी को सिंगापुर एयरलाइंस से कोलकाता होते हुए अमेरिका आए थे. तभी से कैलिफोर्निया के डबलिन में रह रहे हैं. हमारा वापसी का टिकट 27 मार्च का था लेकिन उसके पहले भारत में लॉकडाउन लागू हो गया. वापसी का टिकट हाथ में है. मेरे बड़े भाई भारत में काउंसिल आफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च में वरिष्ठ वैज्ञानिक थे. उनकी छोटी बेटी यहां रहती है, उसी से मिलने हम लोग यहां आ गए थे. हम लोग एक ही परिवार के 4 सदस्य हैं. मेरे बड़े भाई (80 वर्ष), मेरी भाभी (76 वर्ष),  मैं (75 वर्ष) और मेरी भतीजी 50 वर्ष की है.

Demo Pic.


पेसमेकर की टेस्टिंग और दवाई के लिए तरस गए
बड़े भाई को दिल की बीमारी है और पेसमेकर लगा हुआ है. पेसमेकर की टेस्टिंग अप्रैल महीने में होनी थी. वो भी नहीं हो पाई है. भाई डायबिटीज़ के भी मरीज हैं. मैं भी डायबिटीज़ की दवाई लेता हूं. भाभी का अक्टूबर 2019 में रीढ़ की हड्डी का ऑपरेशन हुआ था. वह ऑस्टियोपोरोसिस की भी मरीज हैं. 50 वर्षीय बड़ी भतीजी, जो हमारे साथ ही है, वह बचपन से ही जनरल डिस्टोनिया की मरीज है. अपने साथ हम सभी लोग डेढ़ महीने की दवाएं साथ लेकर आए थे जो अप्रैल में खत्म हो गईं.

37 हज़ार फीस और 1.5 लाख दवाई के चुकाओ
27 मार्च की वापसी थी तो हमारा इंशोयरेंस भी समाप्त हो चुका था. और डाक्टरी सहायता यहां बहुत महंगी है. बिना डॉक्टर के प्रेस्क्रिप्शन के यहां दवाइयां नहीं मिलतीं. बड़ी बेटी की जब तबीयत खराब हुई तो हम लोगों ने यहां एक स्थानीय डॉक्टर को संपर्क किया जिनकी फीस भारतीय रुपये में सैंतीस हजार थी. और जो दवा उन्होंने लिखी उसकी कीमत लगभग डेढ़ लाख रुपये बताई गई. यह भारतीय दवाई थी जो कुछ हज़ार रुपये में मिल जाती है. इतनी महंगी दवा हम खरीद नहीं सकते थे. दोबारा उस डॉक्टर के यहां जाने की हिम्मत नहीं हुई. अब 10 दिन पहले कुछ दवाई जयपुर से हमारे बेटे ने भेजी है. लेकिन डेढ़ महीने से अमेरिका वाली दवाई अभी तक नहीं पहुंची है.

Demo Pic.


क्वारंटाइन का एक दिन का खर्च 5 हज़ार
इस बीच सैन फ्रांसिस्को के भारतीय दूतावास से संपर्क करने पर पता लगा कि भारत जाने के लिए वंदे भारत योजना के तहत भारत जाने की व्यवस्था हो सकती है. उसके टिकट की कीमत एक लाख रुपये प्रति व्यक्ति है. जबकि सिंगापुर एयरलाइंस का टिकट हमने आने-जाने का प्रति व्यक्ति अस्सी हजार रुपये में लिया था. भारत पहुंचने पर 14 दिनों तक क्वारंटाइन किया जाएगा.

जिसका खर्च शुरू-शुरू में प्रतिदिन प्रति व्यक्ति पांच हजार रुपये बताया गया. जबकि जाना हमें जमशेदपुर है. मतलब दिल्ली जाओ, फिर रांची और वहां से जमशेदपुर. अब कितनी जगह क्वारंटाइन होना पड़ेगा नहीं मालूम. और यह खर्च उठाने के लिए मुझे कहीं न कहीं से मदद लेनी पड़ेगी जो अच्छा नहीं लगता. पर लगता है कि मजबूरन यह करना ही पड़ेगा.

लाटरी से निकलता है भारत जाने वालों का नाम
वंदे भारत योजना के तहत जो टिकट मिलता है उसका चयन कहते हैं कि लाटरी के माध्यम से होता है. इस तरीके से यात्रा की तारीख तय करने में हमें कितना समय लगेगा हमको नहीं मालूम, शायद किसी को भी नहीं मालूम. भारत जाने वालों की संख्या हजारों में बताई जा रही है और यह काम कब तक पूरा होगा कह पाना मुश्किल है. इसका एक उपाय हो सकता है कि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को चालू किया जाये ताकि अटके हुए लोग अपने घरों को वापस लौट सकें.

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