'भारतीय न्यायपालिका हमेशा से पर्यावरण संरक्षण की बड़ी हिमायती रही है'

Arijit Pasayat | News18Hindi
Updated: August 23, 2019, 3:50 PM IST
'भारतीय न्यायपालिका हमेशा से पर्यावरण संरक्षण की बड़ी हिमायती रही है'
भारत में जल संकट भयावह स्थिति में पहुंच चुका है. पानी की बर्बादी रोके बगैर शायद ये मुमकिन नहीं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में लगभग 2 अरब लोग दूषित जल (Polluted Water) पीने के लिए बाध्य हैं और इनमें से सारे लोग जल-जनित बीमारी से ग्रस्त होने का ख़तरा झेल रहे हैं.

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बहुत पहले सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने यह मत व्यक्त किया था कि शुद्ध जल जीवन के अधिकार का हिस्सा है. संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार की गारंटी देता है और सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि जब तक आपको शुद्ध जल (Clean Water) पीने को नहीं मिलता है तब तक, जीवन के अधिकार का क्या मतलब है? यह सिर्फ़ भाषणबाज़ी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट [1] के अनुसार, दुनियाभर में लगभग 2 अरब लोग दूषित जल ((Polluted Water) पीने के लिए बाध्य हैं और इनमें से सारे लोग जल-जनित बीमारी से ग्रस्त होने का ख़तरा झेल रहे हैं. भारत में भी, 1990 के दशक में मैंने ओडिशा में एक रिपोर्ट के आधार पर फ़ैसला दिया था जिसमें कहा गया था कि लोग जिस तरह का पानी पी रहे हैं वैसा पानी नहाने के लिए भी उपयुक्त नहीं है. इसकी वजह से लोग कई तरह के त्वचा-रोग से ग्रस्त हो रहे थे जबकि ऐसे पानी को पीने के लिए लोग बाध्य हो रहे थे.

विगत में क्या हुआ इसका ढोल पीटने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है. समय आ गया है जब हमें आगे देखना होगा और इस बात पर विचार करना होगा कि हम पारिस्थितिकी को आगे और नुक़सान से कैसे बचा सकते हैं. और यहां मैं यह कहना चाहूंगा कि सद्गुरु को यह श्रेय जाता है कि उन्होंने नदियों को लेकर रैली करने (रैली फ़ॉर रिवर्स) के आंदोलन के बारे में सही समय पर सोचा है.

जब तक हम पानी का संरक्षण कैसे करें और जल-संसाधनों की बर्बादी को कैसे रोकें इस बारे में चिंता को दूर नहीं करते, तब तक हमें इस त्रासद स्थिति में फंसने से कोई नहीं रोक सकता. पूरे समाज को इस चुनौती का सामना करने के लिए आगे आना होगा क्योंकि यह चुनौती बहुत ही बड़ी है. कावेरी कॉलिंग इस तरह के आंदोलन में समुदाय की भागीदारी का उत्कृष्ट उदाहरण है क्योंकि वास्तव में संसाधन को बचाने के लक्ष्य के अलावा इसका उद्देश्य नदियों और नदी स्रोतों के आसपास रह रहे लोगों के लिए इसे आर्थिक और पारिस्थितिकीय दृष्टि से लाभकारी बनाना भी है. कम से कम अब विश्व स्तर पर यह आम राय बन गई है कि पृथ्वी के जलस्तर को बढ़ाने के लिए पौधे लगाना प्राथमिक रूप से ज़रूरी है.

पिछले कुछ सालों से हम “ग्लोबल वॉर्मिंग” (वैश्विक तापमान में वृद्धि) के बारे में सुनते आ रहे हैं. यह क्यों हो रहा है? क्योंकि जंगलों की कटाई काफ़ी व्यापक रूप से हो रही है. इथियोपिया के पास सबसे ज़्यादा जंगल क्षेत्र था, पर आज उसके पास ज़्यादा बड़ा मरुभूमि है. क्यों? क्योंकि जंगलों को काटकर लकड़ियों को दुनिया के दूसरे देशों में निर्यात किया जा रहा है; एक अनुमान के अनुसार, हर दिन इमारती लकड़ी से लदे 300 जहाज़ इस देश से दूसरे देशों के लिए रवाना होते हैं, जिनका उपयोग निर्माण कार्यों में होता है. इससे उस देश को पैसे की कमाई तो अच्छी हो रही है जो सही है. पर इसका परिणाम यह हुआ है कि बड़े पैमाने पर इस देश के जंगल समाप्त हो गए हैं.


इसीलिए “पर्यावरण संरक्षण” और “सतत विकास” जैसे शब्दों को हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना ज़रूरी है. हम उद्योगों को रोक नहीं सकते. देश ऐसी वस्तुओं का निर्यात करेंगे ही जो उनकी अर्थव्यवस्था की सेहत और व्यक्तिगत धन अर्जित करने के लिए अच्छा है. लेकिन “सतत विकास”पहरुआ-शब्द है. यही कारण है कि मुझे “रैली फ़ॉर रिवर्ज़” (नदियों के लिए रैली) या “कावेरी कॉलिंग” अच्छा लगता है; अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी, वास्तव में एक-दूसरे को बढ़ावा देते हैं; वे सिर्फ़ एक-दूसरे के पूरक ही नहीं हैं, वे एक-दूसरे को सहयोग देने वाले हैं. और उन्हें वास्तव में ऐसा ही होना चाहिए.

पर्यावरण को बचाने में न्यायपालिका की भूमिका
पर्यावरण और पारिस्थितिकी को बचाने में भारत की न्यायपालिका ने बहुत ही सक्रिय भूमिका अदा की है. 1990 के दशक में गोदवर्मन के मामले (यह पर्यावरण से संबंधित पहला मामला था जिसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में हुई) से लेकर वर्तमान समय तक जब राष्ट्रीय हरित अधिकरण अस्तित्व में आ चुका है, भारतीय न्यायपालिका हमेशा ही पारिस्थितिकी के लिए सक्रिय रूप से सही कार्य करने का रास्ता ढूंढने में सफल रही है.
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इसकी शुरुआत देश में जंगलों की बेलगाम कटाई से शुरू हुई. सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय लिया कि पर्यावरण के मामलों में उसकी निगरानी अवश्य होनी चाहिए, ताकि प्राकृतिक संसाधनों की बड़े पैमाने पर हो रही बर्बादी को नियंत्रित किया जा सके. उसने सेंट्रली एम्पावर्ड कमिटी (सीईसी) का इस कार्य के लिए गठन किया.

मूल मुद्दा यह है कि वन क्षेत्र में किसी भी तरह की ग़ैर-वन गतिविधियां नहीं चलाई जाएं. उदाहरण के लिए, खनन. खनन ग़ैर-वन गतिविधि है. लेकिन सभी खान वन क्षेत्र में ही स्थित हैं. सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि अगर आप ग़ैर-वन गतिविधि के लिए वन क्षेत्र का उपयोग करते हैं तो आपको इसके लिए उचित मूल्य चुकानी होगी और अपनी गतिविधि चलाने के लिए अनुमति लेनी होगी. उन्हें वन क्षेत्र में कार्य करने की अनुमति, पर्यावरण अनुमति लेने के अलावा और अन्य कई शर्तों का पालन करना होता है जो इस तरह की गतिविधियों की बहुत ही कठोरता से निगरानी के लिए की जाती है. इन नियमों का उल्लंघन करने वालों पर लगने वालों पर हज़ारों करोड़ रुपए के जुर्माने लगाए जाते हैं. पर जब तक लोगों की मानसिकता में परिवर्तन नहीं आता, कोई क़ानून इस दिशा में पूर्ण बदलाव नहीं ला सकता.


कर्नाटक में कुद्रेमुख खनन मामला इसका उदाहरण है. नागरिक सक्रियता के कारण यहां पर खनन पर प्रतिबंध लगाया गया. सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में जो फ़ैसला दिया उसका मैं भी हिस्सा था और मैं कह सकता हूं कि यह एक ऐतिहासिक फ़ैसला था क्योंकि इसके पीछे नागरिकों के एक छोटे प्रतिबद्ध समूह की सक्रियता काम कर रही थी और वे सरकारी खान को बंद कराने में सफल रहे थे जो अपना खनिज निर्यात करता था. इस खान की वजह से पश्चिमी घाट की जैवविविधता नष्ट हो रही थी.

वर्ष 2000 के बाद पर्यावरण मामले में आम जनता और न्यायालय की संलग्नता काफ़ी बढ़ी है. राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना 2010 में हुई, जिसको वन और पर्यावरण मामले को देखने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. और अभी हाल में सरकार ने कहा है कि नदियों से जुड़े सभी विवादों को “नदी अधिकरण” (रिवर ट्रिब्यूनल) निपटाएगा और इसे एक निश्चित अवधि के अंदर सभी प्रक्रिया को निपटाने को कहा गया है. पूर्व में, हर नदी विवाद के लिए एक अधिकरण का गठन होता था और इनसे विवादों के निपटारे में काफ़ी समय लगता था. उदाहरण के लिए, तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच काफ़ी समय से चला आ रहा नदी विवाद अभी भी चल रहा है. इसी तरह के अनेकों अन्य विवाद भी हैं जैसे ओडिशा-आंध्र विवाद, ओडिशा-छत्तीसगढ़ विवाद आदि.

लेकिन मेरा मानना है कि हम सब मुख्य बिंदु को भूल रहे हैं. मुझे याद है, 2005-2006 में कर्नाटक-तमिलनाडु विवाद की सुनवाई के दौरान मैंने हंसी में कहा था, “वर्षा के देवता से प्रार्थना कीजिए क्योंकि अगर उन्होंने आपको आशीर्वाद नहीं दिया, तो कोई भी दलील आपको पानी नहीं दिला सकती है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पानी पैदा नहीं करता”।


लेखक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और पर्यावरण संरक्षण के बड़े हिमायती हैं. न्यायमूर्ति  अरिजित पसायत ने  2500 से भी अधिक न्यायिक फ़ैसले दिए हैं जो दुनिया के सभी सुप्रीम कोर्टों के लिए एक रिकॉर्ड है. वे रैली फ़ॉर रिवर्ज़ बोर्ड के सदस्य हैं और उनसे apasayat@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.

(यह आलेख कावेरी कॉलिंग सिरीज़ का हिस्सा है. कावेरी कॉलिंग अपने तरह का एक अलग अभियान है, जिसने इस देश की जीवनदायिनी समझी जाने वाली नदियों को कैसे पुनर्जीवित किया जाए, इस बारे में नया मानदंड स्थापित किया है. यह अभियान कावेरी नदी को पुनर्जीवित करने के लिए किसानों को 242 करोड़ पौधे लगाने के लिए मदद करेगा. इससे इस नदी के कछार में पानी बचाए रखने की क्षमता बढ़ेगी और इसके साथ ही इससे 5-7 सालों में किसानों की आय में 3-8 गुना सुधार होगा और इस तरह 840 लाख लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आएगा.
CauveryCalling.org वेबसाइट पर जाएं या 80009 80009 पर कॉल करें. कावेरी कॉलिंग को अपना सहयोग दें। #CauveryCalling. )
1 https://www.who.int/news-room/fact-sheets/detail/drinking-water 

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First published: August 23, 2019, 2:22 PM IST
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